मुजफ्फरनगर। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की अदालत ने करीब 27 साल पुराने अपहरण और हत्या के सनसनीखेज मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर तीन के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने मामले में आरोपी शाहनवाज को दोषी करार देते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई है। मामला वर्ष 1999 से 2000 के बीच का है, जब तमंचों के बल पर तीन युवकों का अपहरण किया गया था। बाद में फिरौती की रकम के इंतजाम के दौरान कारोबारी के पिता को भी बंधक बनाकर उनकी हत्या कर दी गई थी।

ट्रैक्टर ट्राली से लकड़ी लेकर जा रहे थे युवक
सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता कुलदीप कुमार के अनुसार, मामले की शुरुआत 9 दिसंबर 1999 को हुई थी। छपार थाना क्षेत्र के तेजलहेड़ा गांव निवासी मोहम्मद आबाद ने घटना की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। शिकायत के मुताबिक मोहम्मद आबाद अपने चचेरे भाई हारुन और मुकर्रम के साथ ट्रैक्टर ट्राली में पॉपुलर की लकड़ी लादकर हरियाणा के यमुनानगर में बेचने के लिए जा रहे थे।

रास्ते में तमंचे दिखाकर किया अपहरण
बताया गया कि 9 दिसंबर की रात करीब आठ बजे जब तीनों गांव के पास रजवाहे पर पहुंचे, तभी रास्ते में तीन बदमाशों ने उन्हें रोक लिया। बदमाशों के हाथों में तमंचे थे। आरोप है कि हथियारों के बल पर बदमाशों ने हारुन और मुकर्रम को अपने कब्जे में ले लिया और उनका अपहरण कर लिया।
घटना के बाद मोहम्मद आबाद किसी तरह गांव पहुंचा और ग्रामीणों को पूरी घटना की जानकारी दी। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई और दोनों युवकों की तलाश शुरू कर दी गई।
दो दिन बाद मुकर्रम लौटा, हारुन रहा बंधक
घटना के करीब दो दिन बाद मुकर्रम किसी तरह वापस लौट आया, लेकिन हारुन बदमाशों के कब्जे में ही रहा। इसके बाद बदमाशों ने हारुन के पिता सालिम को एक चिट्ठी भेजी। इसमें हारुन को सुरक्षित छोड़ने के बदले पांच लाख रुपये की फिरौती की मांग की गई थी।
फिरौती की रकम के लिए बदमाशों की ओर से परिवार पर लगातार दबाव बनाया जाता रहा। हारुन करीब 48 दिनों तक बदमाशों के कब्जे में रहा और परिवार उसकी सुरक्षित वापसी के लिए प्रयास करता रहा।
बेटे की रिहाई के लिए जंगल पहुंचे पिता
बताया गया कि 19 जनवरी 2000 को हारुन के पिता सालिम अपने साथ इल्माश और मुस्ताक को लेकर ट्रैक्टर से लाट के जंगल की ओर गए। वहां बदमाशों ने हारुन को फिरौती की रकम के इंतजाम के लिए छोड़ दिया, लेकिन उसके पिता सालिम को अपने कब्जे में लेकर बंधक बना लिया।
परिवार को उम्मीद थी कि फिरौती की रकम मिलने के बाद सालिम को भी सुरक्षित छोड़ दिया जाएगा। लेकिन बदमाशों ने ऐसा नहीं किया।
बेटे को छोड़ पिता को बनाया बंधक, फिर कर दी हत्या
बदमाशों ने 25 जनवरी 2000 को सालिम की हत्या कर दी। इसके बाद उनका शव जंगल में फेंक दिया गया। इस घटना की जानकारी मिलने के बाद परिवार में कोहराम मच गया और पूरे इलाके में सनसनी फैल गई।
करीब तीन दशक बाद अदालत का फैसला
मामले की जांच के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की और मुकदमा अदालत में पहुंचा। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता कुलदीप कुमार ने अदालत के सामने मामले से जुड़े साक्ष्य और तथ्य प्रस्तुत किए।
फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर तीन के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने सुनवाई के बाद शाहनवाज को दोषी करार दिया और उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई।
अदालत ने समयबद्ध न्याय पर दिया जोर
फैसला सुनाते हुए अदालत ने न्याय की प्रक्रिया को समयबद्ध, निष्पक्ष और प्रभावी बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। करीब 27 साल पुराने इस मामले में मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद पीड़ित परिवार को लंबे इंतजार के बाद न्याय मिलने की उम्मीद जगी है।
हालांकि मृत्युदंड की सजा के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की वैधानिक प्रक्रिया उपलब्ध रहती है। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई इसी प्रक्रिया के तहत होगी।

