बाल विवाह के खिलाफ महिलाओं की बुलंद आवाज, बोलीं—बेटियों की शादी 24-25 साल की उम्र में होनी चाहिए

बाल विवाह के खिलाफ महिलाओं की बुलंद आवाज, बोलीं—बेटियों की शादी 24-25 साल की उम्र में होनी चाहिए

 

मुजफ्फरनगर में जनपद स्तरीय ‘रक्षक कार्यशाला’ में महिलाओं ने साझा किए बाल विवाह के अनुभव, शिक्षा और महिला सशक्तीकरण को बताया बदलाव का आधार

मुजफ्फरनगर। ग्रामीण समाज विकास केंद्र (GSVK) की ओर से आयोजित जनपद स्तरीय ‘रक्षक कार्यशाला’ में बाल विवाह, बालिकाओं की शिक्षा, महिलाओं के अधिकार और सामाजिक जागरूकता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में कविता सहित गीता, इमलेश और मेहर जहां ने बाल विवाह से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। वक्ताओं ने कम उम्र में विवाह के दुष्प्रभावों को सामने रखते हुए बेटियों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सुरक्षित भविष्य पर जोर दिया।

कार्यशाला के दौरान महिलाओं ने बताया कि कम उम्र में शादी होने से लड़कियों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है और उन्हें समय से पहले पारिवारिक जिम्मेदारियां उठानी पड़ती हैं। वक्ताओं ने समाज से अपील की कि बेटियों को शिक्षा पूरी करने, अपने अधिकारों को समझने और अपने पैरों पर खड़े होने के लिए पर्याप्त अवसर दिए जाएं।

17 साल की उम्र में हुई शादी, कविता ने साझा किया संघर्ष

कविता ने अपने जीवन के शुरुआती संघर्षों का जिक्र करते हुए बताया कि वर्ष 2003 में महज 17 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई थी। कम उम्र में विवाह होने के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई और उन्हें जल्द ही पारिवारिक जिम्मेदारियां संभालनी पड़ीं।

उन्होंने बताया कि उस समय उन्हें जीवन की जिम्मेदारियों और अपने अधिकारों की पर्याप्त जानकारी नहीं थी। शादी के बाद शुरुआती दौर में लोगों के बीच अपनी बात रखने में भी झिझक होती थी। बाद में महिला समाज और अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बदलाव आया।

कविता ने बताया कि संस्थाओं के सहयोग से उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की, प्रशिक्षण प्राप्त किया और विभिन्न बैठकों तथा कार्यशालाओं में भाग लेना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और वे सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखने लगीं।

बोलीं कविता, बेटियों की शादी 24-25 साल की उम्र में होनी चाहिए

बाल विवाह के खिलाफ संदेश देते हुए कविता ने कहा कि लड़कियों की शादी 24-25 साल की उम्र में होनी चाहिए, ताकि वे अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें, मानसिक रूप से परिपक्व हो सकें और जीवन के महत्वपूर्ण फैसले समझदारी से ले सकें।

उन्होंने बाल विवाह को गंभीर सामाजिक समस्या बताते हुए कहा कि कम उम्र में शादी के कारण कई लड़कियों के सपने अधूरे रह जाते हैं। शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तथा उन्हें कम उम्र में ही बड़ी जिम्मेदारियां उठानी पड़ती हैं। उन्होंने परिवारों से बेटियों की शिक्षा को प्राथमिकता देने और उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर उपलब्ध कराने की अपील की।

गीता ने साझा किए कम उम्र में शादी के दुष्प्रभाव

सहर नंगली की गीता ने भी वीडियो के माध्यम से अपने अनुभव साझा करते हुए कम उम्र में शादी और बाल विवाह के दुष्प्रभावों पर बात रखी। उन्होंने अपने जीवन से जुड़े अनुभवों के जरिए बताया कि बाल विवाह लड़कियों के भविष्य और उनके विकास को प्रभावित कर सकता है।

कार्यशाला में उनके अनुभव को बाल विवाह के प्रति सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया। इस दौरान बेटियों को कम उम्र में विवाह के बजाय शिक्षा और बेहतर भविष्य के अवसर देने की जरूरत पर जोर दिया गया।

