मुजफ्फरनगर। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दो अहम जिलों मेरठ और मुजफ्फरनगर में खाकी की साख को बट्टा लगाने वाला एक बेहद संगीन मामला प्रकाश में आया है। पुलिस महकमे के भीतर पनप रहे भ्रष्टाचार और मनमाने रवैये की फेरहिस्त में एक नया और गंभीर अध्याय जुड़ गया है, जहां सुरक्षा की गारंटी देने वाली वर्दी पर ही नागरिकों से अवैध वसूली और प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगे हैं। नोएडा के एक प्रतिष्ठित फर्नीचर कारोबारी ने मेरठ और मुजफ्फरनगर के थानों में तैनात पुलिसकर्मियों पर बैंक खाते अनफ्रीज कराने और फर्जी मुकदमों में फंसाने की धमकी देकर लाखों रुपये की उगाही करने का सनसनीखेज आरोप लगाया है। इस प्रकरण के तूल पकड़ने और उच्चाधिकारियों तक शिकायत पहुंचने के बाद गाज गिरनी शुरू हो गई है, जिसके तहत तीन पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।

प्रकरण की शुरुआत नोएडा के सेक्टर-93 स्थित गेझा इलाके के रहने वाले फर्नीचर कारोबारी शाहिद चौधरी की ओर से दी गई एक विस्तृत शिकायत से होती है। शाहिद सोफा और फर्नीचर का कारोबार करते हैं। उनके अनुसार, किसी व्यवसायिक विवाद के चलते उनकी पत्नी का बैंक खाता फ्रीज कर दिया गया था। इसी खाते से जुड़ी तकनीकी और कानूनी उलझन को सुलझाने के सिलसिले में जब शाहिद मेरठ के लिसाड़ी गेट थाने पहुंचे, तो उन्हें मदद मिलने के बजाय उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। पीड़ित कारोबारी का आरोप है कि थाने के भीतर उनके साथ अमानवीय और अनुचित व्यवहार किया गया। उन्हें जबरन हवालात की सलाखों के पीछे बंद कर दिया गया और मानसिक तथा शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

शाहिद चौधरी का दावा है कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें कानूनी शिकंजे में कसने और उनके भाई सनवर को भी मामले में घसीटने की धमकी दी। इस दौरान उनका कीमती आईफोन, हाथ की घड़ी और बेल्ट तक जबरन कब्जे में ले ली गई। थाने के भीतर कथित तौर पर उनसे आठ लाख रुपये की भारी-भरकम फिरौती या रिश्वत की मांग की गई। आखिरकार, चार अगस्त 2026 को चार लाख रुपये की पहली बड़ी रकम चुकाने के बाद उन्हें हवालात से रिहाई मिल सकी। पीड़ित ने अपनी शिकायत में कुल मिलाकर करीब चार लाख बहत्तर हजार रुपये की नकद और बैंक ट्रांसफर के जरिए की गई अवैध वसूली का पूरा कच्चा-चिट्ठा पेश किया है।
इस पूरी अवैध उगाही के ताने-बाने में मेरठ के लिसाड़ी गेट थाने में तैनात दरोगा अंकित सागर और हेड कांस्टेबल नीरज कुमार की भूमिका सबसे ऊपर बताई गई है। आरोप है कि इन्होंने ही न केवल कारोबारी का मोबाइल अपने कब्जे में लिया, बल्कि थाने के पास ही साइबर कैफे चलाने वाले शादाब राव को अपने निजी मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया। मवाना निवासी शादाब राव पर आरोप है कि वह पुलिसकर्मियों के इशारे पर लगातार कारोबारी से पैसों की मांग कर रहा था। शिकायत के अनुसार, चार अगस्त को शाहिद के खाते से एक लाख बीस हजार रुपये का ऑनलाइन ट्रांसफर कराया गया, जबकि दो लाख अस्सी हजार रुपये नकद शादाब राव के जरिए थाने के कार्यालय में पहुंचाए गए। इसके अलावा, अधिकारियों को सोफा सेट भेंट करने के नाम पर मोहम्मद इमरान और सुशीला के खातों में छत्तीसगढ़ और अन्य माध्यमों से छत्तीस-छत्तीस हजार रुपये यानी कुल बहत्तर हजार रुपये और ट्रांसफर कराए गए।
