मुजफ्फरनगर। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले का कवाल गांव 27 अगस्त 2013 की उस दर्दनाक घटना के लिए आज भी याद किया जाता है, जिसने पूरे क्षेत्र के सामाजिक और राजनीतिक माहौल को हिलाकर रख दिया था। 13 साल पहले कवाल में हुए विवाद के बाद तीन युवकों की मौत हुई थी। इसके बाद हालात बिगड़ते चले गए और मुजफ्फरनगर तथा आसपास के इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। सैकड़ों मुकदमे दर्ज हुए, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुईं और मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया। इस घटनाक्रम ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को भी प्रभावित किया।

लेकिन 13 साल बाद कवाल की तस्वीर काफी बदल चुकी है। कभी तनाव और हिंसा के लिए देशभर में चर्चा में रहे इस गांव में अब हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग आपसी भाईचारे के साथ रह रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे पुराने जख्मों को कुरेदने के बजाय शांति और सौहार्द के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं।

कवाल में विवाद के बाद हुई थी तीन युवकों की मौत
27 अगस्त 2013 की शाम कवाल गांव में ममेरे-फुफेरे भाई सचिन और गौरव का शाहनवाज नाम के युवक से विवाद हुआ था। सचिन के पिता बिशन और गौरव के पिता रविंद्र हैं। विवाद के बाद सचिन और गौरव बाइक से अपने गांव मलिकपुरा की ओर जाने लगे। कवाल तिराहे के पास दोनों की हत्या कर दी गई।
घटना की जानकारी मिलते ही तत्कालीन जिलाधिकारी सुरेंद्र सिंह और तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मंजिल सैनी भारी पुलिस बल के साथ कवाल पहुंचे। घटनाक्रम के दौरान शाहनवाज भी गंभीर रूप से घायल हुआ था। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने उसे उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया, जहां इलाज के दौरान उसकी भी मौत हो गई।
एक ही घटनाक्रम में तीन युवकों की मौत के बाद कवाल और आसपास के इलाके में तनाव बढ़ गया। पुलिस ने गांव में सर्च अभियान चलाया और आरोपियों की तलाश शुरू कर दी। घटना के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी और एसएसपी का तबादला भी कर दिया गया, लेकिन क्षेत्र में तनाव का माहौल बना रहा।
अंतिम संस्कार के बाद बढ़ा तनाव, नंगला मंदौड़ पंचायत के बाद भड़की हिंसा
सचिन और गौरव के शवों का पोस्टमार्टम होने के बाद 28 अगस्त को मलिकपुरा में उनका अंतिम संस्कार किया गया। कवाल से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित मलिकपुरा में अंतिम संस्कार के दौरान बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। अंतिम संस्कार के बाद कवाल में तोड़फोड़ और तनाव की घटनाएं सामने आईं।
इसके बाद क्षेत्र में लगातार पंचायतें और विरोध-प्रदर्शन होने लगे। सात सितंबर को नंगला मंदौड़ में बड़ी पंचायत आयोजित हुई। पंचायत समाप्त होने के बाद लौट रही भीड़ पर पथराव की घटना हुई। इसके बाद स्थिति तेजी से बिगड़ गई और मुजफ्फरनगर शहर के साथ ही आसपास के ग्रामीण इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई।
दंगों के दौरान कई जगह आगजनी, हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं। हालात को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को बड़े स्तर पर पुलिस बल तैनात करना पड़ा। इस हिंसा का असर मुजफ्फरनगर के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों तक देखने को मिला।
दर्ज हुए 534 मुकदमे, एसआईटी ने की जांच
मुजफ्फरनगर और आसपास के क्षेत्रों में हुई हिंसा को लेकर कुल 534 मुकदमे दर्ज किए गए थे। मामलों की जांच के लिए विशेष जांच टीम यानी एसआईटी का गठन किया गया। एसआईटी ने विभिन्न घटनाओं से जुड़े मामलों की जांच की और कई मामलों में आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई आगे बढ़ी।
