मुजफ्फरनगर। तितावी थाना क्षेत्र के मांडी गांव में वर्ष 2010 में हुए किसान राजबीर सिंह हत्याकांड में सोमवार को अपर जिला एवं सत्र न्यायालय एवं त्वरित न्यायालय संख्या-3 ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी पूर्व प्रधान प्रमोद चौधरी और उसके साथी सहदेव उर्फ पप्पू को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। अदालत ने दोनों दोषियों पर एक-एक लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। विशेष बात यह रही कि मुख्य आरोपी प्रमोद चौधरी, एएसपी अनुज चौधरी का ममेरा भाई बताया गया है।

करीब 16 वर्ष पुराने इस बहुचर्चित मामले में पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी का अपराध मानते हुए कहा कि यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला था। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि भारत का लोकतंत्र बैलेट से चलता है, बुलेट से नहीं और चुनावी रंजिश में हत्या जैसी घटनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों को गहरी चोट पहुंचाती हैं।

प्रधानी चुनाव की रंजिश बनी हत्या की वजह
अभियोजन के अनुसार वर्ष 2010 के पंचायत चुनाव के दौरान मांडी गांव निवासी 60 वर्षीय किसान राजबीर सिंह ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। इसे लेकर तत्कालीन प्रधान प्रमोद चौधरी उनसे रंजिश रखने लगा था।
24 अगस्त 2010 की सुबह करीब सवा सात बजे राजबीर सिंह खेत पर जा रहे थे। आरोप है कि मांडी के जंगल में पहले से घात लगाए बैठे प्रमोद चौधरी, सहदेव उर्फ पप्पू और उनके दो साथियों अमित तथा विपिन शर्मा ने उन्हें रोक लिया। अभियोजन के अनुसार हमलावरों ने राजबीर सिंह को ललकारते हुए उन पर पिस्टल से ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर सात गोली लगने के निशान मिले थे, जिनमें पांच प्रवेश और दो निकास घाव शामिल थे। गोली चेहरे, गर्दन और सीने पर बेहद नजदीक से मारी गई थीं। घटना के बाद मृतक के पुत्र प्रदीप कुमार ने मुकदमा दर्ज कराया था। बाद में प्रत्यक्षदर्शियों के सामने आने के बाद आरोपियों की नामजदगी हुई।
अदालत की सख्त टिप्पणी
फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने कहा कि ग्राम पंचायत चुनाव लोकतंत्र की पहली सीढ़ी हैं और मतदाताओं की इच्छा का सम्मान सर्वोपरि है। चुनाव में हार-जीत लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में किसी की हत्या कर देना कानून और लोकतंत्र दोनों पर हमला है। ऐसे अपराधों के प्रति नरमी नहीं बरती जा सकती।
मालखाने से सबूत गायब होने पर एसएसपी को कार्रवाई के आदेश
सुनवाई के दौरान एक गंभीर तथ्य भी सामने आया। अदालत को बताया गया कि घटनास्थल से बरामद 32 बोर के चार खोखा कारतूस, जो मुकदमे के महत्वपूर्ण साक्ष्य थे, तितावी थाने के मालखाने से गायब हो गए। विवेचक ने भी अदालत में स्वीकार किया कि कारतूस उपलब्ध नहीं हैं।
अदालत ने इसे अत्यंत गंभीर मानते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि मामले की जांच कर मालखाने से साक्ष्य गायब होने के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों की पहचान की जाए तथा उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
आठ गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर हुई सजा
अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष आठ महत्वपूर्ण गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए। मामले में शामिल दो अन्य आरोपी अमित और विपिन शर्मा वर्ष 2011 में शाहपुर थाना क्षेत्र में पुलिस मुठभेड़ में मारे जा चुके थे, जिसके बाद उनके विरुद्ध कार्रवाई समाप्त कर दी गई थी।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने उस दौर के मुजफ्फरनगर की कानून व्यवस्था का भी उल्लेख किया और बताया कि उस समय गैंगवार और आपराधिक घटनाएं लगातार सामने आ रही थीं। अभियोजन का तर्क था कि ऐसे मामलों में कड़ी सजा समाज में कानून का विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
पीड़ित परिवार को न्याय, लेकिन नए मामले में भी घिरा परिवार
इस फैसले से राजबीर सिंह के परिवार को करीब 16 वर्ष बाद न्याय मिला है। हालांकि, वर्तमान में यही परिवार एक अन्य चर्चित ‘दोना फैक्टरी’ प्रकरण को लेकर भी कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहा है।
मृतक के पुत्र प्रदीप कुमार, जिन्होंने अपने पिता की हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था, उस मामले में गिरफ्तार होकर जेल जा चुके हैं। वहीं, राजबीर सिंह के पौत्र अंकित बालियान ने हरियाणा के होडल में आत्मसमर्पण किया है। मुजफ्फरनगर पुलिस उन्हें बी-वारंट पर लाने की प्रक्रिया में जुटी है। हरियाणा पुलिस ने इस आत्मसमर्पण को कथित साजिश बताते हुए मृतक के दूसरे पुत्र विपिन को भी मामले में आरोपी बनाया है। इस घटनाक्रम के चलते मांडी गांव में यह मामला एक बार फिर चर्चा का विषय बना हुआ है।