मामला सिर्फ मेरठ तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसकी आंच मुजफ्फरनगर तक जा पहुंची। मुजफ्फरनगर के खतौली थाना क्षेत्र की पमनावली चौकी के प्रभारी दरोगा आरिफ अली पर भी कारोबारी की पत्नी का बैंक खाता अनफ्रीज कराने के एवज में एक लाख रुपये की रिश्वत लेने का गंभीर आरोप है। पीड़ित का दावा है कि इस एक लाख रुपये के लेन-देन का पुख्ता वीडियो साक्ष्य भी उनके पास मौजूद है, जिसे जांच अधिकारियों को सौंप दिया गया है। एक तरफ जहां मेरठ में दरोगा अंकित सागर और हेड कांस्टेबल नीरज कुमार पर गाज गिरी, वहीं मुजफ्फरनगर में दरोगा आरिफ अली को भी प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए सस्पेंड कर दिया गया है।
मामले की गंभीरता को भांपते हुए डीआईजी कलानिधि नैथानी ने इस पूरे प्रकरण का संज्ञान लिया और मेरठ के एसएसपी बीबीजीटीएस मूर्ति को कड़े निर्देश जारी किए। एसएसपी मूर्ति ने त्वरित कार्रवाई करते हुए लिसाड़ी गेट थाने के दरोगा अंकित सागर और हेड कांस्टेबल नीरज कुमार को निलंबित कर दिया। वहीं मुजफ्फरनगर के एसएसपी सूरज राय ने भी चौकी प्रभारी आरिफ अली के निलंबन की पुष्टि की है। मेरठ में इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच सीओ साइबर क्राइम सौम्या अस्थाना को सौंपी गई है, जो दस्तावेजों, बैंक खातों के ट्रांजैक्शन और साक्ष्यों की बारीकी से पड़ताल कर रही हैं।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच पुलिस प्रशासन की आंतरिक कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। प्रारंभिक जांच के दौरान जब डीआईजी ने समीक्षा की, तो पाया कि सीओ कोतवाली संग्राम सिंह ने इस बेहद संवेदनशील मामले की जांच में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई। आरोप है कि उन्होंने मुख्य शिकायतकर्ता शाहिद चौधरी से बिना बातचीत किए ही जांच रिपोर्ट तैयार कर दी थी। इस लापरवाही पर डीआईजी ने गहरी नाराजगी जताते हुए सीओ कोतवाली से स्पष्टीकरण तलब किया है और उन्हें अंतिम चेतावनी दी है कि भविष्य में इस तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
फिलहाल, इस हाई-प्रोफाइल मामले में तीन पुलिसकर्मियों का निलंबन हो चुका है और विभागीय जांच का दायरा तेजी से फैल रहा है। जांच का मुख्य केंद्र इस बात पर है कि आखिर किस कानूनी प्रक्रिया के तहत खातों को फ्रीज कराया गया था और क्या पुलिसिया तंत्र का इस्तेमाल निजी रंजिश या अवैध वसूली के नापाक मंसूबों को पूरा करने के लिए किया जा रहा था। पीड़ित कारोबारी द्वारा दिए गए दस्तावेजों, बैंक विवरणों और कथित वीडियो साक्ष्यों की फॉरेंसिक और प्रशासनिक जांच के बाद इस बात से पर्दा उठेगा कि इस संगठित खेल में और कौन-कौन से चेहरे शामिल थे। निलंबन भले ही एक शुरुआती विभागीय कार्रवाई हो, लेकिन इस प्रकरण ने खाकी की कार्यसंस्कृति पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

