शहजादी हत्याकांड के फैसले में जज का बड़ा खुलासा, बोले दबाव में नहीं करूंगा न्याय से समझौता, डरपोक जज कहलाने से बेहतर इस्तीफा

शहजादी हत्याकांड के फैसले में जज का बड़ा खुलासा, बोले दबाव में नहीं करूंगा न्याय से समझौता, डरपोक जज कहलाने से बेहतर इस्तीफा

मुजफ्फरनगर। शाहपुर क्षेत्र के चर्चित शहजादी हत्याकांड में पति नदीम को फांसी की सजा सुनाने वाले एफटीसी कोर्ट नंबर तीन के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के फैसले में न्याय व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर और चौंकाने वाले मुद्दों का उल्लेख किया गया है। फैसले में न्यायाधीश ने कथित तौर पर उन्हें मिल रही धमकियों, अदालत से मुकदमों के रिकॉल और स्थानांतरण तथा न्यायिक प्रक्रिया पर बाहरी दबाव को लेकर गंभीर टिप्पणियां की हैं। आदेश में दर्ज इन टिप्पणियों के सामने आने के बाद न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।

न्यायाधीश ने अपने आदेश में उल्लेख किया है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक कथित गैंगस्टर के माध्यम से उन्हें धमकी भरा संदेश पहुंचाया गया। आदेश के मुताबिक संदेश में कहा गया कि उनकी अदालत से मुकदमों की पत्रावलियां हटवाई जा चुकी हैं और यदि वह बाज नहीं आए तो उनका जिले से बाहर स्थानांतरण भी करा दिया जाएगा। कथित संदेश में प्रभावशाली लोगों तक पहुंच होने की बात भी कही गई थी।

न्यायाधीश ने अदालत से मुकदमों के रिकॉल किए जाने के मामले पर भी गंभीर सवाल उठाए। आदेश में बताया गया कि उनकी अदालत से करीब सौ मुकदमों को रिकॉल कर दूसरी अदालतों में भेजे जाने की स्थिति सामने आई। इसको लेकर उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी अभियुक्त को यह अधिकार दिया जा सकता है कि वह अपनी पसंद के न्यायालय का चयन कर सके।

फैसले में न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का केंद्र केवल अभियुक्त नहीं हो सकता। पीड़ित पक्ष के अधिकारों और निष्पक्ष न्याय की आवश्यकता को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने मुकदमों के स्थानांतरण और न्यायालय बदलने की प्रक्रिया को लेकर अपने आदेश में कई गंभीर सवाल उठाए हैं।

धमकियों और कथित दबाव के बीच न्यायाधीश ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि वह डर के कारण न्यायिक कर्तव्य से पीछे नहीं हटेंगे। आदेश में उन्होंने अपने दृढ़ संकल्प का उल्लेख करते हुए कहा कि वह मरना पसंद करेंगे, लेकिन डरपोक जज कहलाना स्वीकार नहीं करेंगे।

न्यायाधीश ने अपने आदेश में अपने माता पिता से मिली सीख का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उन्हें केवल भगवान से डरने और किसी अन्य व्यक्ति से न डरने की शिक्षा मिली है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक वह अपने सिद्धांतों और संविधान के अनुरूप कार्य कर सकते हैं, तब तक अपने पद पर बने रहेंगे। यदि बाहरी और आपराधिक तत्वों का दबाव न्यायिक कार्य में बाधा बनने लगे तो वह इस संस्था से इस्तीफा देना बेहतर समझेंगे।

ज्ञानवापी प्रकरण के बाद धमकियों का भी उल्लेख

न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर इससे पहले वाराणसी के ज्ञानवापी प्रकरण से जुड़े मामलों की सुनवाई के कारण भी चर्चा में रहे हैं। शहजादी हत्याकांड के फैसले में उन्होंने उल्लेख किया कि ज्ञानवापी मामले की सुनवाई के बाद से उन्हें और उनके परिवार को लगातार जान से मारने की धमकियां मिलने की बात सामने आई। आदेश में सोशल मीडिया से जुड़ी कथित धमकियों और आपत्तिजनक टिप्पणियों का भी जिक्र किया गया है।

फैसले के मुताबिक उनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं और उनकी तस्वीर पर लाल रंग से काफिर लिखकर धमकाने का प्रयास किया गया। न्यायाधीश ने अपने आदेश में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि मुजफ्फरनगर में उन्हें पहले की तुलना में कम सुरक्षा उपलब्ध कराई जा रही है। उन्होंने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

शहजादी की मौत के मामले में नदीम को फांसी

जिस मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया गया, वह वर्ष 2018 का शहजादी हत्याकांड है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक 23 जुलाई 2018 की रात नदीम ने अपनी पत्नी शहजादी पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी थी। गंभीर रूप से झुलसी शहजादी को उपचार के लिए दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां 28 जुलाई 2018 को उसकी मौत हो गई थी।

मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने नदीम को हत्या का दोषी माना और उसे फांसी की सजा सुनाई। अदालत ने उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। मामले में मृतका की ओर से सफदरजंग अस्पताल में कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराया गया अंतिम बयान अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य रहा।

दहेज हत्या के आरोप से राहत

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर नदीम को हत्या का दोषी माना, लेकिन पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण दहेज हत्या के आरोप से उसे बरी कर दिया। इस तरह अदालत के फैसले में हत्या के आरोप में दोषसिद्धि और दहेज हत्या के आरोप से राहत दोनों पहलू सामने आए।

न्यायिक व्यवस्था पर टिप्पणी ने बढ़ाई चर्चा

शहजादी हत्याकांड के फैसले के साथ न्यायाधीश की ओर से न्यायिक व्यवस्था, मुकदमों के स्थानांतरण, कथित धमकियों और सुरक्षा को लेकर की गई टिप्पणियों ने मामले को और महत्वपूर्ण बना दिया है। आदेश में दर्ज टिप्पणियां न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय की प्रक्रिया से जुड़े व्यापक सवालों की ओर भी ध्यान खींचती हैं।

अब इस मामले में अदालत के फैसले के साथ साथ आदेश में दर्ज न्यायाधीश की टिप्पणियां भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। खासतौर पर मुकदमों को एक अदालत से दूसरी अदालत में भेजे जाने और कथित आपराधिक दबाव के सवालों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर आगे क्या कार्रवाई होती है, इस पर भी नजर बनी हुई है।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *