लखनऊ। कांवड़ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तर भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा ‘इकोनॉमी बूस्टर’ है, जो हर साल 1,000 करोड़ रुपये से लेकर 5,000 करोड़ रुपये तक का बड़ा टर्नओवर पैदा करती है। सावन के महीने में करोड़ों कांवड़ियों की आवाजाही से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, और दिल्ली जैसे राज्यों में व्यापारिक गतिविधियां चरम पर पहुंच जाती हैं। गौरतलब है कि 30 जुलाई को सावन महीने की शुरूआत के साथ कांवड़ यात्रा की शुरुआत हो चुकी है, जो 11 अगस्त सावन शिवरात्रि तक चलेगी।

यात्रा के दौरान लाखों बांस की कांवड़, मटके, पीतल-प्लास्टिक के डिब्बे, सजावटी सामान, झंडे और टी-शर्ट का बड़े पैमाने पर उत्पादन और बिक्री होती है। कांवड़ सीजन के दौरान सहारनपुर में मुख्य रूप से टी-शर्ट सहित कुल होजरी और धार्मिक कपड़ों का कारोबार 50 करोड़ से 150 करोड़ रुपये तक का होता है। अकेले समग्र कांवड़ सामग्री और कपड़ों का यह बाजार कई बार अनुमानित रूप से 150 से 200 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर जाता है।

कारोबारी वैभव कंबोज कहते हैं कि होजरी कारोबरियों को दिल्ली, उत्तराखंड और यूपी के कई जिलो से टी-शर्ट के भारी भरकम ऑर्डर मिले हैं। इस बार बाजार में महाकाल और भोलेनाथ की प्रिंट वाली ड्रेस की सबसे ज्यादा मांग है। मोदी योगी वाली टी-शर्ट की भी डिमांड में हैं। करीब 50 नए डिजाइन इस सीजन में बाजार में आए हैं। बाजार में 150 रुपये से 700 रुपये तक की टी-शर्ट, 50 से 150 रुपये तक के भगवा गमछे, 100 से 1000 रुपये तक की कांवड़ सजावट सामग्री और विभिन्न कीमतों में रुद्राक्ष माला, कलाई बैंड व शिव स्टिकर उपलब्ध हैं। इसके अलावा एलईडी लाइट, रंग-बिरंगी झालर और सजावटी सामग्री से कांवड़ को आकर्षक बनाने का चलन भी बढ़ा है। व्यापारियों का मानना है कि हर वर्ष कांवड़ यात्रा उनके कारोबार में नई ऊर्जा लेकर आती है।
नजीबाबाद में लकड़ी की टोकरियां बनाने वाले समीर कहते हैं कि इस बार टोकरियों की मांग बहुत ज्यादा है। हमारे कारीगर सालभर इस पर लगे रहते हैं। प्लास्टिक जेरिकेन का विकल्प अभी भी खोजा जा रहा है। इसके बावजूद एल्युमिनियम, पीतल जेरिकेन कलश आदि का बाजार भी बढ़ता देखा जा रहा है। हापुड़ के डिस्पोजेबल आइटम के व्यापारी अशोक कुमार मित्तल के अनुसार, कांवड़ यात्रा के दौरान शिविरों और भंडारों का आयोजन किया जाता है। इस दौरान डिस्पोजेबल सामान की डिमांड बढ़ जाती है। ऐसे में सावन के महीने में आम दिनों के मुकाबले 70 फीसदी काम बढ़ जाता है। इससे व्यापारियों को काफी राहत मिलती है। इस बार कांवड़ यात्रा में हापुड़ में कांवड़ यात्रा से जुड़े तमाम तरह की सामग्री से करीब 40 करोड़ के कारोबार का अनुमान लगाया जा रहा है, जिससे व्यापारियों के चेहरे भी खिल उठे हैं।
कांवड़ यात्रियों की संख्या में इजाफा
