शुकतीर्थ (मुजफ्फरनगर)। अयोध्या के प्रसिद्ध कोसी परिक्रमा मार्ग की तर्ज पर करीब ढाई दशक पहले तैयार किया गया शुकतीर्थ का ऐतिहासिक ‘संत परिक्रमा मार्ग’ आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। कभी संतों की साधना, आध्यात्मिक चिंतन और धार्मिक शोभायात्राओं का प्रमुख केंद्र रहा यह मार्ग अब प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होकर गड्ढों, जलभराव और टूटी सुविधाओं के बीच अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। मार्ग की जर्जर स्थिति से न केवल स्थानीय संत समाज में भारी नाराजगी है, बल्कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। संतों ने शासन और प्रशासन से तत्काल इस ऐतिहासिक मार्ग के पुनरुद्धार की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा।

शुकतीर्थ को धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों में गिना जाता है। सरकार की ओर से तीर्थ नगरी के विकास, सौंदर्यीकरण और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए जाते रहे हैं। इसके बावजूद शुकतीर्थ का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक मार्ग बदहाली का प्रतीक बन चुका है। संत समाज का कहना है कि यदि तीर्थ के मूल स्वरूप और धार्मिक धरोहरों की ही उपेक्षा होती रही तो विकास के सारे दावे केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगे।

करीब पच्चीस वर्ष पहले बनाए गए इस परिक्रमा मार्ग की शुरुआत शुकतीर्थ गंगा घाट से होती है। यह मार्ग बिहारगढ़, इलाहाबास, बहुपुरा, शुक्रतारी और फिरोजपुर होते हुए नीलकंठ महादेव मंदिर, पार्वती धाम, सद्गुरु समनदास आश्रम तथा दुर्गाधाम से गुजरते हुए पुनः गंगा घाट पर समाप्त होता है। इस पूरे मार्ग का उद्देश्य श्रद्धालुओं और संतों को एक शांत, प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण में परिक्रमा कराने का था।
जब इस मार्ग का निर्माण हुआ था तब इसे अत्यंत सुव्यवस्थित रूप दिया गया था। श्रद्धालुओं के विश्राम के लिए लगभग हर सौ मीटर की दूरी पर मजबूत और आकर्षक बेंच लगाई गई थीं। मार्ग के दोनों ओर छायादार और फलदार वृक्ष रोपे गए थे ताकि परिक्रमा करने वालों को धूप से राहत मिल सके। पेयजल की सुविधा के लिए जगह-जगह हैंडपंप लगाए गए थे और पूरा मार्ग धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से एक आदर्श मॉडल माना जाता था।
समय बीतने के साथ रखरखाव के अभाव में इस ऐतिहासिक मार्ग की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। आज सड़क जगह-जगह से उखड़ चुकी है। गहरे गड्ढों और बरसात के दौरान होने वाले जलभराव ने यात्रा को जोखिम भरा बना दिया है। अधिकांश बेंच या तो टूट चुकी हैं या पूरी तरह गायब हो चुकी हैं। पेयजल के लिए लगाए गए हैंडपंप भी कहीं दिखाई नहीं देते। वृक्षों की देखभाल नहीं होने से हरियाली भी समाप्त होती जा रही है। परिणामस्वरूप श्रद्धालुओं और संतों को परिक्रमा के दौरान भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
शुकतीर्थ में हर वर्ष देश के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। अधिकांश श्रद्धालु ई-रिक्शा के माध्यम से इस संत परिक्रमा मार्ग का भ्रमण करते हैं, लेकिन सड़क की जर्जर स्थिति के कारण ई-रिक्शा कई स्थानों पर फंस जाते हैं या पलटने की नौबत आ जाती है। कई बार चालक बीच रास्ते से ही वापस लौटने को मजबूर हो जाते हैं। इससे श्रद्धालुओं की परिक्रमा अधूरी रह जाती है और वे निराश होकर लौटते हैं।
स्थानीय संतों का कहना है कि तीर्थ के विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक मार्ग की सुध लेने वाला कोई नहीं है। उनका कहना है कि केवल सड़क की मरम्मत कर देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे परिक्रमा मार्ग का व्यापक नवीनीकरण किया जाना चाहिए। मार्ग के दोनों ओर फिर से बेंच लगाई जाएं, छायादार और फलदार वृक्ष लगाए जाएं, पेयजल की समुचित व्यवस्था की जाए तथा संतों के बैठकर ध्यान और साधना करने के लिए निश्चित दूरी पर ‘संत आसन’ बनाए जाएं। इससे न केवल संत समाज को सुविधा मिलेगी बल्कि आने वाले श्रद्धालुओं का आध्यात्मिक अनुभव भी बेहतर होगा।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले सुबह और शाम इस मार्ग पर संतों का नियमित विचरण होता था। संतों के दर्शन और आशीर्वाद से पूरा क्षेत्र आध्यात्मिक वातावरण से सराबोर रहता था। गांवों के लोग श्रद्धापूर्वक संतों का स्वागत करते थे और धार्मिक परंपराओं का जीवंत स्वरूप दिखाई देता था। लेकिन मार्ग की दुर्दशा के कारण अब वह वातावरण लगभग समाप्त हो चुका है।
संत समाज ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने शीघ्र ही इस ऐतिहासिक संत परिक्रमा मार्ग के जीर्णोद्धार और आवश्यक सुविधाओं की बहाली के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो संतों और ग्रामीणों के साथ मिलकर व्यापक आंदोलन किया जाएगा। उनका कहना है कि यह केवल सड़क का मामला नहीं बल्कि शुकतीर्थ की धार्मिक विरासत, संत परंपरा और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा विषय है, जिसकी अनदेखी अब किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी।

