प्रोटीन सप्लीमेंट में स्टेरॉयड के प्रयोग से कुत्तों के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है। वे आक्रामक हो रहे हैं और मौका मिलते ही हमलावर हो जाते हैं। वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. संजीव नेहरू के मुताबिक, आमतौर पर प्रोटीन सप्लीमेंट का प्रयोग बॉडीबिल्डर करते हैं। अब इनका प्रयोग कुत्तों को सुंदर, सुडौल दिखाने के साथ उनकी मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए भी किया जा रहा है। मगर प्रोटीन लेने के बाद जब कुत्ते की कैलोरी बर्न नहीं होती है, तो उसके व्यवहार में परिवर्तन में आ जाता है। चिड़िचड़ा होने के साथ बेवजह भौंकने लगता है, हमला करता है। कई बार अपने मालिक को भी शिकार बना लेता है।

आसानी से मिल रहे प्रोटीन सप्लीमेंट

मारुति एस्टेट निवासी पेट्स मार्ट संचालक दिनेश राठौर ने बताया कि कुत्तों के लिए बाजार में 1500-3000 रुपये तक के सप्लीमेंट उपलब्ध हैं। इसके पीछे मकसद यही होता है कि कुत्ते देखने में ज्यादा खतरनाक दिखें। उनके जोड़ों में कोई दिक्कत न हो और साथ ही उनके बाल और त्वचा खूबसूरत बनी रहे।
कई सप्लीमेंट में होता है स्टेरॉयड
नगर निगम के एक पशु चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि कई सप्लीमेंट ऐसे होते हैं जिनमें स्टेरॉयड मिला होता है। इनके प्रयोग से डाबरमैन, जर्मन शेपर्ड, रॉटविलर, ग्रेड डैन, बॉक्सर, पिटबुल जैसी नस्लों के कुत्ते खूंखार नजर आते हैं।
कैलोरी बर्न करना जरूरी
डॉक्टरों के मुताबिक, कुत्ते को जो खुराक या सप्लीमेंट दिए जाते हैं उससे उनके भीतर बहुत ऊर्जा इकट्ठा हो जाती है। घरों में पले कुत्तों की उर्जा खत्म करने या कैलोरी बर्न करने का कोई इंतजाम नहीं होता है। ऐसे में उनके व्यवहार में परिवर्तन आता है। किसी पर भी हमला कर सकते हैं।
इतना व्यायाम कराओ कि जबान लटकने लगे
ट्रेनर राजवीर गुर्जर ने बताया कुत्तों में ऊर्जा बहुत होती है। इनको थकाया नहीं गया तो ये आक्रामक हो जाते हैं। कुत्तों को टहलाने के नाम पर सौ-दो सौ मीटर का चक्कर लगवाया जाता है। मगर इससे इनकी ऊर्जा खत्म नहीं होती। एक बड़े कुत्ते को कम से कम 10-12 किलोमीटर दौड़ाना जरूरी है। उससे इतना व्यायाम कराया जाए कि उसकी जबान बाहर लटकने लगे। यदि इतना नहीं कर सकते तो कुत्तों को नहीं पालना चाहिए।
वैक्सीनेशन जरूरी
चिकित्सकों के मुताबिक, कुत्तों का वैक्सीनेशन अति आवश्यक है। साथ ही उनकी नसबंदी भी करानी चाहिए। दरअसल हाई प्रोटीन सप्लीमेंट और इंजेक्शनों की वजह से कुत्तों में तमाम तरह के शारीरिक परिवर्तन होते हैं। इसलिए उन्हें शांत रखने के लिए नसबंदी जरूरी हो जाती है। कुत्ते का टीकाकरण होने के बाद अगर वह किसी को काट भी लेगा तो पीड़ित रेबीज का शिकार नहीं होगा।
सर्दी-गर्मी में ज्यादा तो बारिश में काटने की घटनाएं कम
दिल्ली के उत्तरी इलाके में कुत्तों के काटने की घटनाएं मार्च शुरू होते ही बढ़ने लगती हैं। सबसे अधिक घटनाएं अप्रैल में होती हैं। वहीं बारिश शुरू होने पर इन घटनाओं में कमी आने लगती है। जुलाई में कुत्ते काटने की सबसे कम घटनाएं होती हैं। सर्दियां शुरू होने पर फिर से मामले बढ़ने लगते हैं। यह जानकारी उत्तरी निगम के हिंदूराव अस्पताल के एंटी रेबीज क्लीनिक में पिछले 9 साल में जानवरों के काटने के बाद आए 1.58 लाख मरीजों के आंकड़ों के अध्ययन में सामने आई है। यह अध्ययन हाल ही में प्रकाशित हुआ। डॉ. जेठानी इसके प्रमुख लेखक हैं।
वर्ष 2014 के बाद घटने लगे आंकड़े
अध्ययन के मुताबिक, साल 2014 में सबसे अधिक 27,961 लोग एंटी रेबीज क्लीनिक पहुंचे थे। इसके बाद से यह आंकड़ा घटता रहा है। इन 9 सालों में आए 1.58 लाख मामलों में 91 फीसदी मरीज गम्भीर श्रेणी के थे।
रोज 90 मामले आ रहे
दिल्ली में पिछले तीन साल में कुत्तों के काटने के मामले में तीन गुना इजाफा हुआ है। साल 2021 में हर रोज कुत्तों के काटने के 90 मामले सामने आए। साल 2019 में 28 हजार 52 मामले मिले। वहीं, 2021 में यह आंकड़ा दिल्ली को मिलाकर 89 हजार के पार पहुंच गया।