
**धरने-प्रदर्शन और लड़ाई झगड़े नेताओं के काम हैं न कि पत्रकार के
**पत्रकार हित में सदैव एक होता रहा है मुज़फ्फरनगर का पत्रकार
**पिछला इतिहास, व्यक्तिगत मामले में कोई नहीं होता है खड़ा

-आर पी तोमर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा और कांवड़ मेले की परंपरा सदियों पुरानी और पौराणिक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा अनादि काल से चली आ रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश (बागपत) में स्थित पुरा महादेव मंदिर में पहला कांवड़ का जल स्वयं भगवान परशुराम द्वारा चढ़ाया गया था। इसके अलावा, त्रेतायुग में भगवान राम ने भी सुल्तानगंज (बिहार) से गंगाजल लाकर बैद्यनाथ धाम में चढ़ाया था। सदियों से साधु-संत और कुछ भक्त सावन के महीने में कांवड़ लाते रहे हैं। वर्तमान समय में जिस ‘कांवड़ मेले’ या विशाल यात्रा को हम देखते हैं, उसे बड़े स्तर पर लोकप्रिय हुए लगभग 35 से 40 वर्ष (1980 के दशक के अंत और 1990 के बाद) ही हुए हैं। आज यह भारत के सबसे बड़े वार्षिक धार्मिक आयोजनों में से एक है, जिसमें करोड़ों शिवभक्त (कांवड़िए) शामिल होते हैं। पूर्व में इस मेले को भले ही शासन स्तर से सिर्फ औपचारिक माना जाता हो लेकिन भाजपा सरकार ने इसका स्वरूप ही बदल दिया है। आज शिवभक्तों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ फूल बरसाते हैं। जिलाधिकारी व एसएसपी कावड़ियों की सेवा करते हैं। ऋषिकेश से दिल्ली तक का पूरा प्रशासन उनकी सेवा, सुरक्षा और व्यवस्था में ही लगा होता है। वही इस बीच होने वाले झगडों को भी निपटाता है।

मुज़फ्फरनगर इन भक्तों का सेवा केंद्र है तो शिव चोक परिक्रमा हृदय स्थल है। शिवभक्तों की सेवा के लिए मुख्य मार्गों पर शिविर भी लगाए जाते हैं। शिव चौक व मीनाक्षी चौक के बीच बर्फखाने के पास प्रतिवर्ष कावड़ शिविर लगाया जाता है। इस वर्ष की तैयारियों के बीच भी यह शिविर लगाया जा रहा था। शिविर को आगे की बजाए पीछे करने को लेकर विवाद हो गया। जिसमें कुछ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल भी हुआ। मामला बिगड़ते देख पुलिस ने सिविल लाइन में रिपोर्ट दर्ज की तो आरोपी धरने पर बैठ गए और रिपोर्ट दर्ज कराने का आरोप मंत्री कपिल देव के सिर पर मढ़ दिया। मामले को अधिक बढ़ता देख प्रशासन ने दखल देकर ठंडे बस्ते में डालने का विकल्प दिया और निपटा दिया। इस प्रकरण में कुछ बाते अटपटी लगी है। यह शिविर एक समिति लगाती है। जिसमें अनेक पदाधिकारी हैं। लेकिन इसमें एक पत्रकार पार्टी बन गए। वे कलम का उपयोग करने की बजाए खुद सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करने लगे, मंत्री व प्रशासन को चेतावनी देने लगे। वीडियो में सुना तो लगा कि कोई पत्रकार की बजाए नेता बोल रहे हो। खेर अब मामला शांत हो गया है लेकिन इससे कई सवाल खड़े हो गए हैं।
कावड़ मेले का बहुत बड़ा आयोजन है जिलाधिकारी व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की जिम्मेदारी इसे शांति के साथ निर्विघ्न सम्पन्न कराने की होती है। उनकी टीम 24 घंटे कार्य करती है। चाहे बेरिकेडिंग करना हो, रूट डायवर्ट करना हो, स्वास्थ सेवा हो, पूरी व्यवस्था पर निगरानी हो, शुद्ध एवं सुरक्षित खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने के लिए ढाबों, होटलों, रेस्टोरेंटों, ठेलों, रेहड़ी-फेरी वालों एवं फल विक्रेताओं का सघन निरीक्षण करना हो, सीसीटीवी देखना हो। मुज़फ्फरनगर का व्यापारी भी शिवभक्ति में सरोबार हो जाता है। वह अपना व्यापार बंद कर भोलो की सेवा में लीन हो जाता है। यह सेवा वर्षों से चली आ रही है। अब तो मुख्यमंत्री फूल बरसाते है लेकिन कांटे बोने वाली सरकार के समय भी प्रशासन अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन बखूबी करता रहा है। डीएम उमेश मिश्रा एवं एसएसपी अभिषेक सिंह दोनों ही अच्छे अधिकारी हैं। वे बड़ी सूझबूझ से कार्य करते हैं। फिर भी कोई न कोई मामला झगड़े का आ जाता है।
