मैं हिन्दुस्तान की राष्ट्र भाषा हिन्दी हूँ। मेरे नाम पर ही भारतवर्ष का नाम हिन्दुस्तान पड़ा है। मेरी जन्नी संस्कृत है और मैं दुनियां की समस्त भाषाओं की जन्नी हूँ। लेकिन विडंबना है मैं अपने ही घर (हिन्दूस्तान) में पराई हो रही हूँ। मेरा अपराध क्या है? क्यों अपने ही मुझसे ईर्ष्या कर रहे है?
मुझे गुलामी की जंजीरों में जकडने वाले विदेशी आक्रमणकारीयों की भाषा आज भी मेरे हिन्दुस्तान में शासन कर रही है। मैं अपनी ही (पुत्रियों) क्षेत्रीय भाषाओं की नफ़रत के विषैले बाणों के दर्द की पीड़ा को झेल रही हूँ।
यह मेरा हिन्दुस्तान है यहाँ के सभी नागरिक मेरे पुत्र-पुत्रीयाँ हैं। मैं विदेशी आक्रमणकारीयों की भाषा के सिंघासन के नीचे क़ैद होकर भी सम्पूर्ण हिन्दुस्तान को समन्वय के सूत्र में बाँधे रखती हूँ। लोकतंत्र में राष्ट्रीय एकता अनेकता का पवित्र बन्धन मैंने ही दिया है।
मैं धर्म/मजहब, जाति/क्षेत्र के बन्धन से मुक्त होकर भेद भाव किये बिना सभी को अपने ज्ञान के प्रकाश से सुशोभित करती हूँ। जहाँ एक ओर मैं अपनों की ईर्ष्या और तिरस्कार की पीड़ा को झेलती हूँ, वही दूसरी ओर मैं गौरान्वित भी हूँ कि आज मेरे ही कुछ पुत्रों के समर्पण के कारण विदेशी धरती पर मुझे सम्मान मिल रहा है। आज विदेशी धरती के लोग मेरे शब्दों को अपनाकर, बोलकर स्वयं को धन्य समझते है।
नमस्ते, आईये, स्वागतम, आराधना, पूजा, मित्र-दोस्त, ज्ञान, ईश्वर जैसे शब्द विदेशी धरती पर साधारणतया सुने जा सकते है। इस प्रकार के शब्द विदेशीयों की बोल-चाल का हिस्सा बन चुके है। लेकिन अपनों की दी हुई पीड़ा हर रोज मेरा कलेजा चीरती है।
मैं हिन्दी हूँ सभी भाषाओं की जन्नी और आपकी राष्ट्र भाषा हूँ। यदि मेरा अस्तित्व मिटा तो यह राष्ट्र बिखर जायेगा। इसीलिए मेरे अस्तित्व को बचाने के लिए मेरा ज्ञान प्राप्त करना आपका नैतिक कर्तव्य है, आपका धर्म है। मैं हिन्दुस्तान की शान, हिन्दुस्तान का गौरव और हिन्दुस्तान का स्वाभिमान हिन्दी हूँ।

