शामली। जिले में जब आयुष मलिक ने चांदनी कुरैशी के नाम पर दिल हारा और अपनी मर्जी से इस्लाम कुबूल किया, तो तथाकथित धर्मरक्षकों के पेट में ऐसा मरोड़ उठा कि पूरा प्रशासनिक अमला ‘स्क्रिप्ट’ लिखने बैठ गया। चांदनी और उसके बेगुनाह कुनबे को जेल में ठूंस दिया गया, आयुष को ‘घर वापसी’ के नाम पर कैद में रखकर ब्रेनवॉश की बेतुकी कहानियां गढ़ी गईं, और बात न बनी तो जबरन विदेशी कनेक्शन’ का तड़का भी लगा दिया गया। शामली पुलिस को शायद मुगालता था कि खाकी वर्दी किसी बालिग के दिल की धड़कनों पर भी पहरा लगा सकती है।

लेकिन 16 सितंबर की तारीख ने साबित कर दिया कि जब मुल्क का संविधान जागता है, तो नफरत की हर अदालत औंधे मुंह गिरती है। #इलाहाबाद #हाईकोर्ट के कटघरे में खड़े होकर जब आयुष ने सीना तानकर भरी अदालत में कहा—”मैंने अपनी मर्जी से कलमा पढ़ा है और मैं चांदनी के साथ ही जिऊंगा-मरूंगा”—तो पुलिसिया साजिशों के सारे पन्ने बिखर गए। माननीय अदालत ने शामली पुलिस की हेकड़ी निकालते हुए आयुष को फौरन आजाद करने का हुक्म दिया और साफ कह दिया कि हर बालिग को अपनी मर्जी से खुदा चुनने और मोहब्बत निभाने का पूरा हक है। यह फैसला उन तमाम नफरती ठेकेदारों के मुंह पर करारा तमाचा है जो प्यार को मजहब के तराजू में तौलते हैं; आखिरकार मोहब्बत और लोकतंत्र जीत गया, और नफरत कानून के सामने हाथ बांधे खड़ी रह गई।


