अहिंसा का सिद्धांत और इतिहास के पन्ने: गांधी जी के इन निर्णयों पर क्यों उठते रहे हैं सवाल?

अहिंसा का सिद्धांत और इतिहास के पन्ने: गांधी जी के इन निर्णयों पर क्यों उठते रहे हैं सवाल?

हिसंक गाँधी

हमने हमेशा कर्मचन्द गाँधी उर्फ महात्मा गाँधी को स्वतन्त्रता संग्राम के अहिंसावादी नेता के रूप में पढ़ा है। महात्मा गाँधी के अनुसार अहिंसा का अर्थ केवल किसी की शारीरिक हत्या न करना नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना है। गांधी जी का मानना था कि अहिंसा कायरों का कवच नहीं है, बल्कि यह बहादुरी और वीरता का उच्चतम गुण है। अहिंसा का सकारात्मक रूप असीम प्रेम और परोपकार है, जो शत्रु के मन को भी बदल सकता है।

गांधी जी के अनुसार सत्य साध्य (लक्ष्य) है और अहिंसा उसे पाने का साधन है। महात्मा गाँधी का देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के विरूद्ध आन्दोलन जिसे सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। इस आन्दोलन को अहिंसा पर आधारित कहा जाता है मगर महात्मा गाँधी के जीवन की यात्रा में ऐसी अनेकों घटनाये है जो महात्मा गाँधी को अहिंसावादी से हिंसावादी महात्मा गाँधी के रूप में प्रस्तुत करती है। 1 अप्रैल 1946 में महात्मा गांधी दिल्ली की वाल्मीकि बस्ती (भंगी कॉलोनी) में भगवान बाल्मीकि मंदिर में पहुँचकर कुरान पढ़ते है। मंदिर में कुरान की आयतों को पढ़ने का एक दलित महिला द्वारा विरोध करते हुए कहा जाता है कि आप पहले मस्जिद में रामायण व गीता का पाठ करे।

उस महिला का सैकड़ो दलित युवा समर्थन करते हुए गाँधी का पवित्र मंदिर में कुरान की आयतें पढ़ने का विरोध करते है। महात्मा गाँधी इसे अपनी प्रतिष्ठा बनाकर पुलिस बुलाकर 107 दलित हिन्दूओं के विरूद्ध मुकदमा दर्ज कराते हुए पुलिस सुरक्षा के बीच कुरान पढ़ते है। किसी की आस्था और धार्मिक मान्यताओं के प्रति यह गाँधी जी की हिसंक विचार धारा थी। ] सन 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में जब सुभाष चंद्र बोस ने महात्मा गांधी के समर्थित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में हराकर विजय प्राप्त की तो महात्मा गांधी अत्यन्त दु:खी हुए और उन्होंन पट्टाभि सीतारमैया की हार को “अपनी व्यक्तिगत हार” बताया था। कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने के बाद भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस से निष्कासित किया गया। इसे महात्मा गाँधी की तानाशाही व राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा कहा जा सकता है। कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो की विचारधारा का व्यक्ति इतना हिसंक हो सकता है कि उसने नेताजी की जीत से उत्पन्न ईर्ष्या को शांत करने के लिए जनसमर्थन को ही कुचल दिया। महात्मा गांधी का ब्रह्मचर्य प्रयोग सन 1906 (38 वर्ष की अवस्था) से प्रारम्भ होकर अंतिम सांस 29 जनवरी 1948 (78 वर्ष की अवस्था) तक चला।

इस ब्रह्मचर्य प्रयोग में महात्मा गाँधी की पौत्री मनु गांधी के अलावा आभा गांधी, सुशीला नायर जैसी महिला सहकर्मी और रिश्तेदार शामिल थीं। उनके इन विवादास्पद प्रयोगों में महिलाओं के साथ निर्वस्त्र सोना या स्नान करना शामिल था। समकालीन समय से लेकर आज तक इन प्रयोगो पर तीखी आलोचना और बहस होती रही है। महात्मा गाँधी की जीवन शैली से असंतुष्ट उनके बड़े बेटे हरिलाल गाँधी ने अपने पिता से जीवनभर कोई सम्बन्ध नही रखा।

वह हमेशा ब्रह्मचर्य प्रयोग करने वाले पिता का पुत्र होने पर स्वयं को अपमानित समझते थे। आज के इस आधुनिक युग में भी सम्पूर्ण भारतवर्ष में कोई धर्म, मज़हब व मत-मतान्तर ऐसा नही है, जो गाँधी जी के इस ब्रह्मचर्य प्रयोगों को सही ठहराये। वास्तव में यह कोई ब्रह्मचर्य प्रयोग नही बल्कि एक मानसिक, शारीरिक और सामाजिक हिंसा थी। शोध ग्रन्थ लिखने वाले, दुनियां के लिए आविष्कार करने वाले वैज्ञानिको का शोध इतने वर्ष नही लेता। महात्मा गाँधी ने 42 वर्ष ब्रह्मचर्य प्रयोग को देकर कौन सी खोज की। दुनियां व भारतवर्ष के हितो में काम आने वाला कौन सा शोध ग्रन्थ लिखा। दुनिया में कौन माता-पिता है जो इस तरह के प्रयोग के लिए अपनी बेटीयों को उत्साहित मन से समर्पित कर देगे। सरदार भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की गिरफ्तारी के बाद हिन्दुस्तान में स्वतन्त्रता को लेकर जो जनक्रांति, चेतना आयी वह स्वतन्त्रता संग्राम के लिए हुए किसी आन्दोलन में देखने को नही मिली। महात्मा गाँधी ने इन क्रान्तिकारियों के मार्ग को अनुचित बताते हुए इनकी सिफारिश करने से इंकार कर दिया।

