गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी के दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त हो कर गणेश जी की प्रतिमा को कोरे कलश में जल भर कर तथा उसके मुंह पर कोरा कपड़ा बांध कर उस पर या फिर चौकी पर स्थापित किया जाता है। फिर गणेश जी की मूर्त पर सिंदूर चढ़ा कर उनका विशेष विधि से पूजन कर हर मनोकामना को पूर्ण कर घर में शांति एवं मंगल का वरदान मांगा जाता है।

पूजा में भगवान गणेश को दक्षिणा अर्पित कर 21 लड्डुओं का भोग लगाने का भी विधान है, इनमें से 5 लड्डू गणेश प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बांट देने चाहिएं। किसी भी कार्य को आरंभ करने से पहले भगवान गणेश की आरती और पूजा अवश्य की जाती है अन्यथा आपकी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि वह ऐसे देव हैं जो बहुत जल्दी आपकी आराधना से प्रसन्न हो जाते हैं।

गणेश चतुर्थी के दिन सिद्धि विनायक व्रत रखा जाता है। इसे कलंक चौथ या पत्थर चौथ भी कहा जाता है। विशेष ध्यान रखें कि आज के दिन चांद न देखें। मान्यता है कि चंद्र दर्शन से मिथ्या आरोप लगने या किसी कलंक का सामना करना पड़ता है। दृष्टि धरती की ओर करके चंद्रमा की कल्पना मात्र करके अर्घ्य देना चाहिए।