
कांग्रेस में राहुल गांधी का प्रयोग असफल हो जाने के बाद इस बार 2027 के चुनाव की कमान प्रियंका गांधी संभालेंगी, वहीं यह चुनाव सपा व कांग्रेस मिलकर लड़ेंगी। उधर बसपा के साथ ओवैसी की पार्टी का गठबंधन हो सकता है। जबकि एनडीए के घटक दलों की स्थिति अभी स्पष्ट नही है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर एक बात तो साफ होती दिख रही है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ेगी। हाल ही में दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया ब्लॉक की मीटिंग में समावादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और नेता प्रतिपक्ष वह कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की जुगलबंदी देखने को मिली। दोनों नेताओं का एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए तस्वीर मीडिया में देखने को मिली। इस तस्वीर के बीच उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने एक नई बहस को जन्म दे दिया। माना जा रहा था कि 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह अखिलेश यादव और राहुल गांधी की जोड़ी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में भी नेतृत्व करते दिखेंगे लेकिन अजय राय ने कहा है कि जिस तरह से 2022 में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया था 2027 में भी हम उनके ही नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे। यानि कि 2027 में राहुल नही बल्कि प्रियंका गांधी कांग्रेस चुनाव की कमान संभालेंगी। 2022 में कांग्रेस ने वाराणसी के आठ विधानसभा सीट में से चार विधानसभा सीट पर महिला उम्मीदवारों को उतारा था। कांग्रेस ने 40% महिलाओं की भागीदारी तय की थी और इस बार भी वह अधिक से अधिक महिलाओं को उत्तर प्रदेश के चुनाव में अवसर देगी।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में हुई इंडी ब्लॉक की बैठक में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की शानदार जुगलबंदी देखने को मिली। दोनों नेताओं की हाथ थामे हुए तस्वीर ने साफ संदेश दिया कि सूबे में सपा-कांग्रेस गठबंधन बरकरार रहेगा। आम तौर पर माना जा रहा था कि 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह ही 2027 के विधानसभा चुनाव में भी राहुल-अखिलेश की जोड़ी ही गठबंधन का चेहरा होगी लेकिन ऐसा नहीं लगता है। कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका गांधी वाड्रा के जन्मदिन (जो राष्ट्रीय युवा दिवस भी है) के मौके पर लखनऊ से ‘परिवर्तन प्रतिज्ञा प्रोग्राम’ लॉन्च किया। तभी से 2027 की शुरुआत हो गयी थी। इसका सीधा मकसद उन गैर-यादव पिछड़े वर्गों और समुदायों तक पहुंच बनाना है, जो 2014 के बाद बीजेपी की तरफ चले गए थे, लेकिन अब सत्ता विरोधी लहर के संकेत दे रहे हैं। गांव स्तर पर ‘परिवर्तन प्रतिज्ञा संवाद’ से लेकर कॉलेजों में ‘प्रतिज्ञा युवा संसद’, पदयात्राएं और मैराथन आयोजित किए जा रहे हैं। राहुल गांधी भी इस अभियान के तहत संभाग स्तर के सम्मेलनों को लीड कर सकते हैं।कांग्रेस अब यूपी में सिर्फ जातिगत राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वह बीजेपी को उसके मजबूत मुद्दों पर भी घेर रही है।प्रियंका गांधी के हालिया सोशल मीडिया पोस्ट इसके गवाह हैं।
