वैसे तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, परन्तु काफी समय से दोनों में समय-समय पर आपस में मतभेद पाये गये हैं, विज्ञान हर विषय को कई-कई बार कसौटी पर खरा उतरने के उपरान्त ही अध्यात्म के किसी भी विषय को स्वीकार करता हैै। उक्त विषय के बारे में विश्व वैज्ञानिक आइंस्टीन ने दो पंक्ति में अध्यात्म और विज्ञान के सम्बन्ध् को स्पष्ट कर दिया है।
‘‘अध्यात्म विज्ञान के बिना लंगडा है
विज्ञान अध्यात्म के बिना अंधा है’’
उक्त पंक्तियों को पढने के उपरान्त कुछ स्थिति समझने के लिए हमें गहन चिंतन करना होगा, क्योंकि इसमें जबरदस्त रहस्य छिपा हुआ है। अध्यात्म और विज्ञान के सम्बन्ध् में इससे सुन्दर पंक्तियां दुनिया में कहीं नहीं मिल सकती। उक्त पंक्तियों को पढने, समझने के उपरान्त जब मेरे द्वारा चिंतन किया गया तो मैं यह समझ पाया कि अध्यात्म विज्ञान के बिना इसलिए लंगडा है, क्योंकि जब कोई ज्योतिषि विज्ञान द्वारा यह बताया जाता है कि आप किसी भी गृह शान्ति हेतु फला नग ;रत्न धारण करें, परन्तु वह यह नहीं बता पाता कि उक्त रत्न क्यों धारण करें, कैसे धारण करें, कब धारण करे और इससे क्या क्रिया-प्रतिक्रिया होगी। हो सकता है कि वह यह बताने में सक्षम हो कि कैसे धारण करे, कब करे, परन्तु वैज्ञानिक आधर क्या है वे इसे स्पष्ट करने में निरूत्तर होते हैं। इसी बात को लेकर ;आइन्सटाईन वैज्ञानिक का मत शत-प्रतिशत सही है और दूसरी तरफ उनका उक्त कथन कि विज्ञान अध्यात्म के बिना अंधा यह उदाहरण भी शत-प्रतिशत सही है, जब इस पर मेरे द्वारा विचार किया गया तो ज्ञात हुआ कि उक्त पंक्ति भी सही है, क्योंकि हिरोशिमा और नागासाकी जापान के शहर पर 8 अगस्त 1945 को अमेरिका द्वारा एटम बम गिराकर इन शहरों को पूर्णतः नष्ट कर दिया गया था। इससे स्पष्ट है कि विज्ञान ने यह नहीं देखा कि इसके परिणाम क्या होंगे, कितने लोग मरेंगे, कितना विनाश होगा। इस प्रकार हम विज्ञान को अंधा कह सकते हैं, इसके अलावा कुछ अन्य विषयों पर भी विचार किया गया है, जिसमें कुछ प्रमुख विषय है। रिसर्च, सिद्धि,तंत्र मंत्र, मूर्ति, आदि।
रिसर्चः- इतिहास गवाह है जब से विज्ञान का युग आरम्भ हुआ है, हम सुनते आ रहे हैं कि एडिसन, आर्कमिडिज, आईन्सटाईन, न्यूटन, मैडम क्यूरी, थॉमसन, हाइगेंस थ्यौरी, इलैक्ट्रोन थ्यौरी आदि की रिसर्च फला वैज्ञानिक द्वारा की गई है तो आश्चर्य होता है कि वैज्ञानिक यह कहता है कि रिसर्च मेरे द्वारा की गई है, परन्तु वह यह कहने का अधिकारी नहीं है कि उसने सर्च की है, क्योंकि सर्च कभी होती ही नहीं, क्योंकि सर्च का शाब्दिक अर्थ है, खोज और रिसर्च का शाब्दिक अर्थ है, पुनः खोज। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वैज्ञानिक सर्च नहीं कर पाया। रिसर्च की गई है। इसका सीधा-सीधा तात्पर्य है कि सब कुछ ब्राह्मांड से पहले से विद्यमान है। यहां पर मैं गीता के कुछ उदाहरण देना चाहूंगा। गीता कहती है कि जो ब्राह्मांड में है वही पिंड में है अर्थात शरीर में विद्यमान है। मैंने अपने चिंतन में यह पाया है कि जब कोई व्यक्ति गहरी सोच, जैसा कि मैडिटेशन में होता है, के द्वारा किसी विषय पर गहन चिंतन करता है, तो वे वाइब्रेशन जो इस विषय से संबंधित है। ब्राह्मांड में स्थित इथर जो ब्रह्मांड में फैला हुआ है में कम्पन्न द्वारा फ्रीक्वेंसी को पकड लेती है, जो ब्राह्मांड में पहले से ही स्थित है और वो वाईब्रेशन विचार के आने पर एक रिसर्च का रूप ले लेते हैं। मष्तिस्क इतना संवेदनशील है कि वह ब्राह्मांड में उपस्थित किसी भी कम्पन्न वाईब्रेशन को किसी भी आवृत्ति पर ट्यून किया जा सकता है और रिसर्च की जा सकती है।