उत्तर प्रदेश में साल 2017 के बाद से कांवड़ यात्रा के यात्रियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इसका फायदा प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। लखनऊ के गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ़ डेवलपमेंट स्टडीज की 2024 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक कांवड़ यात्रा उप्र में तकरीबन 1000 करोड़ यानी 10 अरब से ऊपर का कारोबार जनरेट करता है। अनुमानितत आंकड़ों के हिसाब से साल 2025 में उत्तर प्रदेश से तकरीबन 3.5 करोड़ श्रद्धालुओं ने कांवड़ यात्रा में हिस्सा लिया। वहीं, 2024 में यह संख्या 3.5 करोड़ से 4 करोड़ के बीच रही। 2023 और 2022 में यूपी से कावंडियों की संख्या 2 करोड़ के आसपास रही।
ढाबों और होटलों की डबल कमाई
कांवड़ मार्गों पर स्थित ढाबों और होटलों की कमाई सामान्य दिनों की तुलना में दोगुनी हो जाती है। सामान्य महीने में आमतौर पर 2 लाख रुपये का कारोबार करने वाले ढाबे कांवड़ यात्रा के दौरान 5 से 6 लाख की कमाई करते हैं। यह कमाई सिर्फ ढाबा मालिक, रास्ते में पड़ने वाले दुकानों की नहीं होती बल्कि दिहाड़ी मज़दूर भी पैसे कमाते हैं। दरअसल, कांवड़ यात्रा के दौरान ढाबों पर काम करने के लिए स्टॉफ की मांग बढ़ जाती है। ऐसे में जो मजदूर रोजाना छोटे-मोटे काम कर पेट पालता था, वह कांवड़ यात्रा के दौरान ढाबों पर काम करते हुए 600-700 रुपये तक रोजाना कमा लेता है।
भंडारों का खर्च लाखों में
कांवड़ यात्रा मार्ग पर लगने वाले एक-एक भंडारे में राशन, तेल, गैस, पानी, जूस और लेबर आदि का खर्च जोड़कर लाखों में आता है। यात्रा मार्ग में हजारों शिविर और भंडारे चलते हैं और दान-दाताओं के सहयोग से इन्हे चलाया जाता है। इसके अलावा, डीजे संगीत, वाहन, डीजल-पेट्रोल आदि का कारोबार भी कांवड़ मेले में खूब चलता है। पुलिस-प्रशासन के दस-दस हजार पुलिसकर्मी हर राज्य में कांवड़ ड्यूटी पर रहते हैं, जिन पर सरकार का खर्च भी करोड़ों में पहुंचता ही है। जिन शहरों के मंदिरों में कांवड़ पहुंचती है वहां के शिवालय के आसपास भी लगने वाले शिव यात्री मेलों में सैकड़ों दुकानों का भी हिसाब-किताब करोड़ों के कारोबार तक पहुंचता है।
उत्तर प्रदेश आदर्श व्यापार मंडल के प्रदेश अध्यक्ष संजय गुप्ता कहते हैं कि धार्मिक यात्राएं इकोनॉमी को बूस्ट करती हैं। पिछले कुछ सालों से कांवड़ यात्रा से हजारों करोड़ का कारोबार होने लगा है। यही वजह है कि सरकार भी इसे आयोजित करने में दिलचस्पी लेती है। उप्र में योगी राज के बाद से कांवड़ यात्रा एक प्रतिष्ठा यात्रा में बदल गई।
यूपी के ये जिले होंगे मालामाल
हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब और अन्य क्षेत्रों के अधिकांश कांवड़ यात्री हरिद्वार, गौमुख और गंगोत्री तक गंगाजल लेने जाते हैं। यहां तक पहुंचने के कांवड़ मार्ग में पश्चिम उप्र के गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, हापुड़, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत जैसे शहर आते हैं। सामान्य सी बात है, अगर कांवड़ यात्री इन रास्तों से गुजरते हैं, तो इन जिलों के व्यापारियों को फायदा होगा। इसके अलावा पूर्वी यूपी से आने वाले यात्री गोरखपुर, वाराणसी , प्रयागराज लखनऊ होते हुए इन रास्तों के जरिए अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। ऐसे में प्रदेश के उन सभी शहरों और कस्बों को फायदा होगा, जहां से कांवड़ यात्री गुजरे होंगे। इसका साफ मतलब यह हुआ कांवड़ यात्रा प्रदेश की इकोनॉमी को बूस्ट करने में मददगार साबित हो रही है।

