कभी 10 हजार मजदूरों की गूंज, अब खामोशी! जानिए कानपुर की लाल इमली के 147 साल के सफर की पूरी कहानी

कभी 10 हजार मजदूरों की गूंज, अब खामोशी! जानिए कानपुर की लाल इमली के 147 साल के सफर की पूरी कहानी

कानपुर। कानपुर की औद्योगिक पहचान की कहानी लाल इमली के बिना अधूरी मानी जाती है। वर्ष 1876 में कॉवनपोर वूलन मिल्स के नाम से शुरू हुई इस मिल ने करीब डेढ़ सदी के सफर में ऊनी कपड़ों के क्षेत्र में अलग पहचान बनाई। कभी हजारों श्रमिकों की आवाजाही, मशीनों की गूंज और ऊनी कपड़ों की मांग से गुलजार रहने वाला परिसर आज शांत है। लाल इमली का सफर एक साथ कई बार बंद और शुरू होने का नहीं, बल्कि लंबे संकटों, आंशिक तालाबंदी और आखिरकार 2013-14 में उत्पादन पूरी तरह ठप होने का रहा है। इसकी इमारत, क्लॉक टावर और श्रमिकों से जुड़ी यादें आज भी कानपुर के औद्योगिक अतीत की गवाही देती हैं।

सेना की जरूरत से शुरू हुआ सफर

लाल इमली की स्थापना 1876 में स्कॉटिश उद्योगपति अलेक्जेंडर मैकबर्ट से जोड़ी जाती है। ब्रिटिश दौर में सेना के लिए ऊनी वर्दी और कंबल की जरूरत पूरी करने के उद्देश्य से मिल की स्थापना हुई थी। धीरे-धीरे यहां तैयार होने वाले ऊनी उत्पादों की मांग बढ़ी और लाल इमली देश के प्रमुख वूलन ब्रांडों में गिनी जाने लगी। मिल के नाम को लेकर स्थानीय स्तर पर कई किस्से प्रचलित हैं। परिसर में मौजूद इमली के पेड़ और लाल ईंटों से बनी विशाल इमारत को इसके नाम से जोड़ा जाता है। समय के साथ ‘लाल इमली’ ही मिल की पहचान बन गई।

ऊन की मजबूती ने बनाई अलग पहचान

लाल इमली में तैयार होने वाली लोई, शॉल, कोट और कंबल अपनी मजबूती और गर्माहट के लिए प्रसिद्ध रहे। सेना और पुलिस के लिए ऊनी वस्त्र तैयार किए जाते थे। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी मिल से ब्रिटिश और मित्र देशों की सेनाओं के लिए ऊनी सामान की आपूर्ति का उल्लेख मिलता है। बाद में भारतीय सेना और पुलिस भी इसके प्रमुख खरीदारों में शामिल रहे। आम बाजार में भी 60 नंबर लोई और टूज लोई जैसे उत्पादों की खास पहचान बनी। पुराने कर्मचारियों के मुताबिक लाल इमली के उत्पाद देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते थे और इनकी मांग लंबे समय तक बनी रही।

1981 में राष्ट्रीयकरण से बची पूरी बंदी

लाल इमली के सामने संकट का दौर 1970 के दशक में गहराने लगा। निजी प्रबंधन के दौरान घाटे, प्रबंधन संबंधी विवाद और श्रमिक असंतोष के कारण मिल बंदी के कगार पर पहुंच गई। इसके बाद मजदूरों के दबाव के बीच केंद्र सरकार ने 11 जून 1981 को मिल का राष्ट्रीयकरण कर इसे ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (बीआइसी) के अधीन ले लिया। इससे उस समय मिल को पूरी तरह बंद होने से बचाने की कोशिश हुई। राष्ट्रीयकरण के बाद भी मिल की आर्थिक परेशानियां खत्म नहीं हुईं। 1992-93 में इसे बीमार औद्योगिक इकाई घोषित कर औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआइएफआर) के हवाले किया गया। इसके बाद कच्चे माल की कमी, बिजली संकट और आधुनिकीकरण के अभाव से उत्पादन प्रभावित होता रहा। कई बार काम हफ्तों और महीनों तक बाधित रहा।

