अजब – गजब: मुज़फ्फरनगर में 3 लाख मतदाता और अकेले चुनाव जिताने का ठेका! ** संगीत सोम को चुनाव लड़ने का आमंत्रण और जिताने की गारंटी


आर पी तोमर
लोकतंत्र में किसी भी जनप्रतिनिधि की किस्मत का फैंसला उस क्षेत्र का मतदाता करता है। वही जीत हार का अंतिम निर्णय करता है। इसलिए ही 5 साल बाद सही पूजा जाता है। क्योंकि हर वोट की अपनी अहमियत होती है। आज़ादी के बाद हुए चुनावों में ऐसा कोई भी उदाहरण नही है कि लाखों मतदाताओं का ठेका किसी एक व्यक्ति ने लिया हो और अकेले ने ही किसी व्यक्ति विशेष को जितवाकर भेज दिया हो। ऐसा ही दावामुज़फ्फरन गर के एक संपादक ने किया है, जो लोगों के गले नही उतर रहा है। न ही ऐसा कोई समीकरण नज़र आता है। यद्यपि उक्त संपादक की अपनी छवि, जान पहचान और पकड़ अच्छी हो सकती है लेकिन अकेले ही पूरे चुनाव पर कब्जा कुछ अटपटा जरूर लगता है। अगर मुज़फ्फरनगर विधानसभा का इतिहास देखा जाए तो इस सीट पर अधिकांशतः वैश्य वर्ग का कब्जा रहा है। इसलिए ही भाजपा मुज़फ्फरनगर सदर यानी कि शहरी सीट पर वैश्य वर्ग से और संसदीय सीट पर जाट को मैदान में उतारती रही है। 1952 व 57 में इस सीट पर द्वारका प्रसाद मित्तल, 1962 में केशव गुप्ता, 1967 में विष्णु स्वरूप,1969: सईद मुर्तजा (भारतीय क्रांति दल)1974, 2092 व 2012 में चितरंजन स्वरूप, 1980 में विद्याभूषण, 1985 में चारुशीला, 1989 में सोमांश प्रकाश, 1991 व 93 में डॉ सुरेश संगल, 1996 में सुशीला अग्रवाल, 2007 में अशोक कंसल, 2015, 2017 व 2022 के विधानसभा चुनाव में वैश्य वर्ग के कपिल देव अग्रवाल विधायक चुने गए हैं। केवल 1977 में ब्राह्मण मालती शर्मा और 1969 में सईद मुर्तजा मुस्लिम विधायक रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इस सीट पर वैश्य वर्ग का कब्जा रहा है। भले ही पार्टी कोई भी हो यद्यपि जातिगत आधार पर देखा जाए तो इस सीट पर 35 हज़ार के लगभग वैश्य वर्ग के वोट हैं। अब एसआईआर के बाद जब मुज़फ्फरनगर सीट पर मतदाताओं की संख्या घटकर 3,11, 887 रह गई है तो जातिगत भी कुछ कम हो सकती हैं। लेकिन मुस्लिमों की वोट आज भी एक लाख के लगभग है और अकेले चुनाव जितवाकर भेजने का दावा करने वाले जिस वर्ग के संपादक पंजाबी व सिख से आते हैं उनकी वोट केवल 16 हज़ार के आसपास है। क्योकि वे संपादक बनने से पूर्व व्यापारी रहे हैं ऐसे में उनका असर कुछ व्यापारियों में हो सकता है लेकिन विधानसभा की 3 लाख से अधिक वोटों के ठेकेदार बनकर यह कहना कि वे अकेले ही संगीत सोम को मुज़फ्फरनगर सीट से जितवाकर भेजेंगे, उचित नही है। क्योकि चुनाव में हारजीत का फैंसला मतदाता करता है। लोकतंत्र में वही अंतिम निर्णय करता है हा अगर जीत-हार का अंतर एक वोट का रह जाये तो एक वोट निर्णायक हो जाती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 एक सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को निर्वाचित सरकार के सभी स्तरों के चुनावों के आधार के रूप में परिभाषित करता है। सर्वजनीन मताधिकार से तात्पर्य है कि सभी नागरिक जो 18 वर्ष और उससे अधिक उम्र के हैं, उनकी जाति या शिक्षा, धर्म, रंग, प्रजाति और आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद वोट देने के लिए स्वतंत्र हैं। नवीन संविधान लागू होने के पूर्व भारत में 1935 के “गवर्नमेंट ऑव इंडिया ऐक्ट” के अनुसार केवल 13 प्रति शत जनता को मताधिकार प्राप्त था। मतदाता की अर्हता प्राप्त करने की बड़ी बड़ी शर्तें थीं। केवल अच्छी सामाजिक और आर्थिक स्थिति वाले नागरिकों को मताधिकार प्रदान किया जाता था। इसमें विशेषतया वे ही लोग थे जिनके कंधों पर विदेशी शासन टिका हुआ था। परंतु अब ऐसा नहीं है। न ही कोई व्यक्ति पूरे विधानसभा क्षेत्र के वोटो का ठेका ले सकता है। न ही आज तक कभी ऐसा हुआ है कि किसी भी अकेले व्यक्ति ने किसी भी विधानसभा में किसी व्यक्ति विशेष को जितवाया हो।
जहाँ तक मुज़फ्फरनगर विधानसभा सीट पर संगीत सोम के चुनाव लड़ने की बात है तो ऐसा नही लगता कि वे अपनी मजबूत सीट सरधना छोड़कर मुज़फ्फरनगर से दावेदारी करेंगे। आने वाले चुनाव के लिए भाजपा व संघ मिलकर निजी एजेंसियों से सर्वे भी करा रहा है। जिसमें क्षेत्र में वर्तमान विधायक की सक्रियता, काम, लोकप्रियता आदि देखा जा रहा है। उस दृष्टि से कपिल देव अग्रवाल कही फेल होते नज़र नही आते हैं। वे भाजपा व संघ के बड़े नेताओं के भी लगातार संपर्क में हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गुड बुक में भी। साथ ही भाजपा की पसंद वैश्य वर्ग से भी हैं। तीनों बार विजयी भी रहे हैं, ऐसे में उनका टिकट काटना मुश्किल दिखाई देता है हालांकि होने को कुछ भी हो सकता है। यह ठीक है कि उक्त संपादक व मंत्री कपिल देव के बीच मतभेद हैं। वह यह भी दावा करते हैं कि पिछली बार कपिल का टिकट उन्होंने ही कराया था। हालांकि कुछ लोगों ने उनके बीच मतभेद दूर कराने का भी दावा किया था लेकिन हाल में उन्होंने संगीत सोम को मुज़फ्फरनगर से चुनाव लड़ने और अकेले ही जितवाकर भेजने का जो वीडियो जारी किया था, उससे नही लगता कि मतभेद दूर हो गए हैं। खेर अभी तो उक्त घोषणा लोगों को अतिशयोक्ति ही लगती है। उनका यह दावा कितना दमदार है, यह तब पता चलेगा जब संगीत सोम मुज़फ्फरनगर से चुनाव लड़े और जीतकर जाएं।

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