न शत्रु संपत्ति, न निष्क्रांत’- मुजफ्फरनगर की जमीन पर सरकार की कार्रवाई अवैध, हाईकोर्ट ने निर्माण रोकने पर लगाई रोक

न शत्रु संपत्ति, न निष्क्रांत’- मुजफ्फरनगर की जमीन पर सरकार की कार्रवाई अवैध, हाईकोर्ट ने निर्माण रोकने पर लगाई रोक

प्रयागराज/मुजफ्फरनगर। मुजफ्फरनगर के सिविल लाइंस साउथ स्थित एक संपत्ति को शत्रु अथवा निष्क्रांत संपत्ति बताकर निर्माण कार्य रुकवाने की राज्य सरकार की कार्रवाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुचित और अवैध करार दिया है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार के रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस दस्तावेज मौजूद नहीं है, जिससे विवादित संपत्ति को शत्रु या निष्क्रांत संपत्ति साबित किया जा सके।

न्यायमूर्ति विवेक सरन और न्यायमूर्ति प्रकाश पडिया की खंडपीठ ने एसएमटी प्रेम गोयल और तीन अन्य की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य के अधिकारियों को संपत्ति के शांतिपूर्ण उपयोग और याचिकाकर्ताओं के कब्जे में हस्तक्षेप नहीं करने का निर्देश दिया है।

करीब 90 वर्ग मीटर के प्लॉट से जुड़ा है मामला

मामला मुजफ्फरनगर के सिविल लाइंस साउथ स्थित प्लॉट संख्या 25 से संबंधित है। इस संपत्ति का पुराना नंबर 19 बताया गया है और इसका क्षेत्रफल करीब 90 वर्ग मीटर है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार उन्होंने 12 जून 2018 को पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से यह संपत्ति खरीदी थी। इसके बाद से वे संपत्ति पर अपने स्वामित्व का दावा करते हुए उसका उपयोग कर रहे थे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष संपत्ति के स्वामित्व से जुड़े पुराने दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए। उनका कहना था कि संपत्ति के स्वामित्व की पूरी श्रृंखला दस्तावेजों से स्पष्ट है और इसे शत्रु अथवा निष्क्रांत संपत्ति बताए जाने का कोई आधार नहीं है।

1946 के दस्तावेज से शुरू होती है स्वामित्व की कड़ी

अदालत के समक्ष रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार संपत्ति का स्वामित्व वर्ष 1946 में पंजीकृत एक्सचेंज डीड के माध्यम से आगे बढ़ा। इसके बाद गिफ्ट डीड और वर्ष 1956 में हुए पारिवारिक समझौते के जरिए संपत्ति सुरेंद्र प्रकाश के पास आई।

बाद में सुरेंद्र प्रकाश की वर्ष 2013 में निष्पादित वसीयत के आधार पर संपत्ति याचिकाकर्ताओं को प्राप्त हुई। इसके बाद 12 जून 2018 को पंजीकृत बिक्री विलेख के जरिए याचिकाकर्ताओं ने संपत्ति खरीदी। याचिकाकर्ताओं का पक्ष था कि स्वामित्व से जुड़े दस्तावेजों की यह पूरी श्रृंखला उनके पक्ष में है।

नक्शा स्वीकृत होने के बाद शुरू हुआ विवाद

संपत्ति पर निर्माण के लिए याचिकाकर्ताओं ने 16 अगस्त 2018 को मुजफ्फरनगर विकास प्राधिकरण से नक्शा स्वीकृत कराया था। निर्माण कार्य शुरू होने के बाद कुछ शिकायतों के आधार पर संपत्ति को शत्रु संपत्ति बताए जाने का मामला सामने आया।

इसके बाद जिला प्रशासन, विकास प्राधिकरण और शत्रु संपत्ति के सहायक अभिरक्षक स्तर पर मामले की जांच कराई गई। जांच के बाद 2 अगस्त 2019 को पारित आदेश में संबंधित भूमि के हिस्से को शत्रु संपत्ति नहीं पाया गया था।

इसके बावजूद बाद में एक बार फिर संपत्ति को लेकर आपत्ति उठाई गई और जनवरी 2023 में राज्य के अधिकारियों ने निर्माण कार्य रुकवा दिया। आरोप है कि रात के समय निर्माण का कुछ हिस्सा गिरा दिया गया और संपत्ति पर इसे निष्क्रांत संपत्ति बताते हुए लिख दिया गया।

रात में निर्माण गिराने का आरोप

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वर्ष 2019 की जांच में भूमि को शत्रु संपत्ति नहीं पाया गया था। इसके बावजूद जनवरी 2023 में अधिकारियों की ओर से निर्माण कार्य में हस्तक्षेप किया गया। याचिकाकर्ताओं के अनुसार निर्माण का कुछ हिस्सा रात में गिराया गया और संपत्ति पर निष्क्रांत संपत्ति होने का उल्लेख कर दिया गया।

इस कार्रवाई के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया और राज्य के अधिकारियों की कार्रवाई को चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में नहीं पाया शत्रु संपत्ति का प्रमाण

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों और अधिकारियों के रिकॉर्ड की समीक्षा की। कोर्ट ने विशेष रूप से इस तथ्य पर गौर किया कि शत्रु संपत्ति के आधिकारिक अभिरक्षक की ओर से स्पष्ट किया गया था कि विवादित संपत्ति शत्रु संपत्ति के रूप में दर्ज नहीं है।

अदालत के सामने राज्य सरकार की ओर से भी ऐसा कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका, जिससे यह प्रमाणित होता कि विवादित संपत्ति कभी शत्रु अथवा निष्क्रांत संपत्ति के रूप में दर्ज रही थी।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य की ओर से संपत्ति को शत्रु या निष्क्रांत संपत्ति बताकर की गई कार्रवाई पर गंभीरता से विचार किया और याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की।

स्वीकृत नक्शे के बावजूद निर्माण रोकने पर सवाल

हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ताओं ने निर्माण के लिए संबंधित विकास प्राधिकरण से नक्शा स्वीकृत कराया था। जब संपत्ति के रिकॉर्ड में उसके शत्रु या निष्क्रांत संपत्ति होने का प्रमाण नहीं मिला और निर्माण का नक्शा भी विधिवत स्वीकृत था, तब केवल दावे या मौखिक आरोपों के आधार पर निर्माण कार्य रोकना उचित नहीं माना जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति पर राज्य की ओर से इस प्रकार का हस्तक्षेप करने के लिए ठोस कानूनी आधार और संबंधित रिकॉर्ड का होना आवश्यक है।

याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण उपयोग में हस्तक्षेप पर रोक

खंडपीठ ने एसएमटी प्रेम गोयल और तीन अन्य की याचिका को मंजूर करते हुए राज्य के अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं के संपत्ति संबंधी शांतिपूर्ण उपयोग और कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोक दिया।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुजफ्फरनगर की इस संपत्ति को शत्रु अथवा निष्क्रांत संपत्ति बताकर की गई प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर उठे विवाद पर याचिकाकर्ताओं को न्यायिक राहत मिली है। अदालत के फैसले में संपत्ति के पुराने दस्तावेज, पूर्व की जांच और उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण आधार माना गया।

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