भारत के गौरव को नष्ट करने की साजिश अभी नहीं हुई है विफल

भारत के गौरव को नष्ट करने की साजिश अभी नहीं हुई है विफल

नयी दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बौद्धिक प्रभाग ‘प्रज्ञा प्रवाह’ के संयोजक जे. नंदकुमार का कहना है कि अंग्रेज़ों, इस्लामिक ताकतों और कम्युनिस्ट शक्तियों ने मिल कर भारत के इतिहास विशेषकर स्वतंत्रता के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर जनसामान्य के मन में हीन भावना भरने और देश के गौरव को नष्ट करने की साजिश रची जिसे अभी तक विफल नहीं किया जा सका है।
नंदकुमार ने संघ से जुड़े बुद्धिजीवियों के संगठन ‘जिज्ञासा’ के पांचवे स्थापना दिवस पर “भारतीय बुद्धिजीवियों की मानसिक औपनिवेशिकता से मुक्ति’ विषय पर आयोजित एक व्याख्यान में यह विचार रखते हुए कहा कि समाज के लिए यह खतरे वाली बात है कि भारतीय सामान्य बौद्धिक वर्ग में लोगों के मन का गुरुत्व केन्द्र पश्चिम की ओर झुका है। इस खतरे से बचने के लिए बौद्धिक जगत का स्वभाविक मानसिक झुकाव भारत में भी होना चाहिए और इसके लिए समाज को सत्य का बोध कराया जाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में स्वदेशी की परिभाषा दो विभूतियों – महात्मा गांधी और महर्षि अरविंद ने दी और बताया कि स्वतंत्रता के मूल में ‘स्व’ है। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में कहा गया है कि वर्चस्व के विरुद्ध हमेशा से हर कहीं संघर्ष होता आया है और ये भारत में भी हुआ। मुगलों एवं अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष 1857 से कहीं पहले से शुरू हो चुका था।
नंदकुमार ने कहा कि पूरे विश्व में अनेक जगहों पर क्रांति हुई। कहीं भूभाग के लिए और कहीं राजपाट के लिए। भारत में भी पुनरोत्थान या नवोत्थान हुआ। लेकिन भारत में पुनरोत्थान समर्पण एवं सेवा भाव से काम करते हुए पूरे विश्व को प्रकाश देने के लिए हुआ। हमने हमेशा ही पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाने और सभी को दुखों एवं कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए कामना की। लेकिन वामपंथी विचारकों ने अंग्रेजों एवं इस्लामिक ताकतों के एजेंडे का आगे बढ़ाया और कहा कि अंग्रेज़ों के आने के पहले भारत कोई राष्ट्र नहीं था। यह केवल अफगानिस्तान एवं बर्मा के बीच एक भूभाग मात्र था। वामपंथियों का कहना है कि राष्ट्र एक आधुनिक अवधारणा है और यह सामंतवाद एवं पूंजीवाद का सह उत्पाद मात्र है।
उन्होंने वामपंथियों की इस राय का खंडन करते हुए कहा कि ऋग्वेद का एक श्लोक को उद्धरित करते हुए कहा कि विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद में भी राष्ट्र की अवधारणा लिखित है कि हमारे इस राष्ट्र को देवता भी पूजते हैं। हमारे यहां पूरे विश्व के कल्याण के लिए ऋषियों मुनियों ने तप किया है। तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बंगाल सभी जगह हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में संपूर्ण भारतवर्ष एवं जम्बूद्वीप के रूप में एक राष्ट्र की कल्पना की गयी है। हिन्दुओं के धार्मिक अनुष्ठान में पंडितों द्वारा कराया जाने वाला संकल्प का मंत्र भी राष्ट्र की अवधारणा की पुष्टि करता है। हमारी विश्व के कल्याण की अवधारणा में केवल मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी, कीट-पंतगों का भी स्थान है।
नंदकुमार ने कहा कि भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के बारे में भी इतिहासकारों ने बहुत ही संकीर्ण एवं विदेशी विचारधारा का पोषण करने वाली सामग्री प्रस्तुत की है। 1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा गया लेकिन सच यह है कि 1857 से दशकों पहले ही केरल में, पूर्वी भारत में आदिवासियों ने एक दशक से अधिक समय तक अंग्रेजों से संघर्ष किया। बंगाल में संन्यासी विद्रोह, संथाल युद्ध के अलावा तमिलनाडु में सिवगंगा और कर्नाटक में भी संघर्ष हुआ। रानी अब्बका, रानी चेन्नम्मा, वेलु नाच्यार, मरुतु बंधु, आदि के नाम का कहीं स्वतंत्रता के इतिहास में कोई उल्लेख नहीं है।
उन्होंने कहा कि देश जब आज़ाद हुआ तब अंग्रेज़ों ने वामपंथी, इस्लामिक एवं हिन्दू विरोधी विचार के लोगों को भारतीय शिक्षा पद्धति की रचना में लगा दिया जिसका परिणाम यह है कि हमारा समाज अभी तक औपनिवेशिककाल की मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाये हैं। उदाहरण के लिए हमारे जन्मदिन मनाने का तरीका हो या भाषायी आग्रह। हम अभी तक पूरी तरह से भारतीय परंपराओं को नहीं अपना पाये हैं। उन्होंने कहा कि हमारे समाज के मनमस्तिष्क में एक ऐसा कीट डाल दिया था जो हमारे स्नायुतंत्र को खा ले और हममें खुद को पहचानने की शक्ति को समाप्त कर दे।
नंदकुमार ने कहा कि यह साजिश 17 मई 2014 को नाकाम हो गयी और इसका प्रमाण है कि लंदन स्थित संडे गार्डियन अखबार ने 18 मई 2014 के अंक में भारत के लोकसभा परिणाम को लेकर समाचार के शीर्षक में लिखा, “इंडियाज़ एनॉदर ट्राइस्ट विद की डेस्टनी’। ब्रिटेन के सत्ताधीशों ने मान लिया कि भारत ने उस दिन वास्तविक आज़ादी यानी मानसिक स्वतंत्रता की दिशा में कदम बढ़ा दिये हैं। उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष के मौके पर इस विषय पर समग्रता से विचार करना बहुत ही महत्वपूर्ण है और निश्चित रूप से धीरे धीरे समाज का जागरण हो रहा है जो रुकने वाला नहीं है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व प्रमुख प्रो. राजकुमार भाटिया ने की और संचालन देवरत्न शर्मा ने की।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *