मऊ। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत विकास खंड दोहरीघाट की ग्राम पंचायत गोठा में महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की है। यहां एकता महिला प्रेरणा लघु उद्योग समूह द्वारा गोबर से प्राकृतिक डिस्टेंपर (ग्रीन) पेंट का उत्पादन किया जा रहा है। यह पहल ग्रामीण महिलाओं को रोजगार देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

उपायुक्त (स्वरोजगार) सुमन लता ने बताया कि करीब 9.74 लाख रुपये की लागत से स्थापित इस उत्पादन इकाई को सामुदायिक निवेश निधि का सहयोग मिला है। इस परियोजना से फिलहाल लगभग 50 महिलाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद है और उत्पादन बढ़ने के साथ रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।

आधुनिक मशीनों से संचालित इस इकाई में अब तक 320 किलोग्राम प्राकृतिक डिस्टेंपर पेंट तैयार किया जा चुका है। इकाई की उत्पादन क्षमता आठ घंटे में लगभग 500 लीटर पेंट बनाने की है, जिससे भविष्य में बड़े स्तर पर बाजार की मांग पूरी की जा सकेगी।
इस प्राकृतिक पेंट की खासियत यह है कि इसे गोबर जैसे प्राकृतिक संसाधन से तैयार किया जाता है, जिससे रासायनिक प्रदूषण कम होता है और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। इसकी कीमत 75 रुपये प्रति लीटर (जीएसटी अतिरिक्त) तय की गई है, जो बाजार में उपलब्ध सामान्य डिस्टेंपर पेंट की तुलना में 10 से 15 रुपये प्रति लीटर तक सस्ती बताई जा रही है।
इस परियोजना ने गोठा की महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। पहले जहां गोबर का उपयोग केवल ईंधन और खाद तक सीमित था, वहीं अब यही उनकी आजीविका का मजबूत आधार बन गया है। एनआरएलएम से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद महिलाएं गुणवत्तापूर्ण पेंट तैयार कर रही हैं और अपने परिवार की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। महिलाओं का कहना है कि इस रोजगार ने उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ समाज में सम्मान और आत्मविश्वास भी बढ़ाया है।
इच्छुक व्यक्ति या संस्थाएं ग्राम पंचायत गोठा स्थित उत्पादन इकाई, विकास खंड कार्यालय दोहरीघाट अथवा एनआरएलएम कार्यालय, विकास भवन मऊ से संपर्क कर प्राकृतिक डिस्टेंपर पेंट खरीद सकते हैं।
सबसे बड़ी चुनौती: मार्केटिंग और बिक्री
उपयुक्त स्वत रोजगार राजीव कुमार ने बताया कि जिले में गोबर से पर्यावरण अनुकूल पेंट बनाने का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसकी मार्केटिंग और बिक्री अभी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। उन्होंने कहा कि विभाग उत्पाद के व्यापक प्रचार-प्रसार और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है, ताकि स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को अधिक आर्थिक लाभ मिल सके।
जिला मिशन प्रबंधक हिमांशु सिंह ने बताया कि इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 2024 में तत्कालीन मुख्य विकास अधिकारी के कार्यकाल में हुई थी। परियोजना के तहत स्वयं सहायता समूह की पांच महिलाओं और विभाग के दो कर्मचारियों को राजस्थान के जयपुर में एक सप्ताह का विशेष प्रशिक्षण दिया गया, जहां उन्हें गोबर से पेंट बनाने की आधुनिक तकनीक सिखाई गई।
प्रशिक्षण के बाद दोहरीघाट क्षेत्र के गोठा गांव के पास स्थित गौशाला के समीप उत्पादन इकाई स्थापित की गई। परियोजना से जिले के 115 स्वयं सहायता समूहों को जोड़ा गया और उनके सहयोग से करीब 7.50 लाख रुपये की लागत से आवश्यक मशीनें खरीदी गईं। मशीनों की स्थापना के बाद नियमित रूप से गोबर से पेंट का उत्पादन शुरू हुआ।
हिमांशु सिंह के अनुसार, जिले के कई प्राथमिक विद्यालयों और विभिन्न सरकारी भवनों में इस प्राकृतिक पेंट का उपयोग किया जा चुका है। विशेष रूप से विकास भवन के अंदर की अधिकांश पेंटिंग इसी पर्यावरण अनुकूल पेंट से की गई है।
अधिकारियों का कहना है कि यह परियोजना केवल स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार, आय वृद्धि और महिला सशक्तिकरण का प्रभावी मॉडल बनकर उभर रही है। अब विभाग का पूरा ध्यान इस उत्पाद की ब्रांडिंग, मार्केटिंग और बिक्री को मजबूत करने पर है, ताकि गोबर से बना यह ग्रीन पेंट बाजार में अपनी अलग पहचान स्थापित कर सके।

