पुरकाजी। भव्य बारात के बाद पुरकाजी में श्री राम लीला महोत्सव के आठवें दिन वृंदावन से आए श्री राम कृष्ण लीला मंडल ने मनमोहक लीला को प्रदर्शित किया जिसके प्रारंभ में सखियों के द्वारा श्री राम को छैडा जाना दिखाया गया। जैसे ससुराल में अक्सर होता है इसके बाद महाराजा दशरथ के दरबार का पर्दा शुरू हुआ जिसमें महाराज दशरथ शीशे में देखते हुए अपनी सिर के बालों में सफेद बाल पाने पर चिंतित हो उठते हैं और स्वयं के लिए वानप्रस्थ की योजना बनाते हैं और भगवान श्रीराम को राज तिलक करने के लिए गुरु से राय लेते हैं गुरु वशिष्ट की सहमति के बाद राजा दशरथ घोषणा करते हैं कि अगले दिन भगवान श्री राम अयोध्या के राजा होंगे यह खबर सुनते ही अयोध्या वासियों में खुशी की लहर उठती है और मंच पर एक अलग ही वातावरण बन जाता है परंतु देव लोक के देवता चिंतित होते हैं उन्हें चिंता सताने लगती है कि यदि भगवान श्री राम अयोध्या के राजा बन गए तो हमें रावण से मुक्ति कौन दिलाएगा इसी के चलते सभी देवता माया देवी को अयोध्या में भेजते हैं और इस प्रकार की रचना करने के लिए कहते हैं कि भगवान श्री राम को वनवास हो जाए माया देवी दासी मंथरा की बुद्धि पर अपना प्रभाव डालती है और मंथरा कैकयी को भगवान श्री राम के विरुद्ध उकसाती है प्रारंभ में तो केकई मंथरा को भला-बुरा कहती है परंतु बाद में केकई के भी यह बात समझ में आ जाती है और यह अपने सभी राजसी वस्त्र त्याग कर कोप भवन में जाकर लेट जाती है क्योंकि रानी केकई महाराज दशरथ को अत्यधिक प्रिय थी। दशरथ को जब पता लगता है कि रानी कोप भवन में लेटी हुई है तो महाराजा दशरथ सीधे उनसे मिलने पहुंच जाते हैं रानी केकई को कई बार मनाने के बाद वह नहीं मानती।काफी प्रयास करने के बाद रानी केकई राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांगने के लिए वचन लेती है वह उन्हें वचन देते हैं कि मैं तुम्हें दोनों वरदान देता हूं रानी केकई पहले वरदान में भरत को अयोध्या का सिंहासन मांगती है राजा दशरथ स्वीकार कर लेते हैं परंतु जब दूसरा वरदान सुनते हैं तो राजा दशरथ चिल्ला उठते हैं क्योंकि कई दूसरे वरदान में प्रभु श्री राम को 14 वर्ष के लिए वनवास मांगा था राजा दशरथ केकई को बहुत मनाते हैं कि अपने दूसरे वरदान की जगह कुछ भी ले लो अगर राम वनवास को चले गए तो मेरे प्राण चले जाएंगे परंतु रानी केकई नहीं मानती है राजा दशरथ राम राम चिल्लाते हुए मूर्छित हो जाते हैं भगवान श्रीराम को जब यह पता लगता है तो दौड़े दौड़े महल में आते हैं केकई द्वारा सम्पूर्ण वृतांत बताया जाता है भगवान श्री राम स्वीकार कर कौशल्या से आज्ञा लेने जाते हैं माता अत्यंत दुखी होकर उनको आज्ञा देती है जब सीता माता को पता लगता है सीता माता भी उनके साथ वन में जाने के लिए तैयार हो जाती है लक्ष्मण जी भगवान श्री राम के वन में जाने पर अत्यंत परेशान हो उठते हैं और अपनी माता सुमित्रा से आज्ञा लेकर वह भी उनके साथ वन जाने के लिए तैयार हो जाते हैं यहीं पर प्रभु श्री राम की लीला का विश्राम हो जाता है आज की लीला के दैनिक यजमान संदीप गोयल जी सपरिवार रहे श्री रामलीला कमेटी के द्वारा उनको सोल माला उड़ा कर सम्मानित किया गया और प्रतीक चिन्ह के रूप में श्री राम दरबार पेश किया गया मंचन के दौरान आंनद धीमान रोबिन गोयल विपिन सिंगल राघव गोयल जसवीर सैनी सुरेंद्र सैनी कोतवाल विनीत धीमान आदि उपस्थित है।
