मेरठ। दिवाली से पहले दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वायु प्रदूषण का असर बढ़ने लगा है। शुक्रवार को मेरठ की हवा बेहद खराब स्थिति में पहुंच गई। शहर के एमआईईटी कॉलेज क्षेत्र में अधिकतम वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 301 दर्ज किया गया। इसी स्तर पर हरियाणा के मानेसर की हवा भी प्रदूषित रही। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दोनों स्थान 301 एक्यूआई के साथ शामिल 250 शहरों की तुलना में संयुक्त रूप से शीर्ष पर रहे। प्रदूषण का यह स्तर ऐसे समय में दर्ज किया गया है, जब दिवाली नजदीक है और पटाखों से होने वाले अतिरिक्त उत्सर्जन को लेकर भी चिंता बढ़ रही है।

मेरठ में प्रदूषण का असर केवल एक इलाके तक सीमित नहीं है। बेगमपुल में एक्यूआई 295, गंगानगर में 290 और पल्लवपुरम में 282 दर्ज किया गया। शहर का एक अन्य दिया गया आंकड़ा 279 रहा, जबकि जयभीमनगर में एक्यूआई 254 दर्ज हुआ। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि मेरठ के अलग-अलग क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। हालांकि, निगरानी केंद्रों पर दर्ज एक्यूआई में अंतर होने के कारण किसी एक स्थान के आंकड़े को पूरे शहर की औसत स्थिति नहीं माना जा सकता।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर के अन्य शहरों में भी वायु गुणवत्ता संतोषजनक नहीं रही। ग्रेटर नोएडा में एक्यूआई 280, बागपत में 269, मुजफ्फरनगर में 263 और गाजियाबाद में 241 दर्ज किया गया। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक्यूआई 232 रहा। इन आंकड़ों के मुताबिक, मेरठ के अधिकतम दर्ज स्तर पर प्रदूषण दिल्ली और गाजियाबाद की तुलना में अधिक रहा। ऐसे में दिवाली से पहले प्रदूषण नियंत्रण के उपायों को प्रभावी तरीके से लागू करना प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है।
एमआईईटी कॉलेज क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रदूषण
मेरठ के विभिन्न निगरानी क्षेत्रों के आंकड़े शहर में वायु गुणवत्ता की गंभीर स्थिति की ओर इशारा कर रहे हैं। एमआईईटी कॉलेज क्षेत्र में एक्यूआई 301 दर्ज हुआ, जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुसार बहुत खराब श्रेणी में आता है। बेगमपुल में 295 और गंगानगर में 290 एक्यूआई दर्ज किया गया। पल्लवपुरम में वायु गुणवत्ता सूचकांक 282 रहा।
इसके अलावा शहर का एक अन्य दिया गया एक्यूआई 279 और जयभीमनगर का 254 दर्ज किया गया। इन स्थानों पर प्रदूषण के स्तर में अंतर से पता चलता है कि स्थानीय परिस्थितियों और उत्सर्जन स्रोतों के कारण शहर के अलग-अलग हिस्सों में हवा की गुणवत्ता एक जैसी नहीं है।
किसी क्षेत्र में दर्ज अधिकतम एक्यूआई और पूरे शहर के औसत एक्यूआई में अंतर होता है। इसलिए शहरों की तुलना करते समय निगरानी केंद्र, आंकड़ों की समयावधि और मापन पद्धति को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके बावजूद विभिन्न इलाकों में लगातार ऊंचे एक्यूआई का दर्ज होना इस बात का संकेत है कि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए स्थानीय स्तर पर भी प्रभावी कार्रवाई की जरूरत है।
301 एक्यूआई का मतलब बहुत खराब हवा
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्धारित मानकों के अनुसार, एक्यूआई शून्य से 50 तक अच्छा, 51 से 100 तक संतोषजनक, 101 से 200 तक मध्यम, 201 से 300 तक खराब, 301 से 400 तक बहुत खराब और 401 से 500 तक गंभीर श्रेणी में आता है।