15 जनवरी को प्रियंका ने वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर तोड़फोड़ का वीडियो साझा कर यूपी सरकार को घेरा। उन्होंने लिखा- ‘विकास के नाम पर, कुछ लोगों के व्यावसायिक फायदे के लिए देश की धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर को नष्ट करना पाप है। काशी की आध्यात्मिक पहचान को मिटाने की साजिशें रुकनी चाहिए। इससे पहले 19 दिसंबर को प्रियंका ने बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की हत्या पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारत सरकार से मांग की थी कि वह पड़ोसी देश में हिंदू, ईसाई और बौद्ध अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा बांग्लादेश सरकार के सामने मजबूती से उठाए। इन बयानों से साफ है कि कांग्रेस यूपी में ओबीसी वोट बैंक साधने के साथ-साथ खुद पर लगने वाले ‘तुष्टिकरण’ के आरोपों को धोकर बीजेपी को उसी के राष्ट्रवाद और धार्मिक पिच पर चुनौती दे रही है। सोनिया गांधी राज्यसभा में हैं, जबकि राहुल गांधी रायबरेली और प्रियंका गांधी वायनाड़ से लोकसभा में हैं। प्रियंका की बढ़ती सक्रियता के बीच दिसंबर 2025 में केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने दावा किया था कि दोनों भाई-बहनों में अनबन है। यह विवाद तब बढ़ा जब सहारनपुर के कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कह दिया कि प्रियंका में पूर्व पीएम इंदिरा गांधी की छवि है और वह एक मजबूत प्रधानमंत्री साबित हो सकती हैं। हालांकि, कांग्रेस ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि प्रियंका हमेशा राहुल के हाथ मजबूत करने वाली भूमिका में रही हैं। यूपी में सपा और कांग्रेस के गठबंधन के उतार-चढ़ाव भरे इतिहास को प्वाइंटर्स में इस तरह देख सकते हैं।
2017 का चुनाव सपा और कांग्रेस ने मिलकर लड़ा था और उनकी थीम यूपी के दो लड़के थी। हालांकि, यह गठबंधन पूरी तरह फ्लॉप रहा और कांग्रेस महज 7 सीटों पर सिमट गई थी। 2022 के चुनाव में ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ नारा कांग्रेस की प्रियंका ने दिया था। इस चुनाव में दोनों पार्टियां अलग-अलग मैदान में उतरी थीं। कांग्रेस ने लड़की हूं, लड़ सकती हूं के नारे के साथ चुनाव लड़ा, लेकिन उसे भारी नुकसान हुआ और सिर्फ 2 सीटें मिलीं। वहीं, समाजवादी पार्टी अकेले लड़ते हुए 111 सीटों पर पहुंची थी। इस चुनाव में सपा और कांग्रेस एक बार फिर इंडी ब्लॉक’ के तहत साथ आए और उन्हें बंपर सफलता मिली। गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बीजेपी को महज 33 सीटों पर समेट दिया, जिसमें सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की। 2024 की बड़ी सफलता के बाद 2027 में भी दोनों दलों के साथ आने की उम्मीदें तो बहुत हैं, लेकिन राह में कई अड़चनें और चुनौतियां भी हैं। कांग्रेस हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव हरियाणा और महाराष्ट्र में मिली हार के झटकों से उबरने की कोशिश कर रही है। यूपी में अच्छा प्रदर्शन ही राहुल गांधी को 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए मुख्य विपक्षी चेहरे के रूप में मजबूती से स्थापित कर सकता है। अखिलेश यादव यूपी में ‘बिग ब्रदर’ की भूमिका में हैं। ऐसे में अजय राय का यह कहना कि चुनाव प्रियंका गांधी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा, सीट शेयरिंग की बातचीत के दौरान सपा के साथ टकराव पैदा कर सकता है। कांग्रेस दशकों से उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर है। राज्य में लगातार नेतृत्व बदलने के कारण बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करना प्रियंका गांधी के लिए सबसे कठिन काम होगा। यूपी 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि क्या 2024 की सफलता सिर्फ एक चुनावी लहर थी या वाकई में कांग्रेस-सपा ने मिलकर जमीन पर बीजेपी के अपराजेय रथ को रोक दिया है। प्रियंका गांधी का बढ़ता दखल और अजय राय का बयान गठबंधन के भविष्य को किस दिशा में ले जाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। यद्यपि देश में जिस तरह का माहौल है उससे नही लगता कि प्रियंका कोई करिश्मा दिखा पाएंगी। क्योकि काफी मशक्कत के बाद भी राहुल के हाथ अभी तक खाली ही हैं। जनता उनकी परिपक्वता का अहसास अभी तक नही कर पाई है।

आर पी तोमर
