यूपी पंचायत चुनाव: वोटर्स लिस्ट से कटे 1.41 करोड़ वोट


आर पी तोमर
पंचायत चुनावो का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में जाने और कोर्ट द्वारा यूपी सरकार से संभावित तारीख बताए जाने का आदेश देने के बाद राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव की फाइनल मतदाता सूची जारी करते हुए 1.41 करोड़ वोट काट दिए हैं।
उत्तर प्रदेश मे होने वाले पंचायत चुनाव के लिए मतदाताओं की फाइनल लिस्ट जारी कर दी गई है। ये सूची जिला स्तर पर जारी की गई है, जिसमें मतदाताओं को 9 अंकों का पहचान नंबर दिया गया है। इस सूची में 40.19 लाख मतदाता बढ़ गए हैं। जबकि 1.41 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए गए हैं।
राज्य निर्वाचन आयोग ने यूपी में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची जारी की है। ये सूची तमाम दावे और आपत्तियों के निस्तारण और सत्यापन के बाद जारी की गई है। ये सूची जिलावार जारी की गई है लेकिन कई जिलों से सूची के डाउनलोड होने की शिकायतें मिल रही हैं, बताया जा रहा है कि तकनीकी खामी के चलते सूची डाउनलोड होने में परेशानी हो रही है
निर्वाचन आयोग द्वारा जारी ये अंतिम मतदाता सूची तमाम दावे और आपत्तियों के निस्तारण और सत्यापन के बाद जारी की गई है। इससे पहले आयोग ने 18 दिसंबर 2025 को अनंतिम मतदाता सूची जारी की थी। अंतिम मतदाता सूची में करीब 1.81 नए मतदाता जोड़े गए हैं। जबकि 1.41 करोड़ मतदाताओं के नामों को सूची से हटाया गया है। इस तरह से पंचायत चुनाव मतदाता सूची में करीब 40.19 लाख वोटर्स की बढ़ोतरी हुई है। अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद राज्य में पंचायत चुनाव को लेकर आगे की प्रक्रिया बढ़ सकती हैं। इस बार निर्वाचन आयोग द्वारा वोटरों को नौ अंकों का वोटर पहचान नंबर दिया गया है, जिससे चुनाव प्रक्रिया और पारदर्शी और सुव्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी। बता दें कि यूपी में फ़िलहाल पंचायत चुनाव टल गए हैं। पंचायतों में ओबीसी आरक्षण की स्थिति साफ नहीं होने की वजह से ग्राम प्रधानों को छह महीनों के लिए प्रशासक बना दिया गया है। वहीं इस मामले पर हाईकोर्ट में भी सुनवाई हो रही है.
हाई कोर्ट ने पूछा-पंचायत चुनाव कब?
उत्तर प्रदेश में 57 हजार 694 ग्राम पंचायतों के मुखिया यानी ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को ही समाप्त हो चुका है। प्रदेश सरकार ने 25 मई को ही एक नोटिफिकेशन जारी कर मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही पंचायत चुनाव होने तक प्रशासक नियुक्त कर दिया था। बतौर प्रशासक मौजूदा ग्राम प्रधानों की नियुक्ति अधिकतम छह महीने के लिए प्रभावी होगी। यह मामला अब इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैं। ग्राम प्रधानों की बतौर प्रशासक नियुक्ति के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने पंचायत चुनाव में देरी पर नाराजगी जताते हुए राज्य निर्वाचन आयोग से तल्ख सवाल किए हैं। हाईकोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग से पूछा है कि पंचायत चुनाव कब तक कराए जाएंगे, इसकी संभावित तारीख बताई जाए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को भी यह निर्देश दिया है कि 10 जुलाई को पिछड़ा वर्ग आयोग (ओबीसी आयोग) की रिपोर्ट पेश की जाए. हाईकोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग से भी 10 जुलाई को ही पंचायत चुनाव के लिए संभावित तारीख बताने को कहा है। याचिकाकर्ता ओमप्रकाश प्रजापति की ओर से कोर्ट में यह दलील दी गई कि पंचायत राज अधिनियम के मुताबिक ग्राम प्रधान का कार्यकाल अधिकतम पांच वर्ष का होता है। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि समय पर चुनाव नहीं कराकर प्रधानों को प्रशासक बनाया जाना उनके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने जैसा है, जो नियमों के खिलाफ है। सरकार की ओर से यह कहा गया कि पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए गठित आयोग को रिपोर्ट देने में तीन से छह माह लग सकते हैं। हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि रिपोर्ट जल्द दी जाए। याचिकाकर्ता के वकील ने यह दलील दी कि पहले पंचायत चुनाव में देरी होने की स्थिति में एडीओ पंचायत या बीडीओ को प्रशासक बनाया जाता था। साल 2021 और 2000 में भी पंचायत चुनाव देर से हुए थे, तब अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया गया था. इस बार सरकार ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर ग्राम प्रधानों को ही प्रशासकीय जिम्मेदारी देने का फैसला किया.
सरकार का तर्क है कि ग्राम प्रधान गांवों में विकास कार्यों, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और चुनावी प्रबंधन की अहम कड़ी होते हैं। विधानसभा चुनाव से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम प्रधान की भूमिका को देखते हुए उनको ही प्रशासक बनाने का निर्णय लिया गया। प्रधान संगठन ने भी सरकार से यह मांग की थी कि जिम्मेदारी प्रशासनिक समिति या प्रधानों को ही दी जाए। इस मामले पर अगली सुनवाई अब 10 जुलाई को होगी।

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