शुक्रवार को मेरठ के एमआईईटी कॉलेज क्षेत्र और मानेसर में एक्यूआई 301 दर्ज किया गया। इस स्तर पर हवा बहुत खराब श्रेणी में पहुंच जाती है। लंबे समय तक ऐसी हवा के संपर्क में रहने से लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। विशेष रूप से दमा, सांस संबंधी बीमारियों और हृदय रोग से प्रभावित लोगों को अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है।
प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण और अन्य प्रदूषक श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ लोगों को खांसी, गले में खराश, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी महसूस हो सकती है। हालांकि, प्रदूषण का प्रभाव हर व्यक्ति पर समान नहीं होता और यह स्वास्थ्य की स्थिति, प्रदूषण के स्तर तथा संपर्क की अवधि पर निर्भर करता है।
दिल्ली से ज्यादा प्रदूषित रही मेरठ की हवा
शुक्रवार को उपलब्ध आंकड़ों में मेरठ के एमआईईटी कॉलेज क्षेत्र का अधिकतम एक्यूआई 301 दर्ज हुआ, जबकि दिल्ली में यह 232 और गाजियाबाद में 241 रहा। ग्रेटर नोएडा में एक्यूआई 280, बागपत में 269 और मुजफ्फरनगर में 263 दर्ज किया गया।
इन आंकड़ों के आधार पर मेरठ के संबंधित निगरानी केंद्र पर प्रदूषण का स्तर दिल्ली और गाजियाबाद से अधिक रहा। हालांकि, यह तुलना उपलब्ध आंकड़ों तक सीमित है। अलग-अलग शहरों में निगरानी केंद्रों की संख्या, उनके स्थान और रिपोर्ट किए गए आंकड़ों की प्रकृति अलग हो सकती है। इसलिए किसी शहर के अधिकतम एक्यूआई की तुलना दूसरे शहर के औसत एक्यूआई से करना उचित नहीं होगा।
प्रदूषण की मौजूदा स्थिति यह भी दर्शाती है कि वायु गुणवत्ता की समस्या केवल राष्ट्रीय राजधानी तक सीमित नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहरों में भी प्रदूषण का स्तर बढ़ने से स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी बढ़ गई है।
मौसम की परिस्थितियां भी बढ़ा सकती हैं प्रदूषण
मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण बढ़ने के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं, सड़कों पर जमा धूल, निर्माण कार्यों से उड़ने वाले कण और औद्योगिक गतिविधियों से होने वाला उत्सर्जन वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इन स्रोतों का प्रभाव स्थानीय परिस्थितियों और मौसम के अनुसार बदल सकता है।
शुष्क मौसम में सड़कों और खुले स्थानों से धूल उड़ने की आशंका बढ़ जाती है। यदि हवा की गति कम रहती है, तो वातावरण में मौजूद प्रदूषक कणों का फैलाव सीमित हो सकता है। ऐसी स्थिति में स्थानीय स्तर पर उत्सर्जित प्रदूषक लंबे समय तक वातावरण में बने रह सकते हैं।
मौसम में बदलाव के साथ दिन और रात के तापमान में अंतर भी बढ़ रहा है। रात के समय तापमान कम होने और हवा की गति धीमी रहने की स्थिति में वातावरण की निचली परतों में प्रदूषकों के फैलाव पर असर पड़ सकता है। हालांकि, प्रदूषण के स्तर में बदलाव के लिए केवल तापमान को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हवा की दिशा, गति, नमी, स्थानीय उत्सर्जन और अन्य मौसमी परिस्थितियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
किसी एक स्रोत को प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बताने के लिए वैज्ञानिक स्रोत-विश्लेषण और संबंधित आंकड़ों की जरूरत होती है। फिलहाल उपलब्ध एक्यूआई के आंकड़े प्रदूषण के स्तर की जानकारी देते हैं, लेकिन वे अपने आप में प्रदूषण के सभी स्रोतों का योगदान निर्धारित नहीं करते।
दिवाली से पहले बढ़ी चिंता, पटाखों से बिगड़ सकती है स्थिति
