जौनपुर। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के केराकत कोतवाली क्षेत्र के डेहरी गांव में शनिवार को एक ऐसा पारिवारिक मिलन हुआ, जिसने वर्षों से बिछड़े रिश्तों को भावनाओं के धागे में फिर से जोड़ दिया। दावा है कि करीब 357 वर्ष पहले औरंगजेब के शासनकाल में अलग हुए एक ही खानदान के लोग आठ पीढ़ियों के बाद एक-दूसरे के सामने आए। काशी, जौनपुर और पूर्वांचल के विभिन्न इलाकों से पहुंचे ब्राह्मण परिवार के सदस्यों ने नौशाद अहमद दूबे को अपने परिवार का बड़ा और मुखिया माना।

इस ऐतिहासिक पारिवारिक मिलन का आयोजन विशाल भारत संस्थान के प्रदेश अध्यक्ष नौशाद अहमद दूबे की ओर से किया गया। बिछड़े रिश्तों को फिर से जोड़ने के उद्देश्य से आयोजित भोजभात में दूर-दूर से रिश्तेदार पहुंचे। कार्यक्रम में पहुंचे परिजनों का माला पहनाकर स्वागत किया गया। वर्षों और पीढ़ियों के अंतराल के बाद जब परिवार के लोग आमने-सामने हुए तो माहौल भावुक हो उठा। किसी की आंखों में खुशी थी तो किसी के चेहरे पर वर्षों पुराने रिश्तों को दोबारा पाने की भावनाएं साफ दिखाई दे रही थीं।

1669 में अलग हुए थे परिवार के लोग
बताया गया कि नौशाद अहमद दूबे के करीब आठ पीढ़ी पूर्वज लाल बहादुर दूबे आजमगढ़ के रानी की सराय क्षेत्र के निवासी थे। औरंगजेब के शासनकाल के दौरान परिस्थितियों के चलते उन्होंने इस्लाम धर्म ग्रहण किया और बाद में जौनपुर के डेहरी गांव में आकर बस गए। वहीं परिवार के अन्य सदस्य रानी की सराय समेत पूर्वांचल के अलग-अलग इलाकों में जाकर बस गए।
समय बीतता गया और पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन परिवार की दोनों शाखाओं के बीच संपर्क समाप्त हो गया। धीरे-धीरे यह रिश्ता लोगों की स्मृतियों से भी दूर होता चला गया। करीब साढ़े तीन शताब्दी बाद एक बार फिर इन परिवारों के बीच रिश्ते की कड़ियां जुड़ने का दावा किया जा रहा है।
शादी के कार्ड से शुरू हुई पूर्वजों की तलाश
परिवार को जोड़ने की इस पूरी कहानी की शुरुआत नौशाद अहमद दूबे की बेटी की शादी के कार्ड से हुई। शादी के निमंत्रण पत्र पर ‘दूबे’ उपनाम लिखे जाने के बाद परिवार के पूर्वजों और पुराने रिश्तेदारों के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश शुरू हुई।
इस तलाश में विशाल भारत संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं इतिहासकार डॉ. राजीव श्रीगुरुजी और उनकी शोध टीम ने करीब चार वर्षों तक पूर्वांचल के विभिन्न क्षेत्रों में पड़ताल की। शोध और संपर्क के माध्यम से पुराने पारिवारिक संबंधों की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया गया। इसी क्रम में बिछड़े परिवारों के सदस्यों की जानकारी सामने आई और लंबे समय से टूटे पारिवारिक संपर्क को दोबारा स्थापित करने की पहल हुई।
रिश्तेदारों ने साझा किए पुराने पारिवारिक संबंध
कार्यक्रम में जौनपुर से पहुंचे शैलेन्द्र शुक्ला ने बताया कि नौशाद अहमद दूबे उनकी बुआ पक्ष से रिश्तेदार हैं। वहीं वाराणसी के विवेक मिश्रा ने उन्हें अपने ननिहाल पक्ष का मामा बताया। वर्षों बाद सामने आए इन रिश्तों ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों को भावुक कर दिया।
परिवार के सदस्यों ने एक-दूसरे से मुलाकात कर पुराने संबंधों और पूर्वजों की स्मृतियों को साझा किया। इस दौरान नौशाद अहमद दूबे को परिवार का बड़ा मानते हुए उनके प्रति सम्मान भी व्यक्त किया गया।
बोले महंत प्रभु रामदास, रिश्ते पूजा पद्धति से अलग नहीं
कार्यक्रम में बड़कू हनुमान जी आश्रम के पीठाधीश्वर महंत प्रभु रामदास भी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि खून और खानदान के रिश्ते पूजा पद्धति से अलग नहीं हो सकते। उन्होंने नौशाद अहमद दूबे को परिवार का बड़ा बताते हुए उनके सम्मान की बात कही।
इस अवसर पर आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक एवं केंद्रीय अधिकारी विजय शर्मा भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। उन्होंने श्रीवत्स गौशाला का उद्घाटन किया।
अपनी जड़ों से जुड़ने पर फिर जुड़ते हैं रिश्ते
विशाल भारत संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं इतिहासकार डॉ. राजीव श्रीगुरुजी ने कहा कि जब व्यक्ति अपनी जड़ों और पूर्वजों से जुड़ने का प्रयास करता है तो बिछड़े रिश्तों को भी दोबारा जोड़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि वर्षों की दूरी और पीढ़ियों का अंतर भी पारिवारिक संबंधों की कड़ियों को हमेशा के लिए समाप्त नहीं कर सकता।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अर्चना भारतवंशी ने किया। लंबे समय बाद हुए इस पारिवारिक मिलन ने डेहरी गांव में मौजूद लोगों के बीच भी खासा भावनात्मक माहौल पैदा कर दिया। आठ पीढ़ियों बाद मिले परिवार के सदस्यों के लिए यह अवसर केवल एक मुलाकात नहीं, बल्कि अपने अतीत और पारिवारिक जड़ों से दोबारा जुड़ने का एक यादगार क्षण बन गया।

