बिजनौर। श्रावण मास में आने वाली सावन शिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का अत्यंत पावन और शुभफलदायी पर्व माना जाता है। इस दिन भगवान शिव का व्रत, रुद्राभिषेक, मंत्र जाप और विधि-विधान से पूजन करने का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सावन शिवरात्रि पर श्रद्धा के साथ भगवान शिव की आराधना करने से सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

“नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥”

सिविल लाइन स्थित धार्मिक संस्थान विष्णुलोक के ज्योतिषविद् पंडित ललित शर्मा के सुपुत्र पंडित अभिलाष शर्मा ने बताया कि इस वर्ष सावन शिवरात्रि का पावन पर्व 11 अगस्त 2026, मंगलवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार श्रावण कृष्ण चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ 11 अगस्त को प्रातः 4 बजकर 54 मिनट पर होगा और इसका समापन 12 अगस्त को रात्रि 1 बजकर 52 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार 11 अगस्त को ही सावन शिवरात्रि का व्रत एवं पूजन किया जाएगा।
चारों प्रहर में पूजन का विशेष महत्व
पंडित अभिलाष शर्मा ने बताया कि सावन शिवरात्रि पर रात्रि के चारों प्रहर में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। पहले प्रहर की पूजा शाम 7 बजकर 4 मिनट से रात्रि 9 बजकर 45 मिनट तक होगी। दूसरे प्रहर की पूजा रात्रि 9 बजकर 45 मिनट से 12 बजकर 26 मिनट तक होगी। तीसरे प्रहर की पूजा रात्रि 12 बजकर 26 मिनट से प्रातः 3 बजकर 7 मिनट तक और चौथे प्रहर की पूजा प्रातः 3 बजकर 7 मिनट से 5 बजकर 49 मिनट तक रहेगी।
धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार चारों प्रहर में भगवान शिव का अभिषेक एवं पूजन कर सकते हैं। इस दौरान शिवनाम स्मरण, मंत्र जाप और शिव कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण भी किया जाता है।
सिद्धि योग और विशेष नक्षत्रों का संयोग
पंडित अभिलाष शर्मा ने बताया कि इस वर्ष सावन शिवरात्रि पर सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। दिन के पूर्वार्ध में पुनर्वसु तथा उसके बाद पुष्य नक्षत्र रहेगा। मंगलवार के दिन शिवरात्रि और मंगला गौरी व्रत का संयोग भी बन रहा है।
इन विशेष संयोगों के कारण इस वर्ष की सावन शिवरात्रि धार्मिक अनुष्ठान, शिव आराधना और साधना की दृष्टि से विशेष मानी जा रही है। श्रद्धालु इस दिन भगवान शिव की पूजा, रुद्राभिषेक और मंत्र जाप कर पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
पंचामृत और गंगाजल से करें अभिषेक
पंडित अभिलाष शर्मा ने बताया कि सावन शिवरात्रि का व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, सात्विकता और साधना का पर्व है। इस दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद भगवान शिव का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करना चाहिए।
पूजन के दौरान भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, श्वेतार्क, शमीपत्र, सफेद पुष्प और चंदन आदि अर्पित किए जा सकते हैं। श्रद्धालु शिव चालीसा, रुद्राष्टकम और शिव स्तुति का पाठ भी कर सकते हैं। रात्रि में शिवनाम स्मरण, मंत्र जाप एवं शिव कीर्तन करते हुए जागरण करने की परंपरा है।
भगवान शिव की आराधना के दौरान “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप विशेष रूप से किया जाता है। इसके साथ महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार कर सकते हैं।
“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥”
शिवपूजन में बेलपत्र का विशेष महत्व
पंडित अभिलाष शर्मा ने बताया कि शास्त्रों में भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार बेलपत्र की तीन पत्तियां भगवान शिव के त्रिनेत्र, त्रिशूल तथा सत्व, रज और तम इन तीन गुणों का प्रतीक मानी जाती हैं।
इसी कारण शिवपूजन में स्वच्छ और अखंड बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा है। अभिषेक के समय शिवलिंग पर जल की अविरल धारा चढ़ाना भी विशेष महत्व रखता है। इसे शिवतत्व के प्रति समर्पण और मन की निरंतर निर्मलता का प्रतीक माना जाता है।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव केवल संहार के देवता नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन, करुणा, वैराग्य और कल्याण के देव हैं। इसी कारण उन्हें देवों का देव महादेव कहा जाता है।
पंडित अभिलाष शर्मा ने श्रद्धालुओं से सावन शिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धा, संयम और सात्विक भाव से भगवान शिव की आराधना करने की अपील की। उन्होंने कहा कि शिवभक्ति का मूल भाव आडंबर नहीं, बल्कि श्रद्धा, आत्मसंयम और लोककल्याण की भावना है।

