अब महिलाएं भी करने लगी तर्पण और पिंडदान, पहले थी श्राद्ध कर्म में ऐसी पाबंदियां

उज्जैन। श्राद्ध कर्म, पिंडदान, तर्पण कभी महिलाओं के लिए प्रतिबंधित हुआ करते थे, लेकिन सामाजिक परंपरा और रीति-रिवाजों में आए बदलाव के चलते अब आमतौर पर स्त्रियां भी हिस्सेदार बनने लगी हैं। तीर्थों की राजधानी उज्जैन में इन दिनों पितरों की मुक्ति के लिए चल रहे पितृपक्ष में बड़ी संख्या में महिलाएं भी पितृ ऋण करने आने लगी हैं। वहीं, तीर्थ पुरोहित और धर्म के जानकार इसे सामाजिक बदलाव की नई बयार बताकर इसका खुले दिल से स्वागत कर रहे हैं।

सिद्धवट, गयाकोठा या रामघाट तट पर जुट रही श्रद्धालुओं की भीड़ अपने पुरखों की मुक्ति का विश्वास लेकर यहां आ रही हैं। इन लोगों में पुरुषों के साथ महिलाएं भी नजर आ रही हैं। अलग-अलग प्रदेशों से आई महिलाओं में कोई अपनी सास का पिंड दान कर रही थी, तो कोई ससुर या जेठ का पिंडदान कर अपने बहू होने के धर्म निभा रही हैं।

धर्म की नगरी में पिंडदान का विशेष महत्व

रतलाम से पिंडदान करने आई महिला बबीता ने बताया पहले के जमाने में महिलाओं को इन सब कार्यों से दूर रखा जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। धर्म की नगरी में इसका काफी महत्व है। कई दिनों से हम अपने सास-ससुर के निमित्त पिंडदान करने का सोच रहे थे, लेकिन आना नहीं हुआ। बीच में कोरोना के कारण आना नहीं हुआ। अब अपने परिवार के साथ शिप्रा तट पर सिद्धवट में पिंडदान करने आए हैं, जिससे पूर्वजों को मुक्ति मिल सके।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *