वाराणसी। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी (वाराणसी) में नागपंचमी पर्व को लेकर अखाड़ों में उत्साह चरम पर है। रविवार को सुबह से ही शहर के विभिन्न अखाड़ों में पहलवान तैयारियों और अभ्यास में जुटे रहे। अखाड़ों की साफ-सफाई के साथ मिट्टी को तैयार किया गया और पारंपरिक व्यायाम उपकरणों—गदा, जोड़ी, डंबल, प्लेट और गरनाल—का रंगरोगन किया गया।

सोमवार को नागपंचमी के अवसर पर युवा पहलवान दंड-बैठक, कुश्ती और अन्य पारंपरिक व्यायामों के जरिए अपने दमखम का प्रदर्शन करेंगे।

बेनियाबाग स्थित रामसिंह अखाड़ा, कज्जाकपुरा रोड स्थित गयासेठ अखाड़ा, लक्सा क्षेत्र के लालकुटी व्यायामशाला और कबीरचौरा स्थित औघड़नाथ तकिया अखाड़े में दिनभर रौनक रही। युवा पहलवान अखाड़े की मिट्टी में हल्दी मिलाकर उसे तैयार करते नजर आए। इसके बाद उन्होंने दंड-बैठक, पेड़ पर रस्सी चढ़ने और अन्य कसरतों का जमकर अभ्यास किया। अखाड़ों के पुराने और अनुभवी पहलवान भी युवाओं की तैयारियों को परखते रहे और उन्हें जरूरी टिप्स देते रहे।
इस बार नागपंचमी पर्व सावन के तीसरे सोमवार के शुभ संयोग में पड़ रहा है। पर्व के अवसर पर जैतपुरा क्षेत्र स्थित नागकूप में मेला भी लगेगा। अलसुबह से ही यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की संभावना है। भक्त नागकूप के दर्शन-पूजन के बाद परिसर स्थित नागेश्वर महादेव मंदिर में भी हाजिरी लगाएंगे।
मंदिर के पुजारी पंडित कुंदन के अनुसार, महर्षि पतंजलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है। मान्यता है कि उन्होंने नागकूप क्षेत्र में लंबे समय तक तपस्या की थी। नागकूप के भीतर प्राचीन शिवलिंग भी स्थापित है, जिसके दर्शन विशेष अवसर पर कूप की सफाई के दौरान ही हो पाते हैं। नागपंचमी पर कूप और उसके भीतर बने कुएं का पानी निकालकर शिवलिंग का श्रृंगार और विशेष पूजन किया जाता है। पूजन के बाद पंप बंद कर दिया जाता है और कुछ ही देर में कूप व कुंड पुनः पानी से भर जाते हैं।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं राजेश पांडेय और संजय पांडेय के अनुसार, काशी का नागकूप कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में माना जाता है। नागपंचमी पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सर्पदंश के भय से मुक्ति और नागदेवता की कृपा की मान्यता के चलते भी लोग यहां पूजा-अर्चना करते हैं।
—‘नाग लो भाई नाग लो’ की गूंजेगी पुकार
नागपंचमी के दिन काशी की गलियों में अलसुबह से ही बच्चों की टोलियां ‘नाग लो भाई, नाग लो’ की पुकार लगाती नजर आएंगी। बच्चे घर-घर नागदेवता के चित्र पहुंचाएंगे। संजय पांडेय के अनुसार, काशी की नागपंचमी परंपरा में ‘बड़े गुरु’ और ‘छोटे गुरु’ की कथा भी महत्वपूर्ण है। बड़े गुरु के रूप में अष्टाध्यायी के रचनाकार महर्षि पाणिनि और छोटे गुरु के रूप में अष्टाध्यायी पर महाभाष्य लिखने वाले महर्षि पतंजलि को माना जाता है। मान्यता है कि काशी में महर्षि पाणिनि को शेषनाग से व्याकरण की शिक्षा प्राप्त हुई थी। इसी पौराणिक परंपरा का संबंध नागपंचमी से जोड़ा जाता है।
काशी में नागपंचमी केवल नागपूजन का पर्व नहीं, बल्कि अखाड़ों की परंपरा और लोक संस्कृति से भी गहराई से जुड़ा है। इस दिन महुअर, शास्त्रार्थ, कुश्ती-दंगल, नागपूजन और नागकूप के दर्शन की परंपरा है। मान्यता है कि काशी में कुश्ती-दंगल की परंपरा को गोस्वामी तुलसीदास ने आगे बढ़ाया था। इस बार भी नागपंचमी पर काशी के अखाड़ों में एक बार फिर पारंपरिक कुश्ती और व्यायाम संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिलेगी।

