काशी में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का संदेश: अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु, इंद्र के पौराणिक प्रसंग से समझाया विनम्रता का महत्व

काशी में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का संदेश: अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु, इंद्र के पौराणिक प्रसंग से समझाया विनम्रता का महत्व

वाराणसी। शारदीय नवरात्र के अवसर पर उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित शंकराचार्य घाट के श्रीविद्या मठ में श्रीविद्या साधना शिविर का आयोजन किया जा रहा है। शिविर में प्रतिदिन भगवती राजराजेश्वरी की महापूजा, नवचंडी पाठ और ‘ललितोपाख्यान’ पर प्रवचन हो रहे हैं। बुधवार को भगवती की महापूजा के बाद ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने साधकों को संबोधित करते हुए अहंकार से दूर रहने का संदेश दिया।

शंकराचार्य ने कहा कि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जब व्यक्ति के भीतर अहंकार का भाव उत्पन्न होता है तो उसकी लक्ष्मी और श्री समाप्त होने लगती है। यहां श्री का तात्पर्य शोभा, ऐश्वर्य, कांति और सद्गुणों से है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने पद, प्रतिष्ठा और अधिकार का कभी अहंकार नहीं करना चाहिए।

दुर्वासा के शाप से श्रीहीन हो गए थे इंद्र

अहंकार के दुष्परिणामों को समझाने के लिए शंकराचार्य ने पौराणिक प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को दिव्य पारिजात माला भेंट की थी। अहंकारवश इंद्र ने उस माला का उचित सम्मान नहीं किया और उसे अपने वाहन ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। ऐरावत ने माला को सूंड से नीचे गिरा दिया और पैरों तले कुचल दिया।

महर्षि दुर्वासा ने इसे अपने और भगवान के प्रसाद का अपमान मानते हुए इंद्र को श्रीहीन होने का शाप दे दिया। इसके परिणामस्वरूप स्वर्गलोक से श्री, कांति और वैभव लुप्त हो गए। इस प्रसंग के माध्यम से शंकराचार्य ने समझाया कि अहंकार व्यक्ति के ऐश्वर्य और प्रतिष्ठा के विनाश का कारण बन सकता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को विनम्रता और सदाचार का पालन करना चाहिए।

देशभर से साधक पहुंचे श्रीविद्या साधना शिविर में

मठ के प्रवक्ता संजय पांडेय के अनुसार, श्रीविद्या मठ में आयोजित साधना शिविर में स्फटिक मणि से निर्मित भगवती राजराजेश्वरी की दिव्य प्रतिमा विराजमान है। शिविर में दीक्षा और साधना की बारीकियां सीखने के लिए देशभर से बड़ी संख्या में साधक और श्रद्धालु पहुंचे हैं। शिविर के अंतर्गत प्रतिदिन प्रातः आठ से पूर्वाह्न 11 बजे तक भगवती की महापूजा की जाती है। इसके बाद साधकों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया जाता है। सायंकाल शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा ‘ललितोपाख्यान’ पर प्रवचन किया जा रहा है। आचार्य पंडित वीरेश्वर दातार के आचार्यत्व में वैदिक विद्वानों द्वारा प्रतिदिन नवचंडी पाठ किया जा रहा है। ब्रह्मचारी परमात्मानंद कलश पूजन संपन्न कराते हैं। इसके साथ ही प्रतिदिन विभिन्न पूजन द्रव्यों से सहस्रनाम, त्रिशती और अष्टोत्तर के माध्यम से भगवती का अर्चन किया जा रहा है।

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