वैसे तो मुज़फ्फरनगर का पत्रकार समाज गुटों में बंटे होने के बाद भी पत्रकार हित में हमेशा एकजुट होकर लड़ाई लड़ता रहा है। पुलिस लाइन में हुई सिपाही दिगम्बर यादव की हत्या के मामले में जब पुलिस ने मुज़फ्फरनगर बुलेटिन के पत्रकार सत्यपाल मलिक को उठाया और उनका यह पता नहीं दिया कि वे कहा है, तब पत्रकार समाज एक होकर शिव चौक पर धरने पर बैठा, तब पुलिस ने श्री मलिक को सामने लायी। अमर उजाला के पत्रकार ऋषिपाल ने एक नर्स के भ्रष्टाचार को लेकर खबर छापी तो नर्स ने सीएमओ हरीश चंद्र वैश्य के इशारे पर ऋषिपाल की ऑफिस में ही चप्पलों से पिटाई कर दी। तब पूरा पत्रकार समाज सड़कों पर उतरा और न्याय दिलाया। 2013 के दंगे में शिकार हुए राजेश वर्मा फोटोग्राफर के परिवार को न्याय दिलाने के लिए पत्रकार एकजुट हुए। जनवाणी के पत्रकार गुलज़ार बेग व डॉ सुभाष बालियान के मामले में भी पत्रकारों ने एकजुटता का परिचय दिया। इससे पूर्व 1986 में गंगोह के पत्रकार राकेश अग्रवाल व राकेश गर्ग के मामले में भी पत्रकारों ने एक मंच पर आकर उत्पीड़न का विरोध किया। लेकिन यहाँ का पत्रकार समाज व्यक्तिगत मामलों में हाथ पीछे खींच लेता है। शाहनवाज राणा व मुकेश चौधरी के मामले इसके गवाह हैं।
हमारा मानना है कि पत्रकार की पहचान कलम से है। आज़ादी में भी पत्रकारों ने बंदूक नही उठायी थी, तब भी कलम से ही आज़ादी की जंग जीती थी।
“खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो,
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो”
यह शेर प्रसिद्ध उर्दू के मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी ने कहा था। यह शेर पत्रकारिता, कलम और सच की आवाज की ताकत को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि जब आपके सामने क्रूर शक्ति (तोप) आ जाए, तो उसका मुकाबला करने के लिए तलवार उठाने के बजाय कलम और अखबार का सहारा लेना चाहिए, ताकि सच लोगों तक पहुँच सके। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस पंक्ति को क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘प्रताप’ के जरिए चरितार्थ किया था। वह अंग्रेजों के खिलाफ पत्रकारिता के माध्यम से क्रांति की अलख जगा रहे थे। क्योंकि पत्रकारों की एक कलम सो तोपों के बराबर होती है। जब पत्रकार अपनी कलम की ताकत को भूलकर खुद मुंसिफ बन जायेगा, खुद बंदूक उठाएगा तो इससे पत्रकार समाज की गरिमा गिरेगी। पत्रकार जब खुद पार्टी बन जायेगा तो प्रशासन भी उससे आरोपी वाला व्यवहार करेगा, उसके खिलाफ अपनी शक्ति का प्रयोग करेगा, उसे वादी की जगह प्रतिवादी बनाएगा। मेरा यह भी मानना है कि यदि सेवा शिविर को आगे पीछे करने से प्रशासनिक व्यवस्था बनती हो तो उसे मान लेना चाहिए। क्योंकि वह व्यवस्था उन्ही शिव भक्तों के लिए है, जिनके लिए हम शिविर लगा रहे हैं। अगर हम इसे मुद्दा बनाएंगे तो इसे प्रशासनिक व्यवस्था में अड़ंगा ही माना जायेगा। जैसा कि मैंने ऊपर भी कहा है कि पत्रकार का काम कलम उठाना है बंदूक नही। हमें एक अच्छा प्लेटफार्म मिला हुआ है। उसके माध्यम से हम सही व गलत बता सकते हैं, वही उचित भी है। इससे इतर हम खुद धरने- प्रदर्शन में शामिल होंगे तो फिर पत्रकार की शक्ति कमजोर हो जाएगी। वह भी उस स्थिति में जब मामला पत्रकार का न होकर किसी अन्य का हो। पत्रकार की शक्ति का उल्लेख करने के लिए मैं आपको एक हकीकत बताता हूँ। सन 1952 में