भोपाल। देश में छठवीं से लेकर आठवीं तक के 81 फीसदी स्कूली बच्चे पढ़ाई, परीक्षा और रिजल्ट के कारण एंग्जाइटी का शिकार हैं। 43 प्रतिशत बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता है। हाल ही में हुए एनसीईआरटी के सर्वे में यह खुलासा हुआ है।
आइडेंटिटी क्राइसिस, रिश्तों को लेकर बढ़ती संवेदनशीलता, समकक्षों के दबाव, बोर्ड परीक्षा का डर, भविष्य में एडमिशन को लेकर चिंता- सर्वे के मुताबिक मध्यप्रदेश समेत देश में 73 प्रतिशत बच्चे स्कूल जीवन से संतुष्ट हैं। 51 फीसदी बच्चे निजी जीवन से संतुष्ट हैं। हायर सेकंडरी स्कूल के बच्चों में आइडेंटिटी क्राइसिस, रिश्तों को लेकर बढ़ती संवेदनशीलता, समकक्षों के दबाव, बोर्ड परीक्षा का डर, भविष्य में एडमिशन को लेकर चिंता और अनिश्चितता जैसी चुनौतियां देखने को मिलीं।

ऑनलाइन पढ़ाई से असंतुष्ट कई विद्यार्थी
51 फीसदी विद्यार्थियों ने माना कि उन्हें ऑनलाइन कंटेट सीखने में परेशानी होती है। जहां सबने माना कि वर्चुअल दुनिया में दूरियां बढ़ी हैं वहीं बच्चों ने भी इसे महसूस किया। 39 फीसदी छात्रों का कहना है कि ऑनलाइन क्लास से आपसी बातचीत में भी कमी हुई है।

बढ़ते तनाव के बड़े कारण
– पढ़ाई का पैटर्न बदल गया है। आजकल बच्चे जो पढ़ रहे हैं उस पर ध्यान कम देकर आगे की पढ़ाई पर ज्यादा फोकस करते हैं।
– बढ़ते कॉम्प्टीशन के कारण उम्र से पहले ही बच्चों पर दबाव डाला जा रहा है। सोसायटी और पीयर प्रेशर भी एक बड़ा कारण है।
समाधान
– पाठ्यक्रम में तनाव प्रबंधन को शामिल किया जाना चाहिए।
– छात्रों को पहले वास्तविकता में जीना चाहिए। भविष्य की चिंता न करें।
– क्षमता के हिसाब से लक्ष्य तय करें। नींद पूरी करें। स्क्रीन टाइम कम करें।
– जरूरी है कि अगर तनाव हो रहा है तो उसके बारे में अपनों से बात करें। पैरेंट्स टीचर्स काउंसलर्स और फ्रेंड्स आदि की मदद लें।