मुजफ्फरनगर हिंसा का असर राजनीतिक स्तर पर भी दिखाई दिया। इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले और क्षेत्र में राजनीतिक समीकरण प्रभावित हुए। घटनाक्रम के दौरान तत्कालीन भाजपा विधायक विक्रम सैनी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत भी कार्रवाई की गई थी।
सचिन-गौरव हत्याकांड में सात लोगों को उम्रकैद
सचिन और गौरव की हत्या के मामले में अदालत ने कवाल निवासी मुजस्सिम, मुजम्मिल, फुरकान, जहांगीर, नदीम, अफजाल और इकबाल को दोषी ठहराया। अदालत ने सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई।
बताया गया है कि दोषी मुजम्मिल वर्तमान में बुलंदशहर जेल में सजा काट रहा है, जबकि मुजस्सिम, फुरकान, जहांगीर, नदीम, अफजाल और इकबाल आगरा जेल में बंद हैं।
वहीं शाहनवाज की हत्या के मामले में मलिकपुरा गांव के छह लोगों प्रहलाद, तेंदर उर्फ तेंदू, बिशन, देवेंद्र, जितेंद्र और रविंद्र के खिलाफ मुकदमे का ट्रायल शुरू हुआ था। इनमें आरोपी तेंदर उर्फ तेंदू की करीब दो महीने पहले मौत हो चुकी है। शाहनवाज के पिता सलीम का भी करीब दो साल पहले निधन हो चुका है। शाहनवाज हत्याकांड का ट्रायल अभी अदालत में जारी है।
13 साल में बदला गांव का माहौल
13 साल पहले जिस कवाल गांव में तनाव और हिंसा ने पूरे देश का ध्यान खींचा था, आज वहां हालात काफी अलग हैं। गांव के लोग अब पुरानी घटनाओं को पीछे छोड़कर सामान्य जीवन जी रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उस घटना से पूरे इलाके को भारी नुकसान हुआ और अब कोई भी उस दौर को दोबारा नहीं देखना चाहता।
कवाल की प्रधान के पति मोहम्मद इस्लाम का कहना है कि 27 अगस्त 2013 गांव के इतिहास का बेहद दुखद दिन था। उनके मुताबिक उस घटना की कीमत पूरे मुजफ्फरनगर को चुकानी पड़ी। अब गांव में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिल-जुलकर रह रहे हैं और पुराने विवादों को पीछे छोड़ चुके हैं।
गांव निवासी हबीबुर्रहमान उर्फ छोटा बताते हैं कि अब गांव का माहौल पूरी तरह बदल चुका है। कांवड़ यात्रा के दौरान मुस्लिम समाज के लोग भी कांवड़ियों की सेवा में हिस्सा लेते हैं। गांव में होने वाले सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे के साथ शामिल होते हैं।
ग्रामीण प्रदीप कुमार का कहना है कि अब गांव में किसी तरह का भेदभाव नहीं है। दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं। कवाल के पूर्व प्रधान महेंद्र सैनी भी गांव में अमन-चैन कायम होने की बात कहते हैं। उनके अनुसार अब लोग एक-दूसरे के घर होने वाले शादी-विवाह और दूसरे सामाजिक कार्यक्रमों में भी शामिल होते हैं।
मलिकपुरा में भी जिंदगी ने पकड़ी रफ्तार
कवाल से करीब तीन किलोमीटर दूर मलिकपुरा में रहने वाले पीड़ित परिवारों ने भी समय के साथ जिंदगी को आगे बढ़ाया है। गौरव के पिता रविंद्र अपनी पत्नी सुरेश के साथ अब मुजफ्फरनगर में रहते हैं। उनकी दोनों बेटियां नीति और शैली शादीशुदा हैं।
सचिन के पिता बिशन अपनी पत्नी मुनेश और छोटे बेटे राहुल के साथ मलिकपुरा में रहते हैं। सचिन की पत्नी स्वाति भी पिछले करीब पांच महीनों से अपने ससुराल में रह रही हैं। सचिन का पौत्र गगन अपने दादा बिशन और दादी मुनेश के साथ मलिकपुरा में रहता है और कक्षा नौ में पढ़ाई कर रहा है।
पुराने जख्मों को भूलकर शांति की राह पर कवाल
कवाल के ग्रामीणों का कहना है कि 2013 की घटना ने पूरे इलाके को बहुत कुछ सिखाया। हिंसा से किसी का भला नहीं हुआ और उसकी कीमत कई परिवारों को चुकानी पड़ी। आज गांव के लोग पुरानी कड़वाहट को पीछे छोड़कर आपसी विश्वास और भाईचारे को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं।
13 साल बाद कवाल की कहानी इस बात का उदाहरण है कि समय के साथ हालात बदल सकते हैं। जिस गांव का नाम कभी तनाव और हिंसा के पर्याय के रूप में लिया जाता था, वहां आज दोनों समुदाय के लोग साथ रहकर शांति और सौहार्द का संदेश दे रहे हैं।