दिवाली के नजदीक आने के साथ प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। पटाखों से निकलने वाला धुआं और सूक्ष्म कण वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। यदि पटाखों से होने वाले उत्सर्जन के समय हवा की गति कम रहती है, तो प्रदूषकों का फैलाव प्रभावित हो सकता है और उनका असर लंबे समय तक बना रह सकता है।
हालांकि, दिवाली के दौरान मेरठ में एक्यूआई किस स्तर तक पहुंचेगा, इसका सटीक अनुमान मौजूदा आंकड़ों के आधार पर नहीं लगाया जा सकता। यह उस समय की मौसम संबंधी परिस्थितियों, स्थानीय उत्सर्जन और प्रदूषण नियंत्रण के उपायों पर निर्भर करेगा।
पटाखों के अलावा वाहनों का धुआं, सड़क की धूल, निर्माण गतिविधियां और औद्योगिक उत्सर्जन भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते रहेंगे। ऐसे में केवल दिवाली के दिन प्रदूषण नियंत्रण पर ध्यान देने के बजाय त्योहार से पहले और बाद में भी नियमित निगरानी तथा प्रभावी कार्रवाई जरूरी होगी।
एनसीआर में GRAP के पहले चरण के तहत नियंत्रण उपायों पर जोर
दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान यानी जीआरएपी के पहले चरण के तहत उपाय लागू होने की जानकारी दी गई है। इस व्यवस्था का उद्देश्य वायु गुणवत्ता बिगड़ने पर संबंधित एजेंसियों के माध्यम से प्रदूषण नियंत्रण के कदम उठाना है।
इसके अंतर्गत सड़कों की धूल नियंत्रित करने, निर्माण स्थलों पर निर्धारित नियमों का पालन कराने, खुले में कचरा जलाने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने और प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों की निगरानी जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं। वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन और औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण संबंधी मानकों का पालन सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
हालांकि, किसी एक निगरानी केंद्र पर एक्यूआई 301 दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि पूरे एनसीआर में अपने आप जीआरएपी का अगला चरण लागू हो जाएगा। जीआरएपी के चरण निर्धारित मानकों, संबंधित परिस्थितियों और आधिकारिक निर्णयों के अनुसार लागू किए जाते हैं। इसलिए इस संबंध में ताजा आधिकारिक आदेशों को ही आधार माना जाना चाहिए।
धूल और वाहनों के धुएं पर नियंत्रण जरूरी
मेरठ में वायु प्रदूषण कम करने के लिए स्थानीय स्तर पर लगातार निगरानी और व्यावहारिक उपायों की जरूरत है। निर्माण स्थलों पर धूल रोकने की व्यवस्था, निर्माण सामग्री को ढककर रखना और निर्धारित नियमों के अनुसार कार्य कराना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। सड़कों की नियमित सफाई और धूल नियंत्रण के उचित उपाय भी वातावरण में उड़ने वाले कणों को कम करने में मदद कर सकते हैं।
वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए नियमित प्रदूषण जांच, वाहनों का उचित रखरखाव और अनावश्यक रूप से इंजन चालू रखने से बचना जरूरी है। औद्योगिक इकाइयों में उत्सर्जन मानकों का पालन सुनिश्चित करने के साथ संबंधित विभागों को निरीक्षण और निगरानी की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
इन उपायों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब उनका नियमित रूप से पालन कराया जाए। त्योहार के दौरान विशेष निगरानी के साथ सामान्य दिनों में भी प्रदूषण नियंत्रण संबंधी नियमों का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है।
बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को विशेष सावधानी की जरूरत
बहुत खराब श्रेणी की हवा में लंबे समय तक रहने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से सांस या हृदय संबंधी बीमारियों से प्रभावित लोगों को प्रदूषण के संपर्क को कम करने की सलाह दी जाती है।
