मुजफ्फरनगर। बेटी की शादी को लेकर परिवारों के सामने अक्सर रिश्ते से ज्यादा चिंता शादी के खर्च की होती है। दहेज, बड़े आयोजन, मेहमानों की आवभगत और दिखावे की होड़ कई परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ा देती है। ऐसे दौर में मुजफ्फरनगर में हुआ एक निकाह सादगी और बिना दान-दहेज की पहल को लेकर चर्चा में है। गाजियाबाद के फरीदनगर निवासी मोहम्मद यामीन के पुत्र मोहम्मद मुजम्मिल की बारात सोमवार को मुजफ्फरनगर पहुंची, जहां जनकपुरी कच्ची सड़क निवासी ताहिर अली की पुत्री शबाना के साथ निकाह हुआ।

दोनों परिवारों ने शादी को भव्य समारोह का रूप देने के बजाय मस्जिद में सादगी के साथ निकाह की रस्म पूरी कराई। इस दौरान दान-दहेज की मांग को प्राथमिकता नहीं दी गई और अनावश्यक खर्च से बचते हुए पारिवारिक माहौल में विवाह संपन्न कराया गया।

शादी की चकाचौंध से दूर रहा आयोजन
आज के समय में शादी को अक्सर बड़े आयोजन, महंगे खान-पान, सजावट और सैकड़ों मेहमानों से जोड़कर देखा जाता है। कई परिवार सामाजिक दबाव में अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं। इसके विपरीत मुजम्मिल और शबाना के परिवारों ने निकाह को सादगी से पूरा किया।
मस्जिद में परिवार और रिश्तेदारों की मौजूदगी में निकाह की रस्म पूरी हुई। आयोजन में दिखावे की बजाय विवाह की मूल भावना को प्राथमिकता दी गई। परिवारों की ओर से दहेज को लेकर किसी तरह की मांग नहीं रखी गई।
दूल्हे के पिता ने पांचों बच्चों का बिना दहेज किया निकाह
इस निकाह को चर्चा में लाने वाली एक खास बात दूल्हे के पिता मोहम्मद यामीन की सोच भी रही। उन्होंने बताया कि उनके पांच बच्चे हैं और उन्होंने अपने सभी पांचों बच्चों का निकाह बिना किसी दान-दहेज के किया है।
मोहम्मद यामीन का कहना है कि निकाह को आसान और सादगीपूर्ण रखा जाए तो इसका सबसे बड़ा लाभ आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मिल सकता है। उनका मानना है कि बेटी की शादी के नाम पर किसी परिवार पर अनावश्यक आर्थिक बोझ नहीं पड़ना चाहिए।
‘शादी के लिए कर्ज क्यों?’
मोहम्मद यामीन का कहना है कि शादी को इतना महंगा बनाने की जरूरत नहीं है कि परिवारों को इसके लिए कर्ज लेना पड़े। उनका मानना है कि रिश्ते की मजबूती महंगे इंतजामों और दिखावे से नहीं, बल्कि आपसी समझ, सम्मान और जिम्मेदारी से होती है।
उनकी सोच के मुताबिक यदि निकाह को सरल और बिना दहेज के किया जाए तो आर्थिक रूप से कमजोर परिवार भी अपनी बेटियों की शादी बिना भारी कर्ज और लंबे समय के आर्थिक दबाव के कर सकते हैं।
गरीब परिवारों के लिए राहत का संदेश
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए बेटी की शादी लंबे समय से बड़ी चिंता का विषय रही है। दहेज और विवाह के खर्च को पूरा करने के लिए कई परिवार वर्षों तक बचत करते हैं और कई बार कर्ज लेने की स्थिति तक पहुंच जाते हैं।
ऐसे में कम खर्च और बिना दहेज के होने वाली शादियां एक वैकल्पिक सामाजिक सोच सामने रखती हैं। मुजफ्फरनगर में हुआ यह निकाह भी इसी विचार को सामने लाता है। दोनों परिवारों ने विवाह को प्रतिष्ठा और दिखावे से जोड़ने के बजाय रिश्ते को प्राथमिकता दी।
सादगी को दी गई प्राथमिकता
फरीदनगर से आई बारात का स्वागत पारिवारिक माहौल में हुआ। इसके बाद मस्जिद में मोहम्मद मुजम्मिल और शबाना का निकाह कराया गया। पूरे आयोजन में भव्य सजावट या अनावश्यक तामझाम के बजाय सादगी पर जोर रहा।
परिवारों के इस फैसले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि शादी को खर्च और दिखावे की प्रतिस्पर्धा से अलग रखते हुए नए रिश्ते की शुरुआत की गई।
दहेज और फिजूलखर्ची के खिलाफ संदेश
दहेज और शादी में होने वाली फिजूलखर्ची को कम करने के लिए केवल जागरूकता की बातें करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि परिवारों की सोच में बदलाव भी जरूरी है। मुजम्मिल और शबाना के परिवारों ने अपने स्तर पर इसी तरह का संदेश देने की कोशिश की है।
एक ओर जहां कई परिवार शादी को भव्य बनाने के लिए अपनी क्षमता से अधिक खर्च करते हैं, वहीं इस निकाह ने यह सवाल सामने रखा कि क्या शादी की खुशी के लिए भारी खर्च जरूरी है। दूल्हे के पिता मोहम्मद यामीन की सोच इसका जवाब सादगी में तलाशती है।
एक परिवार की पहल, समाज के लिए मिसाल
मोहम्मद यामीन द्वारा अपने पांचों बच्चों का बिना दहेज निकाह किए जाने की बात इस आयोजन को महज एक पारिवारिक समारोह से आगे ले जाती है। यह सोच शादी को सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के बजाय दो परिवारों के बीच रिश्ते और जिम्मेदारी के रूप में देखने का संदेश देती है।
मुजफ्फरनगर में हुआ यह निकाह इसलिए चर्चा में आया कि यहां खुशी का पैमाना खर्च और दिखावा नहीं, बल्कि सादगी रही। बिना दान-दहेज और अनावश्यक तामझाम के संपन्न हुए इस निकाह ने दहेज और फिजूलखर्ची को लेकर समाज में चल रही बहस के बीच एक सरल और व्यावहारिक उदाहरण जरूर सामने रखा है।