इमलेश ने बच्चों की शिक्षा और सामाजिक जागरूकता पर दिया जोर

गौहर निर्माण क्षेत्र में रहने वाली इमलेश ने वीडियो के माध्यम से बाल विवाह के खिलाफ समाज को जागरूक करने की बात कही। उन्होंने बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता देने और परिवारों को इस विषय पर जागरूक करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने संदेश दिया कि बच्चों को पढ़ने और आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। बाल विवाह जैसी कुप्रथा को रोकने के लिए परिवारों, समाज और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर प्रयास करने होंगे, ताकि बेटियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।

मेहर जहां ने बताया बाल विवाह कानूनी अपराध

मेहर जहां ने वीडियो में अपने जीवन की कहानी साझा करते हुए बताया कि कम उम्र में विवाह होने के कारण उनकी शिक्षा अधूरी रह गई। उन्होंने बाल विवाह के अनुभवों का जिक्र करते हुए इसे कानूनन अपराध बताया और समाज से इस कुप्रथा के खिलाफ जागरूक होने की अपील की।

उन्होंने कहा कि बाल विवाह को रोकने के लिए लोगों को कानून की जानकारी होना जरूरी है। परिवारों को चाहिए कि वे बेटियों की पढ़ाई पूरी कराने और उन्हें अपने भविष्य के लिए तैयार करने पर ध्यान दें। बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता बढ़ाकर ही बच्चों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

महिला संस्थाओं से जुड़कर कविता को मिला नया अनुभव

कविता ने बताया कि स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़ने के बाद उन्हें सामाजिक कार्यों में भाग लेने और विभिन्न स्थानों पर जाने का अवसर मिला। उन्होंने मलेशिया, थाईलैंड, बैंकॉक और नेपाल की यात्राओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन अनुभवों से उन्हें अलग-अलग संस्कृतियों और महिलाओं की सामाजिक भूमिका को समझने का मौका मिला।

उनके अनुसार, महिलाओं को उचित मार्गदर्शन और अवसर दिए जाएं तो वे अपनी क्षमताओं को पहचान सकती हैं और दूसरी महिलाओं तथा लड़कियों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकती हैं।

सुरक्षित बचपन, शिक्षित बेटियां और सशक्त समाज का संदेश

ग्रामीण समाज विकास केंद्र की ओर से आयोजित जनपद स्तरीय रक्षक कार्यशाला के बैनर पर सुरक्षित बचपन, शिक्षित बेटियां और सशक्त समाज का संदेश प्रमुखता से दिया गया। कार्यशाला में शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य एवं पोषण, कौशल और रोजगार, सुरक्षा एवं कानूनी सहायता तथा समुदाय की सक्रिय भूमिका जैसे विषयों को शामिल किया गया।

कार्यक्रम में साझा किए गए अनुभवों ने बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों को रोकने और महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता को रेखांकित किया। वक्ताओं ने कहा कि बाल विवाह रोकने के लिए परिवारों, समुदाय और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर प्रयास करने चाहिए।

कार्यशाला का संदेश रहा कि बेटियों को कम उम्र में विवाह के बंधन में बांधने के बजाय उन्हें शिक्षा, सुरक्षा, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता के साथ आगे बढ़ने का अवसर दिया जाए। जागरूक परिवार और सक्रिय समाज ही बाल विवाह जैसी कुप्रथा को समाप्त करने तथा बेटियों के बेहतर भविष्य का रास्ता तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
किशोरियों ने भी खुलकर रखे अपने विचार
कार्यशाला के दौरान किशोरियों ने भी बाल विवाह, बालिकाओं की शिक्षा, महिला अधिकारों और सुरक्षित भविष्य को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक लड़की को शिक्षा प्राप्त करने, अपने सपनों को पूरा करने और जीवन में आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। कम उम्र में विवाह होने से किशोरियों की पढ़ाई और भविष्य की योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। किशोरियों ने बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने और परिवारों व समाज को इस विषय पर संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बेटियों को बोझ समझने के बजाय उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि वे आत्मनिर्भर बनकर समाज में अपनी पहचान बना सकें।

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