
जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर व वर्तमान शासन नायक श्री महावीर स्वामी जी का जन्म चैत्रशुक्ला त्रयोदषी के मंगल दिन वैशाली-कुण्डग्राम बिहार में सिद्धार्थ राजा के ‘नद्यावर्त’ नामक राजप्रसाद में हुआ था। तीर्थंकर का अवतार होते ही तीनों लोक आश्चर्यकारी आनन्द से खलबला उठे। वैशाली में प्रभुजन्म से पूर्व चारों ओर नूतन आनन्द का वातावरण छा गया देव कुमारियों त्रिशला माता की सेवा करती थी। नित्य नवीन आनन्दकारी तत्व चर्चा करती थी। गौरववन्ती वैशाली-कुण्डलपुर की शोभा अयोध्या नगरी जैसी थी, उसमें तीर्थकर के अवतार की पूर्वसूचना से सम्पूर्ण नगरी की शोभा में ओर भी वृद्धि हो गयी थी। तदनुसार जिनराज के अवतार की तैयारी में समस्त वैशाली ग्राम की शोभा में आश्चर्यजनक परिवर्तन होने लगा। प्रजाजनों में सुख, समृद्धि एवं आनन्द की वृद्धि होने लगी तथा महाराजा सिद्धार्थ के प्रांगण में प्रतिदिन तीन बार साढ़े तीन करोड रत्नों की वर्षा होती थी। नगरजन नगरी की दिव्य शोभा तथा रत्नवृष्टि देखकर विस्मित होने लगे कि अरे! इस नगरी में कोई महान आत्मा जन्म लेने वाली है जिसके गृह आंगन में प्रतिदिन ऐसे रत्नों की वर्षा होती है। इन्द्र ऐरावत हाथी लेकर जन्मोत्सव मनाने आ पहुॅचा। भक्ति भावना से प्रेरित होकर वह सौधर्म इन्द्र अपने समस्त इन्द्र परिवार के साथ जन्मोत्सव मनाने के लिये तत्पर हुए। एक बार बाल महावीर अपने बालमित्रों के साथ वन में खेल रहे थे अचानक एक आश्चर्यजनक घटना हुई, फॅ फॅ करता हुआ एक भयंकर विषैला नाग अचानक ही फुफकारता हुआ वहा आ पहुॅचा जिसे देखक सब मित्र इधर-उधर भागने लगे क्योंकि उन्होंने कभी ऐसा भयंकर विषैला सर्प नहीं देखा था, परन्तु महावीर न तो भयभीत हुए तथा न ही भागे। अहिंसा के अवतार महावीर को मारने वाला कौन है, वे तो निर्मयता से सर्प की चेष्टायें देखते रहे जैसे मदारी सांप का खेल खेल रहा हो और हम देख रहें हो तदानुसार वर्द्धमान कुमार उसे देख रहे थे। शान्तचित से निर्भयतापूर्वक अपनी ओर देखते हुए वीरकुमार को देखकर नागदेव आश्चर्यचकित हो गया कि वाह! ये वर्द्धमान कुमार आयु में छोटे होने पर भी महान है वीर है उसने उन्हे डराने के लिए अनेक प्रयत्न किये बहुत फॅफकारा परन्तु वीर तो अडिग रहे व निर्भयता से सर्प के साथ खेलने के लिये उसके पास जाने लगे। दूर खड़े राज कुमार यह देख घबराने लगे कि अब क्या होगा। सर्प को भगाने के लिये क्या किया जाये इतने में लोग क्या देखतें है कि यह भयंकर सर्प अपने आप अदृश्य हो गया। उसके स्थान पर एक तेजस्वी देव खड़ा था और हाथ जोडकर वर्द्धमान की स्तुति करते हुए कह रहा था कि हे देव आप सचमुच महावीर है आपके अतुल बल की प्रशंसा स्वर्ग के इन्द्र भी करते हैं। मैं स्वर्ग का देव हूँ मैंने अज्ञान भाव में आपके बल और धैर्य की परीक्षा हेतू नाग का रूप धारण किया मुझे क्षमा कर दें। तीर्थकरों की दिव्यता वास्तव में अद्भुत है प्रभु आप वीर नहीं किन्तु महावीर है। गंगा नदी के पश्चिमी तट पर (पटना बाहर के सामने वाले किनारे) वैशाली-कुण्डग्राम के ‘नागखण्ड’ नामक उपवन