मुजफ्फरनगर/शामली। वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान शामली जनपद के लांक गांव में बुजुर्ग महिला सकूरन की गैर इरादतन हत्या के मामले में अदालत ने आठ आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या तीन के पीठासीन अधिकारी अनुराग पंवार ने अभियोजन पक्ष की ओर से आरोप साबित नहीं कर पाने और साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास पाए जाने के आधार पर यह फैसला सुनाया। मामले में कुल नौ लोगों को आरोपी बनाया गया था, लेकिन मुकदमे की सुनवाई के दौरान एक आरोपी दीपक की मृत्यु हो गई थी। अदालत ने उपलब्ध गवाहों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और प्राथमिकी में सामने आई विसंगतियों का परीक्षण करने के बाद शेष आठ आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

नंगला मंदौड़ पंचायत के बाद भड़के दंगे से जुड़ा था मामला
यह मामला सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर और आसपास के क्षेत्रों में भड़के सांप्रदायिक दंगे के दौरान हुई घटना से संबंधित है। सात सितंबर 2013 को नंगला मंदौड़ में पंचायत आयोजित हुई थी। इसके बाद मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में तनाव बढ़ गया था और कई स्थानों पर हिंसक घटनाएं हुई थीं।

इसी घटनाक्रम के दौरान आठ सितंबर की रात शामली जनपद के लांक गांव में करीब 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला सकूरन के सिर पर वार किए जाने का आरोप लगा था। घटना में घायल महिला को पुलिस सुरक्षा में पहले शामली और फिर जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया था। बाद में उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी।
मृतका के बेटे युसूफ सैफी ने 21 अक्टूबर 2013 को प्राथमिकी दर्ज कराते हुए गांव लांक निवासी वीरेंद्र, विकास, अंकुर, जगपाल, अरविंद, मोहित, अनुज और संदीप के अलावा बागपत जनपद के सुन्हेड़ा निवासी दीपक को आरोपी बनाया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपियों ने घर पर हमला कर उनकी मां को घायल कर दिया था। पुलिस ने विवेचना पूरी करने के बाद आरोपियों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या से संबंधित धाराओं में आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया था।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान एक आरोपी की हुई मौत
मामले की न्यायिक सुनवाई के दौरान सुन्हेड़ा निवासी आरोपी दीपक की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद शेष आठ आरोपियों के खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही जारी रही।
अदालत ने आठ अगस्त 2017 को आरोप तय किए थे। अभियोजन पक्ष ने अपने आरोपों को साबित करने के लिए न्यायालय में पांच गवाह पेश किए। हालांकि, सुनवाई के दौरान गवाहों के बयानों और चिकित्सकीय साक्ष्यों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आए।
अदालत ने गवाहों की गवाही, प्राथमिकी में दर्ज तथ्यों और मेडिकल दस्तावेजों का परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी को समर्थन देने वाले प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य भी उपलब्ध नहीं हो सके। इन परिस्थितियों में आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो पाए।
दो अलग-अलग प्राथमिकी से मामले में सामने आए विरोधाभास
मुकदमे की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि सकूरन की मौत से संबंधित मामले में दो अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज कराई गई थीं। पहली प्राथमिकी मृतका के बेटे युसूफ सैफी की ओर से दर्ज कराई गई थी, जबकि दूसरी प्राथमिकी कैराना राहत शिविर में साजिद की ओर से दी गई थी।
दोनों प्राथमिकी की जांच एक साथ की गई थी, लेकिन उनमें दर्ज तथ्यों और घटनाक्रम के विवरण में अंतर पाया गया। अदालत के समक्ष प्राथमिकी दर्ज होने, पंचायतनामा तैयार किए जाने और मेडिकल परीक्षण से संबंधित तथ्यों में भी विसंगतियां सामने आईं।
अदालत ने इन तथ्यों को महत्वपूर्ण माना, क्योंकि किसी आपराधिक मामले में आरोपों को साबित करने के लिए घटनाक्रम और उपलब्ध साक्ष्यों के बीच स्पष्ट संबंध होना आवश्यक है। दोनों प्राथमिकी में सामने आए अंतर के चलते अभियोजन पक्ष की कहानी पर सवाल खड़े हुए।
मेडिकल हिस्ट्री में भी सामने आया अंतराल
अदालत में पेश दस्तावेजों के अनुसार, घायल सकूरन को नौ सितंबर को जिला अस्पताल लाया गया था। दस सितंबर को चिकित्सकों ने उनकी जांच की थी। इसके बाद परिजनों ने 12 सितंबर को अपनी इच्छा से उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज करा लिया था।
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उनके उपचार से संबंधित पूरी मेडिकल हिस्ट्री उपलब्ध नहीं हो सकी। बाद में 21 अक्टूबर को कैराना में उनकी मृत्यु हो गई।
इस बीच उपचार के दौरान क्या स्थिति रही और मृत्यु से पहले उनकी चिकित्सकीय देखभाल किस प्रकार हुई, इससे संबंधित पर्याप्त दस्तावेज अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत नहीं किए जा सके। मेडिकल रिकॉर्ड में इस अंतराल को भी अदालत ने साक्ष्यों के परीक्षण के दौरान महत्वपूर्ण माना।
वादी और उनकी पत्नी ने प्रत्यक्षदर्शी होने से किया इनकार
मामले की सुनवाई में अभियोजन पक्ष को एक और महत्वपूर्ण झटका तब लगा, जब मृतका के बेटे युसूफ सैफी और उनकी पत्नी ने अदालत में घटना का प्रत्यक्षदर्शी होने से इनकार कर दिया।
प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों के समर्थन में प्रत्यक्षदर्शी गवाही महत्वपूर्ण हो सकती थी, लेकिन वादी और उनकी पत्नी के बयानों से अभियोजन पक्ष को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।
अदालत में प्रस्तुत पांच गवाहों की गवाही का परीक्षण करने पर भी आरोपियों की संलिप्तता को लेकर संदेह दूर नहीं हो सका। इस तरह मामले में प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य की कमी और गवाहों के बयानों में विरोधाभास अभियोजन पक्ष के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बने।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर पर केवल एक चोट का उल्लेख
अदालत के फैसले में मेडिकल और पोस्टमार्टम रिपोर्ट की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। पंचनामे में मृतका की दाहिनी आंख के ऊपर सिर पर एक चोट का उल्लेख किया गया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी सिर पर एक ही चोट दर्ज पाई गई।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि नौ आरोपियों ने धारदार हथियारों से हमला कर बुजुर्ग महिला को घायल किया था। लेकिन चिकित्सकीय दस्तावेजों में केवल एक चोट का उल्लेख होने से अभियोजन की ओर से बताए गए हमले के तरीके और मेडिकल साक्ष्यों के बीच विरोधाभास सामने आया।
अदालत के समक्ष यह सवाल भी रहा कि यदि आरोपों के मुताबिक नौ लोगों ने धारदार हथियारों से हमला किया था तो मृतका के शरीर पर अन्य चोटों के निशान क्यों नहीं मिले।
चोटों की संख्या, हमले के आरोप और चिकित्सकीय रिपोर्ट के बीच तालमेल नहीं बैठने के कारण अभियोजन पक्ष आरोपियों की भूमिका को विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित नहीं कर सका।
साक्ष्यों की कड़ियां नहीं जुड़ने पर मिला संदेह का लाभ
मुकदमे की सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों में दो प्राथमिकी के बीच विरोधाभास, मेडिकल हिस्ट्री का अभाव, प्रत्यक्षदर्शियों का समर्थन नहीं मिलना और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज चोटों की स्थिति जैसे महत्वपूर्ण पहलू शामिल रहे।
अदालत ने सभी उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण किया। अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित नहीं कर पाया।
इन परिस्थितियों में अदालत ने शेष आठ आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त करार दिया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मृत्यु होने के कारण उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो चुकी थी।
2013 के दंगों से जुड़े मुकदमों में एक और फैसला
वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर और आसपास के क्षेत्रों में भड़के दंगों के दौरान कई आपराधिक घटनाएं हुई थीं। इन घटनाओं से जुड़े विभिन्न मुकदमे लंबे समय तक न्यायालयों में विचाराधीन रहे। लांक गांव की बुजुर्ग महिला सकूरन की मौत से संबंधित यह मामला भी उन्हीं मुकदमों में शामिल था।
अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या तीन ने उपलब्ध साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष की ओर से आरोप साबित नहीं कर पाने के आधार पर आठ आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। अदालत के इस फैसले में प्रत्यक्षदर्शी गवाही, मेडिकल दस्तावेजों और प्राथमिकी में सामने आई विसंगतियां अहम आधार बनीं।