मुज़फ्फरनगर के जिलाधिकारी द्वारका प्रसाद सिंह (डीपीसिंह) थे। तब उन्होंने किसी सज्जन से रिश्वत में भैंस ले ली। इस खबर को उस समय के ताकतवर नेता वीरेंद्र वर्मा ने ‘दैनिक देहात’ में निकलवाया। खबर निकलते ही जिलाधिकारी की हवा गुल हो गई। उन्होंने संपादक देहात श्री राजरूप सिंह वर्मा को फोन किया और चाय पर अपने पास बुलाया। श्री वर्मा के साथ चाय पर डीएम महोदय ने भैंस की रिश्वत का मामला उठाया। तब वर्मा जी ने कहा ठीक है मुझे वह भैंस दिखाए। डीएम ने भैंस दिखाई तो संपादक वर्मा ने वही कहा डीएम साहब यह भैंस वास्तव में रिश्वत में आई हुई है क्योंकि यह सुखी-सड़ी सी है। अगर आपकी अपनी होती तो आपकी तरह से मोटी- ताजी होती। तब डीएम खुशामद पर उतर आए। यद्यपि इसी खबर पर डीपीसिंह का तबादला हो गया। यहाँ इस हकीकत को लिखने का हमारा मतलब पत्रकार की कलम की ताकत से है। हमारा कहना है कि यदि पत्रकारिता और पत्रकार के वजूद को जिंदा रखना है, यदि कलम की ताकत को बनाये रखना है तो हमें पत्रकार ही बने रहना पड़ेगा। नेता बनने या फिर खुद बंदूक उठाने और खुद मुंसिफ बनने के लिए दूसरा रास्ता है। दोनों साथ-साथ नही चल सकते। वही मेरी प्रशासनिक टीम का हिस्सा बने पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों को भी सलाह है कि वे भी संयम से काम ले, सेवा शिविर के आगे पीछे हो जाने से कोई फर्क नही पड़ता। क्योकि ये बीस दिन का समय शिव भक्तों का है। जब उनके लिए सड़के ब्लाक हो जाती है, आवागमन बंद हो जाता है। पूरा वातावरण ही शिवमय हो जाता है तो शिविर सड़क तक लगने से कोई फर्क नही पड़ता है। पुलिस भी ज्यादा तेजी न दिखाए। शिव चौक पर झड़प फिर कावड़िये से तू तड़ाक और अब मीनाक्षी चौक मामला। मीनाक्षी चोक मामले में भी पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने में तेजी दिखाई है। इससे बिना वजह का झगड़ा खड़ा हुआ है। कावड़ियों से भी अनुरोध है कि वह शिवभक्त बनकर भक्ति में लीन रहकर अपनी यात्रा पूरा करे। अगर कावड़ लेकर कोतवाल को उसकी वर्दी उतरवाने की धमकी देंगे तो इससे शिवजी यानी कि भोलेनाथ भी नाराज होंगे और पुलिस भी उसे कही आगे लेजाकर नंगा करके पूरा नशा उतार देगी। हालांकि आज पत्रकारिता के स्वरूप बदल गए हैं। आज पत्रकारिता मिशन से हटती हुई प्रतीत होती है। पत्रकारिता में भी व्यावसायिकता हावी हो रही है। लेकिन यह लोकतंत्र का चौथा खम्बा है और इसकी पवित्रता तभी कायम ररह सकती है जब पत्रकारिता को पत्रकारिता तक ही सीमित रखा जाए और कलम के माध्यम से ही समाज व देश की सेवा की जाए।
पत्रकारिता सही मायनों में ‘कलम की ताकत’ है, क्योंकि शब्दों और लेखनी के माध्यम से समाज, राजनीति और व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा सकते हैं। यह न केवल सच को उजागर करती है, बल्कि आम जनमानस की आवाज बनकर लोकतंत्र के पहरेदार की भूमिका निभाती है। पत्रकारिता की यह शक्ति समाज में कई महत्वपूर्ण कार्य करती है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बाद पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। यह सत्ता को निरंकुश होने से बचाती है और जवाबदेही तय करती है। यह आम आदमी की समस्याओं, परेशानियों और पीड़ा को सीधे सरकार और दुनिया के सामने लाती है। समाज को सही और गलत का फर्क समझाने, अंधविश्वास मिटाने और अधिकारों के प्रति सचेत करने में पत्रकारिता का सबसे बड़ा योगदान है। निर्भीक पत्रकारिता घोटालों, भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के हनन को उजागर कर न्याय दिलाने का माध्यम बनती है। अर्थात हमारी ताकत बहुत है फिर कलम की ताकत दिखाने की बजाय हम सड़क पर बैठकर खुद को कमजोर साबित क्यों करें?

