प्रयागराज। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जनपद में गंगा तट पर शिवकुटी क्षेत्र में स्थित प्राचीन कोटेश्वर महादेव मंदिर लोगों और श्रद्धालुओं की धार्मिक और पौराणिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने स्वयं यहां शिवलिंग की स्थापना कर भगवान शिव की आराधना की थी। यह जानकारी सोमवार को मंदिर के सचिव सुरेन्द्र गिरी जी महाराज ने दी।

उन्होंने बताया कि पौराणिक आस्था के कारण सावन मास में कोटेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, लंकापति रावण का वध करने के बाद भगवान श्रीराम अयोध्या लौटते समय प्रयागराज आए थे। उन्होंने महर्षि भारद्वाज से आशीर्वाद लिया। रावण ब्राह्मण कुल में जन्मा था, इसलिए श्रीराम को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए शिव आराधना का विधान बताया गया। महर्षि भारद्वाज ने उन्हें एक करोड़ शिवलिंगों के पूजन का महत्व समझाया। इसके बाद भगवान श्रीराम ने गंगा तट की बालू से शिवलिंग का निर्माण कर विधिपूर्वक भगवान शिव की आराधना की। मान्यता है कि यही दिव्य शिवलिंग आगे चलकर कोटेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

सावन में विशेष पूजा-अर्चना
कोटेश्वर महादेव मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं का आगमन होता है, लेकिन सावन मास और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष धार्मिक उत्साह दिखाई देता है। सावन में प्रतिदिन भगवान शिव का अभिषेक, पूजन और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। श्रद्धालु गंगाजल, दूध, बेलपत्र, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर भगवान शिव से सुख, शांति और लोककल्याण की प्रार्थना करते हैं।
मंदिर के सचिव सुरेंद्र गिरी ने बताया कि कोटेश्वर महादेव केवल एक प्राचीन शिवालय नहीं, बल्कि प्रयागराज की सनातन धार्मिक परंपरा और पौराणिक इतिहास का जीवंत प्रतीक हैं। भगवान श्रीराम से जुड़ी मान्यता इस धाम की महत्ता को और बढ़ाती है। उन्होंने कहा कि सदियों से श्रद्धालु यहां आकर भगवान शिव का पूजन करते आ रहे हैं और उनकी आस्था आज भी पूरी श्रद्धा के साथ कायम है।
उन्होंने कहा कि सावन में मंदिर आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को आध्यात्मिक शांति और भगवान शिव की कृपा का अनुभव होता है। मंदिर की प्राचीन परंपराओं और धार्मिक स्वरूप को संरक्षित रखते हुए श्रद्धालुओं की सुविधा का भी पूरा ध्यान रखा जाता है।
आस्था के साथ इतिहास का साक्षी
कोटेश्वर महादेव मंदिर प्रयागराज की उस गौरवशाली धार्मिक परंपरा का साक्षी है, जिसमें गंगा, शिव और श्रीराम की आस्था एक साथ दिखाई देती है। मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथाएं प्रयाग की प्राचीन आध्यात्मिक पहचान को रेखांकित करती हैं। सावन में यहां होने वाला जलाभिषेक और भगवान शिव का पूजन इसी सनातन परंपरा की निरंतरता का प्रतीक है।
गंगा तट पर विराजमान कोटेश्वर महादेव का यह प्राचीन धाम आज भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। मान्यता है कि सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करने वाले भक्त की प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती और उसे दैहिक, दैविक एवं भौतिक कष्टों से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है।

