प्रयागराज। दीपावली पर घर-आंगन को रोशन करने के लिए मिट्टी के दीये और खिलौने तैयार करने में कुम्हार दिन-रात जुटे हैं। उनके हाथों से आकार ले रहे मिट्टी के दीये दूसरों के घरों में उजाला फैलाएंगे, लेकिन इन कारीगरों के अपने जीवन में आर्थिक परेशानियों का अंधेरा अब भी बना हुआ है। मिट्टी के बर्तन बनाने का पुश्तैनी कारोबार कभी उनकी आजीविका का प्रमुख साधन था, लेकिन बदलते समय के साथ इसकी कमाई से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में नई पीढ़ी भी इस हुनर को अपनाने से पीछे हट रही है।

सोरांव तहसील के जगदीशपुर पूरे चन्दा गांव निवासी तेज बहादुर प्रजापति दीपावली से पहले मिट्टी के दीये और अन्य खिलौने बनाने में जुटे हैं। मिट्टी को आकार देकर दीये तैयार करने वाले तेज बहादुर के मन में अपने पुश्तैनी कारोबार को बचाने की चिंता भी है। उनका कहना है कि मिट्टी के बर्तन बनाना उनके परिवार का पारंपरिक काम है, लेकिन अब इससे इतनी कमाई नहीं हो पाती कि परिवार का खर्च आसानी से चल सके। यही वजह है कि आने वाली पीढ़ी इस काम को सीखने में रुचि नहीं दिखा रही है।

तेज बहादुर बताते हैं कि केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से कुम्हार समाज की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और पारंपरिक कारोबार को बढ़ावा देने के प्रयासों से उन्हें भी उम्मीद जगी थी। इलेक्ट्रॉनिक चाक मिलने की जानकारी के बाद उन्हें लगा कि इससे मिट्टी के बर्तन बनाने का काम आसान होगा और उत्पादन भी बढ़ सकेगा। उम्र बढ़ने के साथ मेहनत का काम कठिन होता जा रहा है। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक चाक मिल जाता तो उन्हें अपना पुश्तैनी हुनर जारी रखने और परिवार का भरण-पोषण करने में सहारा मिलता।
उनके मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक चाक के लिए दो बार फार्म भरवाया गया। कुछ लोग उनके घर भी आए और आवेदन की प्रक्रिया पूरी कराई गई, लेकिन अब तक उन्हें चाक नहीं मिल सका। इससे उनकी उम्मीदों को झटका लगा है। वह कहते हैं कि सरकार की योजना से उन्हें काफी आस थी, लेकिन बार-बार आवेदन करने के बाद भी मदद नहीं मिलने से अब भरोसा कमजोर पड़ गया है।
हुनर बचाने के लिए मदद की दरकार
तेज बहादुर की चिंता केवल आर्थिक परेशानी तक सीमित नहीं है। उन्हें डर है कि यदि मिट्टी के बर्तन बनाने के काम से पर्याप्त आमदनी नहीं हुई और आधुनिक साधन नहीं मिले, तो आने वाली पीढ़ी इस पारंपरिक कला से दूर हो जाएगी। दीपावली जैसे त्योहारों पर मिट्टी के दीयों की मांग कुम्हारों के लिए कमाई का अवसर लेकर आती है, लेकिन पूरे साल परिवार चलाने की चुनौती बनी रहती है।
ऐसे में तेज बहादुर जैसे कारीगरों को इलेक्ट्रॉनिक चाक उपलब्ध कराने के साथ उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के अवसर भी देने की जरूरत है। इससे उनकी मेहनत को उचित मूल्य मिल सकेगा और मिट्टी के दीये बनाने की परंपरा भी आगे बढ़ सकेगी। दीपावली पर दूसरों के घरों को रोशन करने वाले इन कारीगरों के जीवन में भी खुशहाली का उजाला पहुंचे, यही उनकी सबसे बड़ी उम्मीद है।