में शिविका से उतरकर प्रभु महावीर एक स्फटिक शिला पर विराजे तथा उत्तरमुख विराजमान वर्द्धमान कुमार ने नमः सिद्धेभ्यः कहकर प्रथम सिद्धों को नमस्कार किया इस प्रकार देहतीत सिद्धों को निकट लाकर प्रभु ने देह के आभूषण उतारे. वस्त्र भी एक-एक करके उतार दिये और सर्वथा दिगम्बर दशा धारण की वर्द्धमान कुमार जितने दैवी वस्त्रों में शोभते थे उसकी अपेक्षा दिगम्बर दशा में मुनिराज महावीर अधिक सुषोमित होने लगे। रत्नत्रय द्वारा प्रभु सुषभित हो उठे और प्रभु के आश्रय से रत्नत्रय शोभायमान हो गया। अरे, किन्तु प्रभु और रत्नत्रय भिन्न कहाँ थे। जो कि एक-दूसरे से सूषोभित होते? प्रभु स्वयं रत्नत्रयरूप परिणमित थे भेदवासना का विलय हो अभेद आत्मानुभूति में लीनता हो।
मार्ग शीर्ष कृष्णा दशमी के संध्याकाल स्वयं दीक्षित होकर महावीर मुनिराज तप धारण करके अप्रमत्तभाव से चैतन्यध्यान में लीन हो गये। अहा। भगवान विरलवन्त हुए. तीन ज्ञान से चार ज्ञानवन्त हुए, अनेक महान ऋद्धिया प्रगट हो गई। वाह! कैसी अदभुत है उनकी शान्त ध्यानमुद्रा प्रभु की ध्यानमुद्रा से प्रेरित होकर चारों ओर हजारो भव्यजीव भी चैतन्य का ध्यान धरने लगे है। अरे ध्यानस्थ प्रभु की शान्तमुद्रा देखकर वन के सिंह, हाथी, हिरण, सर्पादि पशु भी मुग्ध होकर शान्ति से प्रभुचरणों में बैठ गये। अहा “जिनकी मुद्रा देखने से आत्मस्वरूप के दर्शन हों ऐसे उन ध्यानस्थ मुनिराज का क्या कहना! वह तो साक्षात् मोक्षतत्व ही बैठा है।
महावीर भगवान के पाँच सिद्धान्त पूरे विश्व में अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रहमचर्य एवं अपरिग्रह के रूप में प्रसिद्ध हुए जिनको अपनाकर लाखों जीवों ने अपना कल्याण किया तथा उनका सबसे बड़ा सिद्धान्त था “जियो ओर जीने दो” अर्थात् स्वयं जीते हुए संसार के प्रत्येक प्राणी को जीने का अधिकार है।
महावीर भगवान के शरीर की ऊँचाई सात फुट थी। रंग पीला सुवर्ण जैसा था। 72 वर्ष की आयु थी और तीनों लोक में सबसे सुन्दर अदभुत रूप था। अति मनोज्ञ उनके शरीर में जन्म से ही दस अतिशय थे। वह शरीर मल-मूत्र रहित, प्रस्वेद रहित था, रक्त का रंग श्वेत दूध समान था, वज्र संहनन था, सर्वांग सुन्दर उसकी आकृति थी, सुगन्धित श्वास था, अद्भुत रूप, अतिशयबल एवं मधुरवाणी थी। उस शरीर में 1008 उत्तमचिन्ह थे।
वैशाख शुक्ला दशमी के दिन ऋजुकुला नदी के तट पर वीर प्रभु को केवलज्ञान हुआ समवसरण की रचना हुई तथा कार्तिक कृष्णा अमावस्या के दिन महावीर भगवान पावापुर के पदम सरोवर नामक स्थान से मोक्ष पधारे, लाखों भक्तों ने करोडों दीपक की आवलियों सजाकर प्रभु के मोक्ष कल्याणक का उत्सव मनाया इसलिये कार्तिक कृष्णा अमावस्या दीपावली पर्व के रूप में प्रसिद्ध हुई जो आज भी भारतवर्ष में प्रसिद्ध है।
नमन करता उन जिनेश्वर देव को धर्मचक्र चला गये शिव गेह जो। गये पावापुरी से निर्वाण को, सन्त-मुनि-गणधर नमें कल्याण हो।
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विनोद कुमार जैन एडवोकेट
अध्यक्ष, श्री महावीर स्वामी दिगम्बर जैन परमागम मन्दिर, बडौत जनपद बागपत