एक्यूआई अधिक होने पर खुले स्थानों पर लंबे समय तक दौड़ने, तेज व्यायाम करने और अनावश्यक बाहरी गतिविधियों से बचना बेहतर है। जिन लोगों को बाहर निकलना जरूरी हो, वे सही फिटिंग वाला एन95 या समकक्ष कण-रोधी मास्क इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, मास्क का उपयोग प्रदूषण के सभी प्रभावों से पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता।
घर के भीतर धुआं पैदा करने वाली गतिविधियों से बचना चाहिए और सांस या हृदय संबंधी बीमारी की दवाएं चिकित्सक के निर्देशानुसार लेते रहना चाहिए। सांस लेने में गंभीर परेशानी, सीने में दर्द या अन्य गंभीर लक्षण होने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
लोगों को अपने क्षेत्र के एक्यूआई की ताजा जानकारी नियमित रूप से देखनी चाहिए, क्योंकि वायु गुणवत्ता दिनभर बदल सकती है। बच्चों और बुजुर्गों की बाहरी गतिविधियों को भी स्थानीय वायु गुणवत्ता के अनुसार सीमित करना उपयोगी हो सकता है।
मेरठ में दिन का तापमान 30.6 और रात का 18.2 डिग्री
प्रदूषण के बीच मेरठ में मौसम का मिजाज भी बदल रहा है। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की मौसम वेधशाला के अनुसार, शुक्रवार को शहर का अधिकतम तापमान 30.6 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 18.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।
दिन के समय तापमान 30 डिग्री से ऊपर बना हुआ है, जबकि रात में अपेक्षाकृत ठंडक महसूस होने लगी है। दिन और रात के तापमान में अंतर के कारण मौसम में बदलाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
आने वाले दिनों में तापमान में गिरावट की संभावना मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। इसी तरह प्रदूषण से राहत मिलने का संबंध भी हवा की गति, दिशा, स्थानीय उत्सर्जन और वातावरण में प्रदूषकों के फैलाव से रहेगा। यदि हवा की गति बढ़ती है और प्रदूषकों का फैलाव बेहतर होता है, तो वायु गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। इसके विपरीत, शुष्क मौसम और धीमी हवा बने रहने पर प्रदूषण का असर लंबे समय तक रह सकता है।
प्रशासन के सामने प्रदूषण नियंत्रण की चुनौती
दिवाली से पहले मेरठ में एक्यूआई का 301 तक पहुंचना पश्चिमी उत्तर प्रदेश और एनसीआर में वायु गुणवत्ता की स्थिति पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत को रेखांकित करता है। मेरठ के कई निगरानी क्षेत्रों में एक्यूआई 250 से ऊपर दर्ज किया गया, जबकि मानेसर में भी हवा बहुत खराब श्रेणी में पहुंच गई।
दिल्ली, गाजियाबाद, ग्रेटर नोएडा, बागपत और मुजफ्फरनगर में भी उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हवा खराब श्रेणी में रही। इससे स्पष्ट है कि प्रदूषण की चुनौती कई शहरों में बनी हुई है और इसके लिए स्थानीय स्तर पर कार्रवाई के साथ क्षेत्रीय समन्वय भी जरूरी है।
दिवाली के दौरान अतिरिक्त उत्सर्जन की आशंका को देखते हुए प्रदूषण नियंत्रण संबंधी नियमों का पालन, निर्माण स्थलों की निगरानी, धूल नियंत्रण और वाहनों तथा औद्योगिक इकाइयों से होने वाले उत्सर्जन पर ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल मेरठ के लोगों को वायु गुणवत्ता के ताजा आंकड़ों पर नजर रखने और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां अपनाने की जरूरत है। आने वाले दिनों में मौसम की परिस्थितियां और प्रदूषण नियंत्रण के उपाय यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि शहर की हवा में कितनी राहत मिलती है।

