मुजफ्फरनगर। शहर कोतवाली क्षेत्र के शेरपुर गांव में गोकशी के आरोप में कार्रवाई करने पहुंची पुलिस टीम पर चाकू से हमला करने के करीब 12 साल पुराने मामले में अदालत ने दो आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कोर्ट संख्या-तीन के न्यायाधीश अनुराग पंवार ने साक्ष्यों में विरोधाभास और अभियोजन पक्ष द्वारा आरोप साबित नहीं कर पाने के आधार पर यह फैसला सुनाया। अदालत ने पुलिस पर हमले और गोकशी से संबंधित दोनों अलग-अलग मुकदमों में इसरार और कामिल को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। पांच नवंबर 2026 को सुनाए गए इस फैसले के साथ ही शेरपुर गांव की घटना से जुड़े दोनों पुराने मुकदमों का निस्तारण हो गया।

मुखबिर की सूचना पर शेरपुर गांव पहुंची थी पुलिस टीम

अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 22 नवंबर 2014 की है। उस समय शहर कोतवाली पुलिस की टीम रुड़की चुंगी क्षेत्र में गश्त करने के साथ संदिग्ध वाहनों की चेकिंग कर रही थी। इसी दौरान पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि शेरपुर गांव में इसरार के घर के बाहर गोकशी की जा रही है।
सूचना मिलने पर उपनिरीक्षक बाबूलाल पुलिसकर्मियों के साथ मौके पर पहुंचे थे। पुलिस के अनुसार, वहां पहुंचने पर भीड़ एकत्र थी और गोवंश के अवशेष पड़े हुए थे। पुलिस टीम ने मौके से इसरार पुत्र सगीर और कामिल पुत्र इस्लाम को पकड़ने का दावा किया था। आरोप था कि पुलिसकर्मियों को देखकर दोनों आरोपियों ने चाकू से हमला करने का प्रयास किया। इसके बाद पुलिस ने दोनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू की थी।
पुलिस पर हमले और गोकशी के अलग-अलग मुकदमे
पुलिस ने इसरार और कामिल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 307, 332, 353 और क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट के तहत पुलिस पर हमले से संबंधित मुकदमा दर्ज किया था। वहीं, गोकशी के आरोप में गोवध निवारण अधिनियम की धारा 3/5/8 के तहत अलग से मामला दर्ज किया गया था। दोनों मुकदमों की सुनवाई अदालत में हुई।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने पुलिसकर्मियों की गवाही और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोप साबित करने का प्रयास किया। हालांकि, अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन के साक्ष्यों में कई कमियां सामने आईं। पुलिस की ओर से घटना के समय मौके पर 50 से 100 लोगों की भीड़ मौजूद होने की बात कही गई थी, लेकिन अभियोजन पक्ष किसी भी स्वतंत्र व्यक्ति को गवाही के लिए अदालत में पेश नहीं कर सका।
पुलिसकर्मियों के बयानों में विरोधाभास, बरामदगी पर भी उठे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिसकर्मियों के बयानों का बारीकी से परीक्षण किया। इसमें कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर उनके बयानों में विरोधाभास सामने आए। इसके अलावा कथित बरामदगी, बरामद सामान को सील करने की प्रक्रिया और उसे मालखाने में जमा कराने से संबंधित साक्ष्यों में भी कमियां पाई गईं।
अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति और पुलिसकर्मियों के बयानों में विरोधाभास भी अभियोजन के पक्ष को कमजोर करने वाले महत्वपूर्ण पहलू रहे।
संदेह का लाभ देकर दोनों आरोपियों को किया दोषमुक्त
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कोर्ट संख्या-तीन के न्यायाधीश अनुराग पंवार ने पांच नवंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए इसरार और कामिल को दोनों मुकदमों में दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने पुलिस पर हमले और गोकशी के आरोपों को अभियोजन पक्ष द्वारा संदेह से परे साबित नहीं किए जाने के आधार पर दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ दिया। इस फैसले के बाद वर्ष 2014 में शेरपुर गांव की घटना से जुड़े दोनों मुकदमों का निस्तारण हो गया।

