बेटे के निकाह के लिए जेल से बाहर आने की थी मांग, हाईकोर्ट ने ठुकराई अर्जी; पुलिस हिरासत में मिलेगी चंद घंटों की मोहलत

बेटे के निकाह के लिए जेल से बाहर आने की थी मांग, हाईकोर्ट ने ठुकराई अर्जी; पुलिस हिरासत में मिलेगी चंद घंटों की मोहलत

प्रयागराज। मुजफ्फरनगर के वर्ष 2010 के बहुचर्चित हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे अरशद को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने बेटे के निकाह में शामिल होने के लिए सजा निलंबित करने की उसकी याचिका खारिज कर दी है। हालांकि, पारिवारिक समारोह को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अरशद को बेटे के निकाह के दिन पुलिस हिरासत में समारोह स्थल तक ले जाने की अनुमति दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि निकाह की रस्में पूरी होते ही उसे तत्काल वापस जेल पहुंचाना होगा। इस पूरी प्रक्रिया में

आने वाला खर्च भी अरशद को स्वयं वहन करना पड़ेगा।

न्यायमूर्ति मनोज बजाज और न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की खंडपीठ ने अरशद की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने मामले की गंभीरता, हत्या की परिस्थितियों और पीड़ित परिवार के साथ चली आ रही पुरानी रंजिश को ध्यान में रखते हुए सजा निलंबित करने से इनकार कर दिया। साथ ही बेटे के निकाह में शामिल होने के लिए सीमित अनुमति देते हुए यह सुनिश्चित किया कि दोषी को जेल से बाहर रहने की सामान्य छूट नहीं मिलेगी।

बीस अक्टूबर को होना है बेटे का निकाह

अरशद की ओर से अदालत में पेश अधिवक्ता ने बेटे के निकाह का कार्ड प्रस्तुत करते हुए कहा कि निकाह बीस अक्टूबर दो हजार छब्बीस को निर्धारित है। पिता होने के नाते अरशद को इस पारिवारिक समारोह में शामिल होना है और निकाह से जुड़ी रस्में निभानी हैं। इसी आधार पर उसकी उम्रकैद की सजा दो सप्ताह के लिए निलंबित किए जाने की मांग की गई थी।
राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने भी निकाह की तारीख की पुष्टि की। उन्होंने अदालत को बताया कि मुजफ्फरनगर के भोपा थाने के प्रभारी निरीक्षक आशुतोष कुमार ने भी निकाह की तिथि की पुष्टि की है। इसके बाद अदालत ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया।

खंडपीठ ने अरशद को दो सप्ताह की राहत देने से इनकार करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने निकाह में शामिल होने के उसके अनुरोध को सीमित स्तर पर स्वीकार किया। इसके तहत उसे पुलिस हिरासत में समारोह में ले जाने और रस्में पूरी होते ही वापस जेल पहुंचाने का निर्देश दिया गया।
वर्ष दो हजार दस में अदालत जाते समय हुई थी नसीम की हत्या

अदालत ने मामले की पृष्ठभूमि पर विचार करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता शमीम ने छब्बीस मई दो हजार दस को शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, वर्ष उन्नीस सौ सतहत्तर में उनके पिता यूसुफ की हत्या लियाकत, शौकत, हाशिम उर्फ भूरा के बेटे और अन्य लोगों ने की थी। इस मामले में आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
आरोप है कि इस पुरानी घटना के बाद दोनों परिवारों के बीच दुश्मनी बढ़ती चली गई। लियाकत के बेटे अरशद, रौनक और रागिब ने शिकायतकर्ता के परिवार के प्रति रंजिश पाल ली। इसी रंजिश के चलते शिकायतकर्ता के भाई मेहराजुद्दीन की हत्या का प्रयास किए जाने का भी आरोप है। इस संबंध में अलग मुकदमा लंबित बताया गया है।

अदालत के समक्ष प्रस्तुत अभियोजन पक्ष के विवरण के मुताबिक, छब्बीस मई दो हजार दस को सुबह करीब साढ़े नौ बजे संबंधित मुकदमे की सुनवाई होनी थी। शिकायतकर्ता के भाई नसीम और जुबैर अदालत जाने के लिए निकले थे। इसी दौरान अरशद अपने साथियों के साथ मोटरसाइकिलों पर वहां पहुंचा। आरोप है कि सभी लोग देसी तमंचों से लैस थे और उन्होंने नसीम तथा उसके साथ मौजूद लोगों पर फायरिंग शुरू कर दी।

इस गोलीबारी में नसीम की मौत हो गई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अरशद ने नसीम को बेहद नजदीक से गोली मारी थी। इसी मामले में अरशद के खिलाफ मुकदमा चला और अंततः उसे हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया।
सत्र न्यायालय ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा

मुजफ्फरनगर के अपर सत्र न्यायाधीश ने उनतीस अगस्त दो हजार उन्नीस को अरशद को दोषी करार देते हुए उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके बाद से वह सजा काट रहा है। इसी सजा को निलंबित कराने के लिए उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

अरशद की ओर से पारिवारिक जिम्मेदारी और बेटे के निकाह में शामिल होने की आवश्यकता को आधार बनाया गया था। याचिका में मांग की गई थी कि उसे दो सप्ताह के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति दी जाए, ताकि वह निकाह की रस्में पूरी कर सके। लेकिन अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उसकी सजा निलंबित करने से इनकार कर दिया।
पुरानी रंजिश और दो सदस्यों की मौत का अदालत ने किया उल्लेख

खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान दोनों परिवारों के बीच चली आ रही दुश्मनी और घटना के परिणामों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि लियाकत की ओर से शुरू हुई दुश्मनी को उसका बेटा अरशद आगे बढ़ा रहा है। शिकायतकर्ता के परिवार ने इस रंजिश के चलते अपने दो सदस्यों को खोया है।

अदालत की इस टिप्पणी से स्पष्ट हुआ कि मामले में केवल पारिवारिक समारोह में शामिल होने की मांग ही नहीं, बल्कि अपराध की गंभीरता और पीड़ित परिवार पर पड़े प्रभाव को भी ध्यान में रखा गया। इसी आधार पर सजा निलंबित करने की मांग स्वीकार नहीं की गई।
निकाह में शामिल होने के बाद सीधे जेल लौटना होगा

हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि अरशद को बेटे के निकाह के दिन पुलिस हिरासत में समारोह में ले जाया जाएगा। उसे केवल निकाह की रस्में पूरी करने के उद्देश्य से वहां ले जाने की अनुमति होगी। समारोह समाप्त होते ही उसे बिना किसी देरी के वापस जेल पहुंचाना होगा।

अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि पुलिस हिरासत में ले जाने और वापस जेल पहुंचाने की पूरी व्यवस्था में होने वाला खर्च अरशद को खुद उठाना पड़ेगा। इस तरह उसे बेटे के निकाह में शामिल होने का अवसर तो मिलेगा, लेकिन उसकी उम्रकैद की सजा पर कोई रोक नहीं लगेगी और न ही उसे दो सप्ताह के लिए जेल से बाहर रहने की छूट मिलेगी।

सत्रह नवंबर को होगी अगली सुनवाई

अरशद की आपराधिक अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए सत्रह नवंबर दो हजार छब्बीस की तारीख निर्धारित की है। फिलहाल, बेटे के निकाह के लिए सजा निलंबित करने की मांग खारिज होने के बाद अरशद को निर्धारित शर्तों के तहत ही समारोह में शामिल होने की अनुमति दी गई है।

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