हरिद्वार। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर हरिद्वार स्थित पतंजलि योगपीठ में हजारों श्रद्धालु एकत्र हुए। इस अवसर पर योग गुरु बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व बताया और अपने गुरुओं को स्मरण किया। साथ ही अपने अनुयायियों को आशीर्वाद दिया। कार्यक्रम में योग, भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक मूल्यों और सनातन परंपराओं को बढ़ावा देने का संदेश दिया गया। बाबा रामदेव ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं बल्कि गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और ज्ञान के सम्मान का अवसर है। उन्होंने बताया कि इस दिन हजारों लोग गुरु परंपरा में दीक्षित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि समाज के सभी वर्गों और समुदायों के लोग इस परंपरा का हिस्सा बन रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भारत की ऋषि परंपरा ज्ञान, संस्कार और मानव कल्याण की परंपरा रही है। उन्होंने यज्ञोपवीत संस्कार का उल्लेख करते हुए कहा कि यह ऋषि संस्कृति और सनातन परंपरा का प्रतीक है। आज सभी वर्गों के लोग इस संस्कार को धारण कर रहे हैं और वेदों तथा भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन कर रहे हैं। बाबा रामदेव ने कहा कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार सभी को है। महिलाएं भी वेदों का अध्ययन कर रही हैं और यज्ञोपवीत धारण कर रही हैं। उन्होंने कहा कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद सहित भारतीय शास्त्रों का अध्ययन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि नया भारत ऐसा होना चाहिए, जहां किसी प्रकार का भेदभाव न हो और सभी लोग समान भाव से आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि सभी मनुष्य एक परमपिता की संतान हैं और समाज को एकता, अखंडता तथा आपसी सहयोग के साथ आगे बढ़ना चाहिए। बाबा रामदेव ने कहा कि अलग-अलग धर्मों और मान्यताओं के बावजूद लोगों के पूर्वज एक हैं।

देश की एकता और मानवता के लिए सभी को मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने पूर्वजों के संस्कारों और मूल्यों को अपनाएं तथा राष्ट्र निर्माण में योगदान दें। उन्होंने पतंजलि विश्वविद्यालय, आचार्यकुलम और पतंजलि सिविल सर्विसेज अकादमी के विद्यार्थियों के यज्ञोपवीत और विद्यारंभ संस्कार का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में ये विद्यार्थी देश को बेहतर प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नेतृत्व देने में सक्षम होंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि युवा पीढ़ी भारत को स्वस्थ, समृद्ध, संस्कारवान और शक्तिशाली बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इस दौरान बाबा रामदेव ने हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा कि लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन विरोध का तरीका संवैधानिक और मर्यादित होना चाहिए। गाली-गलौज भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है और लोगों को अपने बड़ों, माता-पिता और गुरुओं का सम्मान करना चाहिए।
बाबा रामदेव ने कहा, “देश सड़कों से नहीं चलेगा, देश संसद से ही चलेगा। शिक्षा मंत्री कौन होगा या कौन नहीं होगा, यह सड़कों पर तय नहीं होगा, बल्कि देश के प्रधानमंत्री और संसद की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से तय होगा।” उन्होंने कहा, “कुछ लोगों ने आजादी के नारे लगाए—’ब्राह्मणवाद से आजादी’, ‘आरएसएस से आजादी’ और जाति-पंथ से जुड़े अन्य नारे। यदि कोई व्यक्ति ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ है और उसने आरएसएस से राष्ट्रवाद की शिक्षा ली है, तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।” उन्होंने कहा, “संविधान इस देश के हर नागरिक को समान अधिकार देता है। जो अधिकार दलित, शोषित और वंचित वर्गों को प्राप्त हैं, वही अधिकार ब्राह्मणों सहित सभी समुदायों को भी प्राप्त हैं। इसलिए किसी भी जाति या समुदाय के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिए। ब्राह्मणों को गाली देना भी असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है, और किसी भी अन्य वर्ग या समुदाय का अपमान करना भी गलत है।”