हालाँकि बाद में जनचेतना को देखते हुए व समर्थको के दबाव में गाँधी जी ने भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी की सजा माफ करने की सिफारिश की। मगर इतिहासकार मानते हैं कि महात्मा गांधी यदि अपनी पूरी राजनीतिक ताकत लगाते या गांधी-इरविन समझौते में इसे अनिवार्य शर्त बनाते, तो भगत सिंह की फांसी को टलवाया या कम करवाया जा सकता था। गाँधी जी का यह प्रयास मात्र औपचारिकता थी जो मानसिक हिंसा को प्रमाणित करती है। स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री का चयन प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों (राज्य इकाइयों) के वोट से हो रहा था। सरदार वल्लभभाई पटेल को 28 वोट व जवाहरलाल नेहरू को केवल 2 वोट मिले लेकिन गाँधी जी की मनमानी के सामने सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया और गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया। इसे भी शास्त्रों के अनुसार हिंसा ही कहा जाता है।

स्वामी श्रद्धानंद द्वारा चलाये जा रहे शुद्धि आंदोलन और धार्मिक मतभेदों के कारण 23 दिसंबर 1926 को अब्दुल रशीद स्वामी जी की हत्या कर पाकिस्तान भाग गया। गाँधी जी ने स्वामी जी के हत्यारे को भाई कहकर संबोधित करते हुए कहा कि मैं तुमसे नफ़रत नही करता क्योंकि ये बदले की भावना की प्रतिक्रिया है। स्वामी श्रद्धानंद द्वारा चलाये जाने वाला घर वापसी और शुद्धिकरण आंदोलन जिसने आगे चलकर नवम्बर 1936 में हरिलाल गाँधी से इस्लाम धर्म स्वीकार कर अब्दुल्ला गाँधी बने महात्मा गाँधी के सबसे बड़े बेटे को कस्तूरबा गाँधी के आग्रह पर सनातन धर्म में वापसी (घर वापसी) कराई थी। क्या अहिंसा का पालन करने के लिए स्वामी जी जिन्होंने कर्मचन्द गाँधी को महात्मा की उपाधि से अलंकृत किया अर्थात महात्मा नाम दिया उसके हत्यारे को भाई और इस कायरतापूर्ण हत्या को बदले की भावना कहना आवश्यक था? शायद यह भी आन्तरिक व आत्मिक हिंसा थी।

14-15 अगस्त 1947 को देश के विभाजन के बाद देश में हुए कत्लेआम, बंगाल व पाकिस्तान से हिन्दूओं की लाशों से भरी ट्रेने और कश्मीर पर पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा हमला महात्मा गाँधी के लिए गम्भीर मुद्दा नही बल्की पाकिस्तान को सर ढ़कने के लिए 55 करोड़ रूपया दिलाना महत्वपूर्ण था। इस बात को लेकर सरदार वल्लभभाई पटेल और गाँधी में वैचारिक मतभेद थे। जिसके लिए जनवरी 1948 में महात्मा गांधी अनशन पर बैठ गये और सरकार पर 55 करोड़ रूपए पाकिस्तान को देने का दबाव बनाया। जिसे बाद में सांप्रदायिक सद्भाव और शांति बनाए रखने के लिए गांधीजी का आमरण अनशन भी कहा गया जो पाकिस्तान को रकम देते ही समाप्त हो गया। ऐसे समय में देश का विभाजन कर मासूम लोगो का कत्लेआम करवाने वाले गद्दारो को 55 करोड़ रूपये दिलाना किसी हिंसा से कम नही था। आमरण अनशन, चेतावनी द्वारा किसी को बाध्य करना भी एक हिंसा है। गाँधी के जीवन की ऐसी अनेको घटनायें है जो अहिंसावादी कर्मचन्द गाँधी उर्फ महात्मा गाँधी को हिसंक महात्मा गाँधी के रूप में प्रस्तुत करती है। अहिंसा की सही परिभाषा भगवान महावीर ने प्रस्तुत की है। मन, वचन और कर्म से अहिंसावादी होने के लिए ईर्ष्या, लोभ, महत्वाकांक्षा, काम ईच्छाओं का त्याग आवश्यक है। ब्रह्मचर्य प्रयोग जैसी विकारात्मक कामनाओं का अहिंसा के मार्ग में कोई स्थान नही है।

लेखक : आर.आर.डी. उपाध्याय
समाजसेवी, फ्रीलांसर जर्नलिस्ट एवं पॉलिटिकल एडवाइजर

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