बाराबंकी। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में तहसील सिरौली गौसपुर क्षेत्र के किंतूर गांव स्थित श्री कुंतेश्वर महादेव मंदिर अपनी पौराणिक महिमा और चमत्कारों के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है।

कहा जाता है कि वनवास के दौरान पांडवों की माता कुंती ने सरयू नदी के तट पर इस शिवलिंग की स्थापना की थी। लोक कथा के अनुसार महाबली भीम हिमालय से बहंगी में दो शिलाएं लाए थे। एक शिला से यहां कुंतेश्वर महादेव और दूसरी से रामनगर के लोधौरा गांव में लोधेश्वर महादेव की स्थापना हुई। माता कुंती के नाम पर ही इस मंदिर का नाम कुंतेश्वर पड़ा।

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्वयं पूजित शिवलिंग है। पुजारी शीतल प्रसाद के अनुसार शाम को सारी पूजा सामग्री हटाने के बाद भी शिवलिंग सुबह पूजित अवस्था में मिलता है। मान्यता है कि रात में अदृश्य शक्ति द्वारा जलाभिषेक होता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि माता कुंती आज भी रात में यहां पूजा करने आती हैं। कई बार रात में घंटा-घड़ियाल की आवाज भी सुनाई देती है। इस रहस्य को जानने के लिए एक टीवी चैनल ने कैमरे भी लगाए थे, लेकिन कैमरा गिर गया था।
एक अन्य कथा के अनुसार माता कुंती ने भगवान शिव से स्वर्ण पुष्पों से अभिषेक का वचन मांगा था। तब अर्जुन भगवान कृष्ण की सलाह पर इंद्रलोक से पारिजात वृक्ष लाए थे। आज भी भक्त पारिजात के फूल चढ़ाकर मनोकामना मांगते हैं। पत्रकार सचिन गुप्ता कहते है कि हर सोमवार, सावन, मलमास और गुरु पूर्णिमा पर यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। वही वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण कुमार यादव कहते है कि लोधेश्वर जाने वाले कांवरिए भी पहले यहां दर्शन करते हैं। मंदिर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है, जहां भागवत कथा और रासलीला का आयोजन होता है।

