मुजफ्फरनगर(काशिफ जमाल)। शहर मुफ्ती जुल्फिकार हुसैन का संदेश, कुर्बानी ऐसे करें कि उससे किसी को परेशानी न हो रविवार को ईद उल अजहा यानी बकरीद का त्यौहार है। शहरे मुफ्ती जुल्फिकार हुसैन कहते हैं कि असल में जज्बा ए कुर्बानी दिलों में जगाने का नाम बकरीद है। कहते हैं कि कुर्बानी का मकसद अल्लाह की मर्जी यानी उसकाे खुश करना है। उन्होंने दीन के मानने वालों को संदेश दिया कि कुर्बानी का त्यौहार ऐसे मनाओ कि किसी को भी परेशानी न हो। लोगों में अमन, शांति का संदेश जाए। कोई दिखावा न हो। एक बात का ख्याल खासतौर से रखा जाए कि कुर्बानी के जानवरों के अवशेष गड्ढा खोदकर दफ्ना दिये जाएं।

गरीबों को अपनी खुशियों में शामिल करना जरूरी

मुफ्ती जुल्फिकार फरमाते हैं कि इस्लामिक कलेंडर के हिसाब से साल का अंतिम महीना जिलहिज का पड़ता है। इसी माह बकरीद यानी ईद-उल-अजहा का त्यौहार मनाया जाता है। वह कहते हैं कि कुर्बानी यानी ईद-उल-अजहा का मकसद गरीबों को भी अपनी खुशियों में शामिल करना है। इमाम संगठन उप्र. के अध्यक्ष मुफ्ती जुल्फिकार ने कहा कि कुर्बानी सिर्फ अल्लाह की खुश्नूदी (खुशी) के लिए होनी चाहिए। इसलिए कुरआन शरीफ में अल्लाह ने इरशाद फरमाया (संदेश दिया) है कि हमारे पास न कुर्बानी के जानवर का गोश्त आता है और न खून पहुंचता है। लेकिन तुम्हारा तक्वा यानी जज्बा पहुंचता है। इसलिए कुर्बानी का मकसद दिखावा और शोहरत कतई नहीं होना चाहिए।

मकबूल शायर व मस्जिद फखरशाह खालापार के पेश इमाम मौलाना खालिद जाहिद फरमाते हैं कि इस्लमिक महीनों की शुरुआत मोहर्रम और आखिर जिलहिज से होता है। जिलहिज में हजरत इब्राहीम ने अपने बेटे हजरत इस्माईल की कुर्बानी को राहे खुदा में पेश किया। मालूम हुआ कि इस्लाम में शुरु से लेकर आखिर तक कुर्बानी की फजीलत है।
ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का मकसद
पैगंबर हजरत इब्राहीम ने जिस तरह अल्लाह की मर्जी के लिए अपने महबूब बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी देनी चाही थी, उसी तरह कुर्बानी की सुन्नत को जिंदा रखने के लिए अपनी कीमती चीज अल्लाह की राह में कुर्बान कर गरीब व मिस्कीन को अपनी खुशियों में शामिल करना ईद-अल-अजहा का मकसद है।
ये है कुर्बानी की असली रूहानियत (आत्मा)
हजरत इब्राहीम अल्लाह के हुक्म पर अल्लाह के प्रति अपनी वफादारी दिखाने के लिए अपने बेटे हजरत इस्माइल को कुर्बान करने पर राजी हुए। इस त्यौहार का मकसद लोगों में आम आदमी के लिए खिदमत और उसके प्रति दिल में मोहब्बत जगाना है। अल्लाह के पास केवल इंसान के दिल की कैफियत पहुंचती है। यानी जब किसी इंसान का दिल पाक हो जाएगा और अल्लाह के लिए उसका पूर्ण समर्पण होगा तो उसका असर उसकी पूरी जिंदगी और पूरे समाज पर पड़ेगा। वह मानवता के खिलाफ कोई भी बुरा काम करने से बचेगा। जिससे तमाम दुनिया में अमन और मोहब्बत का माहौल बनेगा।

किस मुसलमान पर वाजिब है कुर्बानी
मुफ्ती जुल्फिकार ने बताया कि कुर्बानी हर उस बालिग मुसलमान पर वाजिब है जो हैसियतदार है और अक्ल रखता है। कुर्बानी के लिए तंदुरुस्त जानवर शर्त है। कुर्बानी का गोश्त तीन हिस्सों में तकसीम करने का हुक्म है। एक हिस्सा गरीब व मिस्कीन को व दूसरा रिश्तेदारों में बांटा जाए। तीसरा हिस्सा कुर्बानी करने वाला अपने पास रखेगा।
सुबह 6.30 बजे ईदगाह में होगी नमाज
शहर क़ाज़ी तनवीर आलम ने बताया कि ईद उल अजहा की नमाज मुजफ्फरनगर की ईदगाह में सुबह 6.30 बजे होगी। उन्होंने बताया कि विभिन्न मस्जिदों में नमाज के लिए समय निर्धारित किया गया है। बताया कि ईदगाह में ईद उल अजहा की नमाज सुबह 6:30 बजे और फक्कर शाह मस्जिद में सुबह 6:00 बजे और मस्जिद हौज वाली खालापार मैं सुबह 6:45 बजे होगी। उन्होंने बताया कि मस्जिद पीर वाली मल्लूपुरा में ईद का नमाज सुबह 6:45 और मस्जिद लियाकत पुरा चौड़ी गली लद्धावाला में सुबह 6:45 बजे तथा मस्जिद हौज वाली सरवट गेट मैं सुबह 6:45 बजे होगी। उन्होंने बताा कि मस्जिद नुमाइश कैंप विकास भवन के सामने सुबह 7:00 बजे और मस्जिद पुजाये वाली रहमत नगर में सुबह 7:00 बजे नमाज ए ईद उल अजहा अदा की जाएगी
कुर्बानी के दिन के नियम व एहतियात
बकरीद के दिन जिस बकरे या जानवर की कुर्बानी दी जाती है उसे तीन भागों में बांटा जाता है। जिसका पहला हिस्सा अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों को दिया जाता है। दूसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों और तीसरा परिवार के लोगो को दिया जाता है।
कौन कर सकता है कुर्बानी
जो व्यक्ति पहले से ही कर्ज में हो वह कुर्बानी नहीं दे सकता है।
जो व्यक्ति अपनी कमाई में से ढाई फीसदी हिस्सा दान देता हो साथ ही समाज की भलाई के लिए धन के साथ हमेशा आगे रहता हो उसे कुर्बानी देना जरुरी नहीं है।
ऐसे पशु जिसे शारीरिक बीमारी हो, सींग या काम का अधिकतर भाग टूटा हो और छोटे पशु की कुर्बानी नहीं दी जा सकती है।
इसके अलावा ईद की नमाज के बाद ही मांस को तीन हिस्सों में बांटा जाता है।