2013-14 में मशीनें हमेशा के लिए थम गईं

लंबे समय तक चलती रही आर्थिक और प्रबंधन संबंधी परेशानियों के बाद वर्ष 2013-14 में लाल इमली का उत्पादन पूरी तरह बंद हो गया। इसके बाद मिल की मशीनें दोबारा नियमित उत्पादन के लिए नहीं चलीं। केंद्र सरकार की ओर से ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन की इकाइयों को बंद करने की प्रक्रिया और कर्मचारियों के वीआरएस तथा बकाया भुगतान से जुड़े कदमों पर काम आगे बढ़ा। इस तरह लाल इमली की कहानी किसी एक दिन अचानक बंद हुई मिल की नहीं, बल्कि करीब चार दशक तक चले संकट के बाद उत्पादन के पूरी तरह थम जाने की है।

हजारों परिवारों की रोजी-रोटी

अपने चरम दौर में लाल इमली में आठ से दस हजार तक श्रमिक काम करते थे। मिल केवल उत्पादन इकाई नहीं थी, बल्कि इससे जुड़े हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का आधार थी। उत्पादन कमजोर होने के साथ श्रमिकों की संख्या घटती गई और अंततः मिल की गतिविधियां लगभग पूरी तरह थम गईं। लाल इमली कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अजय सिंह बताते हैं कि वह 1988 में मिल से जुड़े थे। उनके अनुसार उस समय मिल के आसपास करीब पांच किलोमीटर के दायरे में लगभग 12 स्टोर हुआ करते थे, जहां से खुदरा बाजार के लिए सामान भेजा जाता था। मांग इतनी अधिक रहती थी कि कई बार उपलब्ध माल से ग्राहकों की जरूरत पूरी करना मुश्किल हो जाता था।

अजय सिंह के मुताबिक लाल इमली की पहचान केवल कानपुर तक सीमित नहीं थी। यहां तैयार होने वाले ऊनी कपड़ों की अपनी अलग बाजार पकड़ थी और मिल की गतिविधियां शहर की औद्योगिक दिनचर्या का हिस्सा हुआ करती थीं।

बकाया भुगतान से श्रमिकों को मिली राहत

लाल इमली के कर्मचारियों के लिए वर्षों से लंबित बकाया भुगतान बड़ा मुद्दा रहा। वर्ष 2022-23 में तत्कालीन सांसद सत्यदेव पचौरी के माध्यम से श्रमिकों का 102 करोड़ रुपये का बकाया भुगतान कराया गया था। इसके बाद वर्ष 2025 में वर्तमान सांसद रमेश अवस्थी की अगुवाई में मजदूरों को उनके बकाया वेतन के मद में 87 करोड़ 42 लाख रुपये मिले। लाल इमली कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अजय सिंह का कहना है कि अब श्रमिकों का आठ महीने का वेतन फिर से बकाया हो गया है। इससे बंद मिल के कर्मचारियों के सामने आर्थिक परेशानी बनी हुई है।

लाल इमली के भविष्य पर सियासत भी

लाल इमली को दोबारा उपयोगी बनाने की कोशिशों के साथ इसका मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बन चुका है। 8 अप्रैल 2026 को कानपुर दौरे पर आए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी बंद मिलों और रोजगार के सवाल को लाल इमली से जोड़ते हुए बयान दिया था। अखिलेश यादव अपने शुरुआती राजनीतिक दिनों में निजी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले दिवंगत रंजन सिंह यादव उर्फ लाला पहलवान के नौबस्ता के पहाड़पुर स्थित घर शोक व्यक्त करने पहुंचे थे। इसके बाद पत्रकार वार्ता में उन्होंने कानपुर की बंद पड़ी ऐतिहासिक मिलों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा था कि “लाल टोपी वाले ही लाल इमली मिल को दोबारा चलवाएंगे।”

सांसद रमेश अवस्थी भी उठा चुके हैं मुद्दा

लाल इमली के भविष्य को लेकर सांसद रमेश अवस्थी भी इसे उसके पुराने स्वरूप में दोबारा शुरू करने के बजाय नए उपयोग की संभावना पर जोर दे चुके हैं। उनका कहना है कि मिल को पुराने ढंग से चलाना संभव नहीं है, लेकिन इसके परिसर को रोजगार के नए माध्यम के रूप में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने लाल इमली के साथ कानपुर की दूसरी बंद मिलों का मुद्दा भी संसद में उठाने और केंद्र तथा प्रदेश सरकार के स्तर पर बातचीत किए जाने की बात कही है।

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