सोनभद्र डबल मर्डर केस: हाईकोर्ट ने फांसी की सजा पाई आरोपी को किया बरी, कहा- आरोप साबित नहीं कर सका अभियोजन

सोनभद्र डबल मर्डर केस: हाईकोर्ट ने फांसी की सजा पाई आरोपी को किया बरी, कहा- आरोप साबित नहीं कर सका अभियोजन

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को सोनभद्र के चर्चित दोहरे हत्याकांड में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपित अशोक शर्मा को सभी आरोपों से बरी कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने उसे गर्भवती महिला सुनीता शर्मा और उसकी तीन वर्षीय पुत्री झलक की हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। सजा के विरूद्ध अशोक शर्मा की अपील पर न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने सुनवाई की। आरोपी का पक्ष रखने के लिए अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता विनय सरण और अतुल कुमार पांडे को न्याय मित्र नियुक्त किया था।

यह थी घटना

मामला सोनभद्र जिले के चोपन थाना क्षेत्र का है। 21 दिसंबर 2010 की सुबह मृतका सुनीता के पिता सतीश कुमार शर्मा को सूचना मिली कि उनकी पुत्री सुनीता और तीन वर्षीय नातिन झलक की हत्या कर दी गई है। दोनों के गले में साड़ी का फंदा बंधा हुआ था और शवों को जलाने का भी प्रयास किया गया था। एफआईआर में आरोप लगाया गया कि सुनीता की सास गीता देवी और अशोक शर्मा के बीच कथित अवैध संबंध थे तथा सुनीता इस संबंध में बाधक बन रही थी, इसलिए उसकी और उसकी बेटी की हत्या कर दी गई।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दोनों की मौत का कारण गला दबाकर हत्या बताया गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि सुनीता लगभग 26 से 30 सप्ताह की गर्भवती थी।

बचाव पक्ष की दलीलें

आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विनय सरन और अतुल कुमार पांडे (दोनों न्याय मित्र) सहित अन्य अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि अशोक शर्मा को केवल संदेह और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर फंसाया गया है। कथित प्रत्यक्षदर्शी गवाह दो रीता देवी और गवाह चार सुनील शर्मा की गवाही विरोधाभासों से भरी हुई है तथा उनका आचरण पूरी तरह अप्राकृतिक है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि चिकित्सीय साक्ष्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयान का समर्थन नहीं करते और अभियोजन आरोपी की घटनास्थल पर मौजूदगी तक साबित नहीं कर सका।

राज्य सरकार का पक्ष

सरकारी अधिवक्ता एजीए अमित सिन्हा ने दलील दी कि एफआईआर तत्काल दर्ज हुई थी और अभियोजन का मामला दो प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की विश्वसनीय गवाही से समर्थित है। घटनास्थल से बरामद सामग्री भी अभियोजन की कहानी की पुष्टि करती है। राज्य ने यह भी कहा कि गर्भवती महिला और मासूम बच्ची की हत्या “दुर्लभतम से दुर्लभ” श्रेणी का अपराध है, इसलिए फांसी की सजा उचित थी।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि कथित प्रत्यक्षदर्शी गवाहों का व्यवहार सामान्य मानवीय आचरण के विपरीत था। अदालत ने पाया कि दोनों गवाहों ने हत्या होते देखने का दावा किया, लेकिन न तो शोर मचाया, न पड़ोसियों को बुलाया और न ही तत्काल पुलिस को सूचना दी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं और चिकित्सीय साक्ष्य भी उनके कथन का समर्थन नहीं करते। गवाहों ने दावा किया था कि हत्या साड़ी से गला कसकर की गई, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में फंदे के निशान नहीं पाए गए और मृत्यु का कारण हाथों से गला दबाना बताया गया।

खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि प्रत्यक्षदर्शी गवाह दो और चार की गवाही पूरी तरह अविश्वसनीय है और उन्हें प्रत्यक्षदर्शी नहीं माना जा सकता। इनके बयान हट जाने के बाद आरोपी अशोक शर्मा की घटनास्थल पर मौजूदगी या अपराध में संलिप्तता साबित करने वाला कोई स्वतंत्र साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं बचता।

फैसला

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को कानून और तथ्यों दोनों के आधार पर त्रुटिपूर्ण बताते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी अशोक शर्मा के खिलाफ हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर पाया है। परिणामस्वरूप आरोपी को बरी करते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश दिया गया। दंड अपील स्वीकार कर ली गई।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *