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निजी शिक्षण संस्थाओं के साथ उत्तर-प्रदेश सरकार का सौतेला व्यवहार

समाजसेवी आर.आर.डी. उपाध्याय
जी हाँ सरकार द्वारा प्रदेश में शिक्षा से सम्बंधित विभागों को संचालित करने के लिए जो नियम बनाये गये है, वह केवल निजी शिक्षण संस्थाओं पर ही लागू होते है।
सरकार द्वारा विभिन्न विभागों और योजनाओं द्वारा संचालित स्कूलों को छोडकर, निजी शिक्षण संस्थाओं को कड़ाई के साथ शिक्षा विभाग द्वारा बनाये गये नियमों का पालन करना होता है। सरकार द्वारा बनाये गये मानकों को पूरा करना निजी शिक्षण संस्थाओं के लिए आसान ही नहीं बल्कि असम्भव होता है। निजी शिक्षण संस्थाओं के मानक पूरे न होने पर सम्बन्धित विभागों द्वारा शिक्षण संस्थाओं के संचालकों को नोटिस देने, संस्था बन्द करने, जुर्माना लगाने, जैसी धमकीयां दी जाती है। शिक्षण संस्थाओं के शिक्षक व संचालक वर्ष भर दबाव में रहते हुए मानकों को पूरे करने और नियमों को लागू करने पर लगे रहते है।
शिक्षण संस्थाओं पर लागू यह नियम प्रदेश सरकार ही नहीं जनपद स्तर पर बैठे कुछ अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर अपने मन से बनाये गये नियमों को भी लागू करते है। ताकि मानक और नियमों के जाल में उलझी निजी शिक्षण संस्थाओं से अवैध वसूली की जा सके।
सरकार द्वारा निर्धारित शिक्षण संस्थाओं के मानक व नियम कहने को तो निजी शिक्षण संस्थाओं, सरकारी व सरकार द्वारा सहायता प्राप्त सभी शिक्षण संस्थाओं में एक जैसे है। लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना है कि निजी शिक्षण संस्थाओं पर लागू यह नियम सरकारी शिक्षण संस्थाओं या सरकार से साहयकता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं पर लागू नहीं होते है। क्योंकि कभी भी इन सरकारी शिक्षण संस्थाओं के मानकों की जाँच नहीं की जाती, कभी इन्हें नोटिस नहीं दिये जाते और न कभी इन पर जुर्माना लगाया जाता है।
उत्तर प्रदेश सरकार या केन्द्र सरकार द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं या सरकार से सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं के मानकों की यदि जाँच की जायें, तो वह चौंकाने वाले तथ्य सामने आयेंगे कि सरकार को अपने द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं पर अंकुश लगाना पडेगा।
उत्तर-प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों से सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थायें व सरकार द्वारा संचालित शिक्षण संस्थाओं के लगभग 20% प्रतिशत भवन जर्जर स्थति में है। प्राप्त आकड़ों के आधार पर उत्तर-प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा को दुरुस्त करने के लिए 5 लाख़ शिक्षकों की आवश्यकता है और इन शिक्षण संस्थाओं को लगभग एक लाख प्रधानाचार्य की आवश्यकता है। इन संस्थाओं में कार्य करने वाले अध्यापकों का आरोप है कि इन शिक्षण संस्थाओं में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है।
यदि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित या सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थायें मानकों व नियमों की धज्जियां उडाकर संचालित की जा सकती है तो निजी शिक्षण संस्थाओं के अधुरे कुछ मानकों पर इतनी कठोरता क्यों? इन प्राईवेट शिक्षण संस्थाओं का उत्पीड़न क्यों? इसे उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निजी शिक्षण संस्थाओं के साथ सौतेला व्यवहार ही कहा जा सकता है।

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