गैर ब्रांडेड फूड ग्रेन पर जीएसटी की दर बढऩे से मिलर्स, ट्रेडर्स ने भी नया रास्ता निकाल लिया है। अब पैकिंग 25 की जगह 26 किलो या उससे ऊपर की आने लगी है। खासकर आटा, मैदा, रवा, सूजी, दाल-चावल, बेसन आदि की पैकिंग में यह देखने में आ रहा है। जिन उद्योगों में पुराना पैकिंग मटेरियल रखा है, वे हाथ से ही बोरियों पर वजन का उल्लेख कर रहे हैं।
कुछ कंपनियों ने 30 और 50 किलो के बैग निकाल दिए हैं। इससे ग्राहक को ज्यादा वजन के बैग खरीदना पड़ रहे हैं या मजबूरी में छोटे बैग लेता है जो टैक्स के दायरे में आ रहा है। इससे महीने में किराना खर्च में भी बढ़त हुई है। व्यापारी बड़े पैकेट लाकर उसके छोटे-छोटे पैकेट बनाकर बाजार में बेच रहे हैं। इससे वे तो टैक्स से बच गए, आम आदमी को बारह फीसदी अतिरिक्त टैक्स चुकाना पड़ रहा है।

दरअसल गैर ब्रांडेड फूड ग्रेन पर जीएसटी की दर 12 प्रतिशत हो गई है। यह निर्णय जीएसटी काउंसिल की जून में हुई 47वीं बैठक में लिया गया और 18 जुलाई से नियम लागू हो गए। नियमानुसार 25 किलो से ऊपर वजन के बैग पर जीएसटी से छूट है। इसके नीचे वजन पर जीएसटी लगता है। इसलिए इकाइयों में पुराना ङ्क्षप्रटेट बैग रखा हुआ था, उन्होंने इसकी पैकिंग पर हाथ से ही 26/30 किलो लिखना शुरू कर दिया है।

बागसेवनिया निवासी रवि गुप्ता पहले 5 किलो अरहर की दाल 500 रुपए में लेते थे, इस पर 60 रुपए का इजाफा हो गया। इसी तरह सभी दालें और गेहूं एवं गेहूं उत्पादों पर कीमतें बढ़ गई हैं। इससे उनकी रसोई 5000 की जगह 6000 रुपए से ज्यादा की पड़ रही है।यह एक मध्यम परिवार की स्थिति है। बड़े परिवारों की रसोई तो और महंगी हो गई।
कोई भी इकाई में 3 से 4 महीने का एडवांस पैङ्क्षकग मटेरियल रहता है। नियम बदलने के बाद पुराने बैग जो बचे हैं, उनका उपयोग किया जाता है तो इसमें कोई दिक्कत नहीं है। जितना वजन दिया जा रहा है, उसका उल्लेख बैग के ऊपर किया जा रहा है।
सुनील अग्रवाल, अध्यक्ष, मप्र फ्लोर मिलर्स एसो.
जीएसटी लगने के बाद अब दो तरह की एकाउंङ्क्षटग करना पड़ रहा है। कर योग्य एवं कर मुक्त वस्तुओं को देखना पड़ता है। क्वांटिटी भी चैक करना पड़ता है। इससे समय भी ज्यादा
लगता है।