दिल्ली-NCR में प्रदूषण बढ़ते ही क्यों लागू होता है GRAP? जानिए चारों चरणों में क्या-क्या पाबंदियां लगती हैं

दिल्ली-NCR में प्रदूषण बढ़ते ही क्यों लागू होता है GRAP? जानिए चारों चरणों में क्या-क्या पाबंदियां लगती हैं

नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। शनिवार को केवल नोएडा का लाइव एक्यूआई 303 दर्ज किया गया है, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। हवा में पीएम 2.5 का स्तर 222 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम 10 का स्तर 269 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया है। लगातार बिगड़ते इन हालातों के बीच प्रशासन की ओर से लोगों से अपील की जा रही है कि जब तक ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप-1) लागू है, तब तक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों का इस्तेमाल न करें और सरकार के प्रयासों में सहयोग दें।

लेकिन हर साल सर्दियों में चर्चा में आने वाला यह ‘ग्रैप’ प्लान आखिर है क्या, इसे कौन लगाता है और इसमें कौन-कौन सी पाबंदियां होती हैं? ग्रैप यानी ‘ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान’ दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए एक आपातकालीन कार्य योजना है। आसान भाषा में कहें तो यह प्रदूषण के स्तर के आधार पर लागू होने वाले कड़े नियमों का एक सेट है। हवा जितनी खराब होगी, पाबंदियां उतनी ही सख्त होती जाएंगी।

इसे पहली बार 2017 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया था। वर्तमान में ग्रैप को लागू करने की जिम्मेदारी वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) की है। सीएक्यूएम भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के पूर्वानुमानों और वायु गुणवत्ता के आंकड़ों की लगातार निगरानी करता है। जब एक्यूआई एक निश्चित स्तर को पार कर जाता है या मौसम विभाग पूर्वानुमान जताता है कि अगले कुछ दिनों में हवा बेहद खराब होने वाली है, तो सीएक्यूएम ग्रैप के संबंधित चरण को लागू करने का आदेश दे देता है। प्रदूषण की गंभीरता के आधार पर ग्रैप को चार चरणों में बांटा गया है। पहला चरण ‘खराब’ हवा के लिए जाना जाता है। इसमें एक्यूआई 201 से 300 के बीच होता है।

जब हवा खराब होने लगती है तो यह चरण लागू होता है। इसमें निर्माण और विध्वंस स्थलों पर धूल नियंत्रण के सख्त नियम लागू होते हैं। खुले में कचरा जलाने पर पूरी तरह से रोक होती है। सड़कों पर पानी का छिड़काव शुरू हो जाता है और 10-15 साल पुराने वाहनों पर सख्ती बढ़ा दी जाती है। सरकार लोगों से पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करने की अपील करती है। दूसरा चरण ‘बहुत खराब’ हवा के लिए जाना जाता है। इसमें एक्यूआई 301 से 400 के बीच होता है। इस चरण में डीजल जनरेटर के इस्तेमाल पर रोक लग जाती है, हालांकि आवश्यक सेवाओं को छूट दी जाती है। लोग निजी वाहनों का कम इस्तेमाल करें इसके लिए पार्किंग शुल्क बढ़ा दिया जाता है।

सीएनजी और इलेक्ट्रिक बसों तथा मेट्रो के फेरे बढ़ा दिए जाते हैं। तंदूर और कोयले वाले होटलों और ढाबों पर रोक लग जाती है। तीसरा चरण ‘गंभीर’ हवा के लिए जाना जाता है। इसमें एक्यूआई 401 से 450 के बीच होता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक होती है। राष्ट्रीय सुरक्षा और जरूरी प्रोजेक्ट्स को छोड़कर सभी तरह के निर्माण और तोड़फोड़ के कामों पर पूरी तरह बैन लग जाता है। दिल्ली-एनसीआर में बीएस-III पेट्रोल और बीएस-IV डीजल वाले चार पहिया वाहनों के चलने पर प्रतिबंध लग जाता है। इसमें प्राइमरी स्कूलों को बंद करने का फैसला भी लिया जाता है। चौथा चरण ‘बेहद गंभीर या आपातकाल’ की स्थिति के लिए जाना जाता है। इसमें एक्यूआई 450 से ऊपर चला जाता है। यह सबसे चरम स्थिति है। दिल्ली में आवश्यक सामग्री ले जाने वाले ट्रकों को छोड़कर अन्य सभी ट्रकों की एंट्री बैन हो जाती है।

स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए जाते हैं और ऑनलाइन क्लासेस चलती हैं। सरकारी और निजी दफ्तरों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम करने का आदेश दिया जा सकता है। इसमें सरकार ऑड-ईवन जैसी योजनाएं भी लागू कर सकती है। शुक्रवार को ही दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने लोगों से अपील की थी कि जब तक ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप-1) लागू है, तब तक लोग प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को सड़क पर न निकालें और सरकार के प्रयासों में सहयोग करें। दिल्ली सरकार के मंत्री सिरसा ने आईएएनएस से कहा कि स्थिति अच्छी नहीं है। दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाके में एक्यूआई जैसे ही 201 के पास जाने लगता है तो हवा की स्थिति गंभीर होने लगती है। एक्यूआई 201-300 (खराब) एक चेतावनी का स्तर है। स्वस्थ लोगों को भी दिक्कतें हो सकती हैं। खासकर हृदय और फेफड़ों के मरीजों के लिए यह स्थिति बहुत खराब मानी जाती है। एक्यूआई 301 प्लस (खतरनाक) में हेल्थ इमरजेंसी की स्थिति बन जाती है। इसमें पीएम 2.5 (2.5 माइक्रोमीटर से छोटे कण) सबसे खतरनाक होते हैं, क्योंकि ये इतने बारीक होते हैं कि सांस के जरिए सीधे हमारे फेफड़ों और खून में घुल जाते हैं।

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