गुडग़ांव। सनातन धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण माना
जाता है। प्रत्येक वर्ष 24 एकादशियां होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता
है तब इनकी संख्या बढक़र 26 हो जाती है। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की
एकादशी को निर्जला एकादशी कहते है। श्रद्धालु निर्जला एकादशी का व्रत
रखते हैं और जल का सेवन तक भी नहीं करते। इसलिए इसे निर्जला एकादशी कहा
जाता है। इस बार निर्जला एकादशी 10 जून यानि कि शुक्रवार की प्रात: 7
बजकर 27 मिनट पर आरंभ होकर अगले दिन 11 जून शनिवार की प्रात: 5 बजकर 46
मिनट तक रहेगी। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि इस वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल
द्वादशी का क्षय होने के कारण स्मर्त अर्थात ग्रस्त लोगों को 10 जून को
ही व्रत रखकर निर्जला एकादशी मनानी चाहिए। सन्यासी, वानप्रस्थी व वैष्णव
संप्रदाय के लोग 11 जून के दिन निर्जला एकादशी मना सकते हैं। उनका कहना
है कि यह व्रत कुछ हद तक करवाचौथ से मिलता-जुलता है। क्योंकि करवाचौथ का
व्रत भी सुहागिनें निर्जल यानि कि बिना जल के सेवन के रखती हैं। धार्मिक
ग्रंथो में भी उल्लेख है कि वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया तो
महाबली भीम ने निवेदन किया था कि पितामह आपने तो प्रति पक्ष एक दिन के
उपवास की बात कही है। मैं तो एक दिन क्या एक समय भी भोजन के बिना नहीं रह
सकता। पितामह ने भीम की समस्या का निदान करते और उनका मनोबल बढ़ाते हुए
कहा था कि नहीं कुंती नंदन, धर्म की यही तो विशेषता है कि वह सबको धारण
ही नहीं करता, सबके योग्य साधन व्रत-नियमों की बड़ी सहज और लचीली
व्यवस्था भी उपलब्ध करवाता है। इसलिए तुम ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की
निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो और तुम्हें वर्ष की समस्त
एकादशियों का फल प्राप्त होगा। तभी से निर्जला एकादशी का आयोजन किया जाता
आ रहा है। इसे पांडव एकादशी या भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। निर्जला
एकादशी पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है। व्रती भगवान विष्णु की
उपासना तथा यथाशक्ति दान भी करते हैं। इस साल यह एकादशी तुला राशि पर पड़
रही है। भीषण गर्मी से समाज के सभी वर्गों के लोगों को राहत मिले, इसलिए
निर्जला एकादशी पर मीठे व ठंडे जल की छबीलें लगाने की प्रथा प्राचीन काल
से चली आ रही है। निर्जला एकादशी पर खरबूजे, फल, अन्न, पंखे, छतरियां आदि
दान करने का प्रावधान भी है ताकि असहाय लोगों की सहायता भी हो सके।
ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि निर्जला एकादशी पर पशु-पक्षियों को नहीं
भूलना चाहिए, उनको भी जल तथा दाना-चुग्गा दें और गायों को भी हरा चारा
आदि खिलाना चाहिए। उनका कहना है कि एकादशी व्रत करने के लाभ भी बहुत से
हैं। इससे जहां मन शुद्ध होता है, एकाग्रता बढ़ती है और मोह माया के बंधन
से मुक्ति भी मिलती है। ऐसा माना जाता है कि व्रतीयों को जन्म और
पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति भी मिल जाती है। साईबर सिटी में प्रति वर्ष
निर्जला एकादशी विभिन्न सामाजिक व धार्मिक संस्थाओं तथा समाजसेवियों
द्वारा बड़े स्तर पर ठंडा व मीठा जल का सेवन तथा भण्डारों का आयोजन कराकर
मनाई जाती रही है।

