”अगर हमें बोलने ही नहीं दिया जाएगा तो हम सिर उठाएंगे”… बोलीं- 79 की उम्र में सड़कों पर पर्चे बांट रही प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा

लखनऊ। सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सड़कों पर पर्चे बांटती हुई एक बुजुर्ग महिला के वीडियो ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। गत पांच जुलाई के इस वीडियो में लखनऊ विश्वविद्यालय की 79 वर्षीय पूर्व कुलपति प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा नजर आ रहीं हैं जो सामाजिक संस्था ‘साझी दुनिया’ की प्रमुख हैं।

प्रोफेसर वर्मा ने गत पांच जुलाई को राजधानी की सड़कों पर ‘साझी विरासत’ को बचाने का नारा देते हुए लोगों के बीच पर्चे बांटे। पर्चे में 30 जून 1857 को लखनऊ के चिनहट में अंग्रेजों और आम जनता के बीच हुई लड़ाई का उल्लेख है जब अंग्रेजों के जुल्म के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया गया था। महिला अधिकारों और समानता के लिए लड़ाई लड़ रहीं प्रोफेसर वर्मा सड़क पर पैदल, दोपहिया, ऑटो और कार से आने जाने वालों को रोककर पर्चे दे रही थीं। 1857 की क्रांति के संदर्भों के साथ ‘नफरत की लाठी तोड़ो, आपस में प्रेम करो देश प्रेमियो’ शीर्षक के इस पर्चे के आखिर में लिखा था ”हम जानते हैं इस दौर में देश का मौसम उदास है, मगर हम ये भी जानते हैं कि अगर हम सब हर निराशा या जुल्म को हरा कर एक हो गये – तो हर ओर फिर से फूल खिला देंगे।”

उनके इस अभियान पर बहुत लोगों ने उन्‍हें ‘सैल्यूट’ किया तो व्यापक आलोचना के साथ सवाल भी खड़े हुए, लेकिन इससे बेपरवाह प्रोफेसर वर्मा ने कहा कि ”हमारा किसी से वैमनस्य नहीं हैं, हम वैमनस्य में विश्वास नहीं रखते हैं लेकिन अगर हमें बोलने ही नहीं दिया जाएगा तो हम तो सिर उठाएंगे।”

लखनऊ विश्वविद्यालय में 40 वर्षों तक अध्यापन से जुड़ी रहीं प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा को सामाजिक आंदोलनों से जुड़े भी करीब इतना ही वक्त गुजर गया है। आपातकाल में वह कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलित रहीं तो महिलाओं से जुड़े एक मामले में समाजवादी पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह यादव के एक बयान के खिलाफ उन्होंने सड़क पर उतर कर आंदोलन किया। कई सामाजिक, राजनीतिक मुद़दों पर भी उनके प्रतिरोध का स्वर मुखर रहा है। यह पर्चा बांटने की जरूरत क्यों पड़ी, इस सवाल पर उन्‍होंने कहा, ”जब जुबान बंद करने की कोशिश की जाती है तो यह कसक ज्यादा पैनी होती है कि हम इसे खत्म करें। हमारे देश के सैकड़ों लोग जेल में हैं, इसलिए क्योंकि वे कहीं आदिवासियों की, कहीं दलितों की, कहीं गरीबों की तो कहीं औरतों पर अत्याचार के खिलाफ पैरवी कर रहे थे।”

उन्‍होंने कहा, ” पिछले कुछ सालों में यह परिदृश्य बढ़ा है कि अगर हम जनता के हित में कोई ऐसी बात कहते हैं और सरकार को रास नहीं आ रही है तो कोई न कोई इल्जाम लगाकर जेल में भेजने की बात हो रही है। हम इसे लोकतंत्र के खिलाफ मानते हैं और इससे बड़ा कोई और जुल्म नहीं हो सकता है। इसी तरीके से धर्म के आधार पर वैमनस्य बढ़ा है। हम तो सीधे जनता को संदेश देना चाह रहे थे कि एकजुट होकर जनता की समस्याओं का हल निकालें, विभाजित होकर नहीं।” वर्मा ने कहा कि जैसे हिंदू-मुसलमान, अमीर-गरीब सभी मिलजुलकर लड़े तो अंग्रेज हारे, उसी तरह जाति, धर्म, लिंग भेद और वैमनस्यता भूलकर सब मिलकर जनता की समस्‍याओं पर खड़े होंगे तो देश आगे बढ़ेगा।

