नवरात्र के पावन अवसर पर शुक्लागंज स्थित मां गंगा तट पर मां दुर्गा के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्तगण पहुंच रहे हैं। सुबह से ही भक्तों की लाइन लग जाती है। जो दिन भर लगी रहती है। मंदिर का इतिहास लगभग 400 साल प्राचीन है। श्री दुर्गा मंदिर सेवा समिति के प्रबंधक जंग बहादुर सिंह के अध्यक्ष ने बताया कि 1953-54 में एक छोटी सी मठिया मूर्ति विहीन थी और बगल में स्थित मठिया में शिवलिंग स्थापित था। 1953 में रक्षा संस्थान सीआईजीएस जबलपुर से कानपुर स्थानांतरित होकर आए मदन केशव राव अमड़ेकर ने अपनी शेष सेवा यहीं पर की। दुर्गा मंदिर से उन्हें विशेष लगाव था।
गुरु जी मदन केशव राव के विषय में लोगों ने बताया कि उनका अधिकतर समय जबलपुर के जंगल नर्मदा नदी के किनारे तपस्या में व्यतीत होता था। ऐसे में उन्हें गंगा नदी के तट पर स्थित मां दुर्गा मंदिर के पास किराए का मकान लेकर आने लगे। जिससे कि उनकी तब और साधना होती रहे। गुरुजी के नाम से विख्यात हुए मदन केशव राव की तपस्या को देखते हुए उनकी चर्चा आसपास क्षेत्रों में होने लगी। धीरे-धीरे मंदिर में भक्तों की संख्या भी बढ़ने लगी। 1953 में मूर्ति विहीन मठिया में मां दुर्गा की छोटी सी मूर्ति स्थापित कराई गई और 1966 में मां दुर्गा के बड़े विग्रह की शास्त्रोक्त विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा कराई गई। बुजुर्गों का कहना है कि 400 साल पूर्व यहां पर मां भगवती की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित थी। लेकिन वह चोरी हो गई। मारवाड़ी समाज की देखरेख में मंदिर के कार्य हो रहे थे।


श्री दुर्गा मंदिर सेवा समिति के प्रबंधक जंग बहादुर सिंह ने बताया कि 1973-74 में मंदिर प्रांगण में शिवजी की मठिया का जीर्णोद्धार कराया गया और एक यज्ञशाला का भी निर्माण हुआ। जिसमें भगवान दत्तात्रेय और संतोषी माता की मूर्तियां स्थापित कराई गई। यज्ञशाला के सामने विशाल प्रांगण को हॉल का रूप दिया गया। समय के साथ भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती रही।
5 सितंबर को हुए ब्रह्मलीन
गुरु जी ने अपने ब्रह्मलीन होने की घोषणा करते हुए तारीख भी निश्चित किया था। जो 5 सितंबर 1983 की थी। उसी दिन गुरुजी ब्रह्मलीन हो गए। जंग बहादुर सिंह ने बताया कि 5 सितंबर को विशाल भंडारा का आयोजन किया। जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। 1983 में ही धर्मार्थ होम्योपैथिक चिकित्सालय का भी शुभारंभ किया गया था। जो आज भी चल रहा है। उन्होंने बताया कि मंदिर में विराजमान मां भगवती और गुरु जी के विग्रह जागृत हैं और अब सिद्ध पीठ के रूप में स्थापित हो चुका है। हजारों की संख्या में भक्तगण मनोकामना पूरी करने के लिए मत्था टेकते हैं। मां भगवती सबकी मनोकामना पूरी करती हैं। 1992-93 में मंदिर परिसर में पत्थर लगाए गए।
श्री दुर्गा मंदिर सेवा समिति के प्रबंधक ने बताया कि प्रतिवर्ष मंदिर में नियमित रूप से कई धार्मिक कार्यक्रम आयोजन होते हैं। जिनमें सभी निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं। मंदिर स्थापना के समय प्रज्ज्वलित की गई अखंड ज्योति क प्रकाश लगातार लोगों को प्रकाशित कर रहा है। प्रतिवर्ष एक सहस्त्र चंडी यज्ञ का आयोजन किया जाता है। स्वास्थ्य सेवा के दृष्टिकोण से धर्मार्थ चिकित्सालय के साथ नेत्र शिविर के भी आयोजन होते हैं। गरीब व अनाथ महिलाओं को वस्त्र का वितरण किया जाता है। यहां पर प्रत्येक शनिवार को “हरि ओम तत्सत” का अखंड जाप होता है। बसंत उत्सव और चेत्र नवरात्रि के अवसर पर भक्तों को आशीर्वाद के रूप में मुद्रा का वितरण किया जाता है। जो उनकी सुख समृद्धि के लिए होता है। 2013-14 में ब्रह्मलीन गुरु जी का चांदी का सिंहासन बनवाया गया। इसके अतिरिक्त 2014 में ही मां भगवती के लिए चांदी का विशाल मठ भी तैयार हो गया।
मां भगवती का दरबार लखनऊ कानपुर राजधानी मार्ग शुक्लागंज में स्थित है। गंगा नदी के किनारे स्थित दुर्गा मंदिर में माता के दर्शन के लिए रेल या फिर अपने निजी साधनों से पहुंचा जा सकता है। कानपुर रेलवे स्टेशन से माता का दरबार लगभग 5 किलोमीटर है। उन्नाव के आवास विकास कॉलोनी से यहां की दूरी लगभग 14 किलोमीटर है। स्थानीय रेलवे स्टेशन कानपुर पुल बाया किनारा है। जहां पर पैसेंजर ट्रेन रुकती है और दूरी एक किलोमीटर से भी कम है।