मुजफ्फरनगर। ऑनलाइन स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी हासिल करने के लिए इंटरनेट पर हेल्थकेयर वेबसाइट तलाशना छपार थाना क्षेत्र के एक व्यक्ति को भारी पड़ गया। अल्ट्रासाउंड कराने के लिए गूगल पर वेबसाइट खोज रहे खामपुर गांव निवासी भोपाल सिंह के बैंक खाते से कथित तौर पर 3 लाख 20 हजार रुपये निकाल लिए गए। पीड़ित का आरोप है कि वेबसाइट खोलने के दौरान उनके मोबाइल फोन में बिना जानकारी के एक संदिग्ध ऐप इंस्टॉल हो गई। इसके बाद साइबर अपराधियों ने मोबाइल फोन तक अनधिकृत पहुंच बनाकर यूपीआई सहित अलग-अलग माध्यमों से खाते में जमा रकम दूसरे खातों में ट्रांसफर कर दी। पीड़ित ने फोन-पे के स्क्रीनशॉट, ट्रांजेक्शन आईडी और यूटीआर नंबर समेत कई डिजिटल साक्ष्य पुलिस को सौंपे हैं। शिकायत के आधार पर छपार थाना पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है।

अल्ट्रासाउंड कराने के लिए गूगल पर तलाश रहे थे वेबसाइट

छपार थाना क्षेत्र के ग्राम खामपुर, पोस्ट रेई निवासी भोपाल सिंह ने पुलिस को दी गई शिकायत में बताया कि उन्हें 26 अक्टूबर 2026 को अपना अल्ट्रासाउंड कराना था। इसके लिए वह इंटरनेट पर संबंधित स्वास्थ्य सेवाओं और हेल्थकेयर वेबसाइट की जानकारी तलाश रहे थे। उन्होंने गूगल पर सर्च कर एक वेबसाइट खोली और अल्ट्रासाउंड से संबंधित जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया।
भोपाल सिंह का आरोप है कि वेबसाइट पर जानकारी देखते समय उनके मोबाइल फोन में एक ऐप इंस्टॉल हो गई, जबकि उन्होंने जानबूझकर कोई ऐप डाउनलोड नहीं की थी। शुरुआत में उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं हुआ कि उनके मोबाइल में कोई संदिग्ध गतिविधि हो रही है। बाद में उन्हें जानकारी हुई कि उनके मोबाइल फोन का अनधिकृत तरीके से इस्तेमाल किया गया और बैंक खाते से रकम निकाल ली गई।
सुबह साढ़े आठ से नौ बजे के बीच शुरू हुए संदिग्ध लेनदेन
पीड़ित के अनुसार, घटना वाले दिन सुबह करीब साढ़े आठ बजे से नौ बजे के बीच उनके बैंक खाते से लगातार संदिग्ध लेनदेन किए गए। इस दौरान साइबर ठगों ने अलग-अलग भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल करते हुए करीब 3 लाख 20 हजार रुपये खाते से निकाल लिए।
भोपाल सिंह का कहना है कि उन्होंने इन लेनदेन के लिए किसी को अनुमति नहीं दी थी और न ही स्वयं किसी व्यक्ति या कंपनी को इतनी बड़ी रकम ट्रांसफर की थी। खाते से पैसे निकलने की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने बैंकिंग लेनदेन का विवरण देखा तो कई ऐसे भुगतान सामने आए, जिनके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी।
एक के बाद एक हुए इन संदिग्ध लेनदेन से पीड़ित के होश उड़ गए। इसके बाद उन्होंने बैंक खाते से संबंधित जानकारी और भुगतान का रिकॉर्ड जुटाना शुरू किया तथा पुलिस से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की।
यूपीआई भुगतान से लेकर लोन और बिल चुकाने तक में इस्तेमाल हुई रकम
भोपाल सिंह ने अपनी शिकायत में बताया कि साइबर अपराधियों ने बैंक खाते से रकम निकालने के लिए अलग-अलग भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल किया। उनके खाते से यूपीआई के जरिए विभिन्न व्यक्तियों और कंपनियों के खातों में धनराशि भेजी गई। इसके अलावा कुछ लेनदेन लोन चुकाने और विभिन्न बिलों के भुगतान के नाम पर भी किए गए।
पीड़ित का आरोप है कि इन सभी भुगतान की जानकारी उन्हें नहीं थी और न ही उन्होंने किसी प्रकार की सहमति दी थी। आशंका जताई जा रही है कि मोबाइल फोन तक अनधिकृत पहुंच हासिल करने के बाद साइबर अपराधियों ने बैंकिंग और भुगतान से जुड़ी सुविधाओं का दुरुपयोग किया।
हालांकि, अभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ है कि किस लाभार्थी के खाते में कितनी रकम भेजी गई और कुल कितने लेनदेन किए गए। पुलिस बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर इसकी जानकारी जुटा रही है।
फोन-पे के स्क्रीनशॉट और यूटीआर नंबर पुलिस को सौंपे
घटना के बाद भोपाल सिंह ने अपने बैंक खाते से हुए संदिग्ध लेनदेन का विवरण जुटाया। उन्होंने पुलिस को दी गई तहरीर के साथ फोन-पे के माध्यम से हुए भुगतानों के स्क्रीनशॉट, ट्रांजेक्शन आईडी और यूटीआर नंबर सहित अन्य जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराए हैं।
इन डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि रकम किन खातों में भेजी गई और किन माध्यमों से भुगतान किया गया। यूटीआर नंबर बैंकिंग लेनदेन की पहचान और उसकी जानकारी जुटाने में महत्वपूर्ण होता है।
पीड़ित ने पुलिस से इन सभी लेनदेन की गहन जांच कराने की मांग की है, ताकि धोखाधड़ी से संबंधित रकम के लाभार्थियों की पहचान हो सके और आरोपियों तक पहुंचा जा सके।
रकम प्राप्त करने वाले खातों को फ्रीज कराने की मांग
भोपाल सिंह ने पुलिस अधिकारियों से मांग की है कि जिन बैंक खातों में धोखाधड़ी के जरिए रकम भेजी गई है, उनकी तत्काल पहचान कर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए। उन्होंने संबंधित खातों को फ्रीज कराने और उनमें उपलब्ध धोखाधड़ी की रकम को सुरक्षित कराने का अनुरोध किया है।
पीड़ित ने करीब 3 लाख 20 हजार रुपये वापस दिलाने की मांग करते हुए मोबाइल फोन का अनधिकृत एक्सेस हासिल करने वाले साइबर अपराधियों की पहचान करने की भी अपील की है। उनका कहना है कि मेहनत की कमाई इस तरह खाते से निकल जाने के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। अब उन्हें पुलिस जांच और कार्रवाई के जरिए रकम वापस मिलने की उम्मीद है।
छपार थाने में मुकदमा दर्ज, बैंक खातों और मोबाइल ऐप की जांच शुरू
भोपाल सिंह की तहरीर के आधार पर छपार थाना पुलिस ने साइबर धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कर लिया है। पुलिस अब बैंक खाते से हुए संदिग्ध लेनदेन, यूपीआई भुगतान, ट्रांजेक्शन आईडी और यूटीआर नंबर के आधार पर जांच कर रही है।
इसके साथ ही पीड़ित के मोबाइल फोन में कथित तौर पर इंस्टॉल हुई संदिग्ध ऐप की भूमिका भी जांच के दायरे में है। तकनीकी जांच के माध्यम से यह पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि मोबाइल में ऐप किस प्रकार इंस्टॉल हुई, उसे कौन-कौन सी अनुमतियां मिली थीं और उसके जरिए मोबाइल फोन तक अनधिकृत पहुंच कैसे बनाई गई।
पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि रकम किन बैंक खातों में पहुंची और उन खातों का इस्तेमाल किसने किया। फिलहाल इस मामले में किसी आरोपी की गिरफ्तारी या ठगी की रकम बरामद होने की जानकारी सामने नहीं आई है।
वेबसाइट खोलते ही ऐप इंस्टॉल होने का दावा, तकनीकी जांच से सामने आएगी सच्चाई
इस घटना में पीड़ित ने दावा किया है कि हेल्थकेयर वेबसाइट खोलने के दौरान उनके मोबाइल फोन में अपने आप एक ऐप इंस्टॉल हो गई थी। हालांकि, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्य तौर पर केवल किसी वेबसाइट को खोलने से मोबाइल में अपने आप ऐप इंस्टॉल नहीं हो जाती। कई बार साइबर अपराधी फर्जी वेबसाइट, भ्रामक लिंक, संदिग्ध डाउनलोड और रिमोट एक्सेस ऐप के जरिए लोगों को निशाना बनाते हैं।
ऐसे मामलों में मोबाइल फोन की संवेदनशील अनुमतियों का दुरुपयोग कर निजी जानकारी और डिजिटल भुगतान से संबंधित गतिविधियों तक पहुंच बनाने की कोशिश की जाती है। भोपाल सिंह के मामले में वास्तव में किस तकनीक का इस्तेमाल हुआ, यह मोबाइल की फॉरेंसिक और तकनीकी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
साइबर ठगी से बचने के लिए बरतें सावधानी
ऑनलाइन अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर और अल्ट्रासाउंड जैसी स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी लेते समय अनजान वेबसाइटों से सावधान रहना जरूरी है। किसी भी वेबसाइट से ऐप डाउनलोड करने से पहले उसकी प्रमाणिकता और विश्वसनीयता की जांच करनी चाहिए। अनजान ऐप को मोबाइल की स्क्रीन शेयरिंग, एक्सेसिबिलिटी और रिमोट कंट्रोल जैसी संवेदनशील अनुमतियां देने से बचना चाहिए।
इसके अलावा बैंकिंग ओटीपी, यूपीआई पिन और पासवर्ड किसी के साथ साझा नहीं करने चाहिए। मोबाइल में कोई संदिग्ध ऐप दिखाई देने पर उसकी गतिविधियों की जांच कर आवश्यक सुरक्षा कदम उठाने चाहिए।
यदि बैंक खाते से बिना अनुमति कोई लेनदेन हो जाता है तो तत्काल संबंधित बैंक को सूचना देकर भुगतान रोकने और खाते की सुरक्षा के लिए कार्रवाई करानी चाहिए। साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की स्थिति में तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। इसके अलावा आधिकारिक साइबर अपराध पोर्टल cybercrime.gov.in पर भी ऑनलाइन शिकायत की सुविधा उपलब्ध है।
पुलिस जांच पर टिकी पीड़ित की उम्मीदें
मुजफ्फरनगर के खामपुर गांव निवासी भोपाल सिंह के साथ हुई इस कथित साइबर धोखाधड़ी ने ऑनलाइन स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी लेते समय बरती जाने वाली सावधानी को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। अल्ट्रासाउंड कराने के लिए हेल्थकेयर वेबसाइट तलाशने के दौरान मोबाइल में संदिग्ध ऐप इंस्टॉल होने और उसके बाद खाते से 3 लाख 20 हजार रुपये निकलने का आरोप लगाया गया है।
छपार थाना पुलिस ने शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर बैंकिंग लेनदेन, यूपीआई भुगतान, लाभार्थी खातों और संदिग्ध मोबाइल ऐप से जुड़े तथ्यों की जांच शुरू कर दी है। अब तकनीकी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि साइबर अपराधियों ने किस तरीके से खाते तक पहुंच बनाई और ठगी की रकम किन खातों में ट्रांसफर की गई। पीड़ित को अपनी रकम वापस मिलने और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई होने का इंतजार है।