सरकार पर निशाना साधते हुए उन्‍होंने कहा ” सरकार हमारी बात सुने, हम उनके सामने अपना पक्ष रखें कि आप यहां गलत कर रहे हैं। आप (सरकार) हमें समझाइए, हम आपकी बात सुनेंगे लेकिन जब हमें कहने ही नहीं दिया जाएगा तो मुश्किल है।” मैनपुरी में जन्मी प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा लखनऊ विश्‍वविद्यालय में दर्शन शास्‍त्र की छात्रा रहीं और फिर यहीं दर्शन शास्‍त्र की प्रवक्ता और प्रोफेसर बनीं और करीब एक वर्ष के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति का भी दायित्व संभाला। भाई बहनों में सबसे छोटी प्रोफेसर वर्मा ने शादी नहीं की। इस बाबत पूछने पर उन्‍होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, ”कुछ को मैं पसंद नहीं आई और कुछ…।”

प्रोफेसर वर्मा ने पर्चे की ओर ध्यान दिलाते हुए बताया कि इसे उनकी संस्था के सदस्य दीपक ने लिखा है। उन्‍होंने कहा, ”अंग्रेजी राज से देश के आजाद होने का 75वां वर्ष है और हर जगह उस आजादी का जश्‍न मनाया जा रहा है तो हम लोग भी लखनऊ में जिस तरह की आजादी की लड़ाई हुई उस पर ज्‍यादा ध्‍यान देते हुए उसे याद करना चाह रहे थे। और आज हमें देश की खातिर क्‍या करना है, इसकी बात करना चाह रहे थे। 1857 में लखनऊ में अंग्रेजों से खुला संघर्ष हुआ था और उनमें एक जगह यहां चिनहट थी जहां पर अंग्रेजों से एक मौलवी अहमदुल्लाह शाह और घमंडी सिंह ने आम जनता को साथ लेकर लड़ाई लड़ी और उस लड़ाई में अंग्रेज हार गये थे। पहली बार चिनहट में अंग्रेजों को हार मिली थी तो हम लोग उसका जश्‍न मनाना चाह रहे थे।”

उन्‍होंने कहा, ‘‘वो लड़ाई आज भी हमें यह संदेश देने को मजबूर करती है कि अगर आप नाम देखेंगे अहमदुल्लाह शाह और घमंडी सिंह तो एक उदाहरण सामने आता है और विस्तार से देखें तो कह सकते हैं कि हिंदू मुसलमान सभी मिलजुलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे।” पर्चा बांटने के बाद प्रोफेसर वर्मा सोशल मीडिया पर ट्रोल भी हुईं। ट्विटर पर उन पर कम्‍युनिस्ट से लेकर सपाई (समाजवादी पार्टी से जुड़े) होने का आरोप लगा। इन सवालों पर उन्‍होंने कहा, ”कुछ लोग मुझे कम्‍युनिस्ट कहते हैं। मैंने तो मार्क्स को ठीक से पढ़ा ही नहीं लेकिन लोग अपने आप लेवल चिपकाते हैं। हमें खुद ही पता नहीं कि असली कम्‍युनिस्ट कौन होता है।”

प्रोफेसर वर्मा ने किसी भी दल से जुड़ा होने से इनकार करते हुए कहा कि ”बंगाल में सिंगूर का मामला हुआ तो मैं उनके खिलाफ सबसे आगे अगुवाई कर रही थी। केरल में संविधान के खिलाफ बोलने वाले कम्‍युनिस्टों के खिलाफ मैंने आवाज उठाई। उदयपुर का कांड हुआ तो उसके खिलाफ सबसे पहले मैंने लिखा। पर अगर आपके मन में मैल भरा हो, आप यह चाहते हैं कि एक तरफ सांप्रदायिकता करें, दूसरी तरफ कोड़े मारते रहें तो आपको हमारी हर बात गलत लगेगी।” उन्‍होंने कहा दरअसल, समस्या यह है कि लोग सामान्‍य व्‍यवहार चाहते ही नहीं है, यह नहीं चाहते कि हम कट्टर मुस्लिम के खिलाफ बोलें और कट्टर हिंदू के भी खिलाफ बोलें।

उन्होंने कहा, ‘‘एक चाहता है कि हम सिर्फ कट्टर हिंदू के खिलाफ बोलें, कट्टर मुसलमान के खिलाफ बिलकुल चुप रहें। दूसरा यह चाहता है कि हम सिर्फ कट्टर मुस्लिम के ही खिलाफ बोलें।” प्रोफेसर वर्मा ने दावा किया, ” मैं संतुलित हूं, जो भी गलत बोलेगा उसके खिलाफ हूं, हर कट्टरपन, बेवकूफी और जुल्म के खिलाफ हूं। चाहे सपा करे, चाहे भाजपा करे, चाहे कांग्रेस करे। हमने आपातकाल में सरकार के खिलाफ पोस्टर लगाए हैं, आंदोलन किया है। मैंने कभी लाल टोपी नहीं पहनी। किसी पार्टी के लिए प्रतिबद्ध नहीं हूं।” लखनऊ में विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार पूजा शुक्ला के पक्ष में प्रचार करने के सवाल पर उन्‍होंने सफाई दी ”पूजा हमारी छात्रा रही है और वह कुछ बेहतर करने में लगी है, इसलिए हमने उसका प्रचार किया।”

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