मोरना (मुजफ्फरनगर)। पौराणिक तीर्थ नगरी शुकतीर्थ में पतित पावनी मां गंगा को प्रदूषित किए जाने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। शनिवार को लगातार छठे दिन भी गंगा नदी में फैक्ट्रियों से छोड़ा गया कथित केमिकलयुक्त काला और बदबूदार पानी बहता रहा। गंगा की धारा का रंग काला पड़ने और पानी से उठ रही तेज दुर्गंध ने न केवल पर्यावरण को गंभीर खतरे में डाल दिया है, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को भी गहरी ठेस पहुंचाई है। सबसे गंभीर बात यह है कि कई दिनों से प्रदूषण का यह सिलसिला जारी रहने के बावजूद अब तक जिम्मेदार फैक्ट्रियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे साधु-संतों, किसानों और स्थानीय लोगों में भारी रोष व्याप्त है।

गंगा में फैल रहे प्रदूषण के कारण शुकतीर्थ के घाटों का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। जहां सामान्य दिनों में श्रद्धालु बड़ी संख्या में गंगा स्नान और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं, वहीं अब काले और दुर्गंधयुक्त पानी को देखकर लोग बिना स्नान किए ही वापस लौटने को मजबूर हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि जिस गंगा को मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी माना जाता है, उसी की धारा में जहरीला पानी बहना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

स्थानीय लोगों के अनुसार बीते मंगलवार से गंगा नदी में अचानक काले रंग का गाढ़ा केमिकलयुक्त पानी आना शुरू हुआ था। इसके बाद से लगातार नदी का स्वरूप बिगड़ता चला गया। पानी में ऑक्सीजन का स्तर घटने के कारण बड़ी संख्या में मछलियों और अन्य जलीय जीवों की मौत हो गई। घाटों और किनारों पर मृत मछलियां तैरती दिखाई दीं, जिससे पूरे क्षेत्र में दुर्गंध फैल गई। लोगों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो गंगा का जलीय जीवन पूरी तरह संकट में पड़ सकता है।
साधु-संतों और खादर क्षेत्र के किसानों ने प्रदूषण नियंत्रण विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि विभाग केवल औपचारिकताएं निभा रहा है। बुधवार और शुक्रवार को विभागीय टीम ने गंगा जल के नमूने तो लिए, लेकिन केवल पानी में ऑक्सीजन की मात्रा की जांच की गई। पानी में मौजूद जहरीले रासायनिक तत्वों और औद्योगिक अपशिष्ट की जांच नहीं की गई, जिससे प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों को बचाने का प्रयास दिखाई दे रहा है। लोगों का कहना है कि जब तक वैज्ञानिक तरीके से रासायनिक जांच नहीं होगी, तब तक वास्तविक दोषियों की पहचान संभव नहीं है।
शुक्रवार को जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. वीरपाल निर्वाल और जानसठ की एसडीएम रश्मि लांबा ने शुकतीर्थ पहुंचकर गंगा घाट का निरीक्षण किया था। अधिकारियों ने स्थिति का जायजा लेते हुए शीघ्र कार्रवाई का भरोसा भी दिलाया था, लेकिन शनिवार तक भी गंगा का पानी काला ही बहता रहा। प्रदूषण फैलाने वाली किसी फैक्ट्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने, सीलिंग की कार्रवाई या अन्य किसी सख्त कदम की जानकारी सामने नहीं आई। इससे लोगों में प्रशासन की कार्यशैली को लेकर नाराजगी और बढ़ गई है।
मां पूर्णागिरि आश्रम के महंत महामंडलेश्वर स्वामी गोपालदास महाराज ने गंगा प्रदूषण को लेकर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने गंगा स्नान घाट पर साधु-संतों के साथ प्रदर्शन करते हुए कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसे प्रदूषित करने वालों के खिलाफ तत्काल कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि गंगा में जहरीला पानी छोड़े जाने का सिलसिला नहीं रुका और दोषी फैक्ट्रियों को बंद नहीं किया गया तो संत समाज सड़कों पर उतरकर बड़ा जनआंदोलन और चक्का जाम करने के लिए मजबूर होगा। इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन और प्रदूषण फैलाने वालों की होगी।
गंगा प्रदूषण का असर केवल धार्मिक और पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि कृषि पर भी पड़ रहा है। खादर क्षेत्र के किसानों का कहना है कि गंगा के इसी पानी से खेतों की सिंचाई होती है। यदि यही जहरीला पानी खेतों तक पहुंचता रहा तो फसलें नष्ट होने लगेंगी और जमीन की उर्वरा शक्ति भी प्रभावित होगी। किसानों ने आशंका जताई कि इस पानी का असर पशुओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रदूषण पर रोक नहीं लगी तो आने वाले समय में कृषि और पशुपालन दोनों गंभीर संकट में आ जाएंगे।
क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, साधु-संतों और किसानों ने जिलाधिकारी से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि गंगा में प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में कोई भी औद्योगिक इकाई पवित्र गंगा को प्रदूषित करने का साहस न कर सके। लोगों ने मांग की है कि मां गंगा की अविरल और निर्मल धारा को हर हाल में सुरक्षित रखा जाए, क्योंकि यह केवल एक नदी नहीं बल्कि देश की सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक विरासत का प्रतीक है।

