किसी भी राष्ट्र का निर्माण उसकी शिक्षण संस्थाओं में होता है : डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
मनुष्य जीवन का अभीष्ट मार्ग शिक्षा का मनोरथ है, जो कि मनुष्य को मनुष्य तथा किसी राष्ट्र को मूल्यों युक्त सम्पन्न राष्ट्र बनाने के लिए अपरिहार्य है
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा को मानव जाति के लिए अभीष्ट मानते थे । उनका मानना था कि मनुष्य जीवन का अभीष्ट मार्ग शिक्षा का मनोरथ है, जो कि मनुष्य को मनुष्य तथा किसी राष्ट्र को मूल्यों युक्त सम्पन्न राष्ट्र बनाने के लिए अपरिहार्य है , जिसमें भारतीय शिक्षा और संस्कृति की श्रेष्ठता स्वयं प्रमाणित है। डॉ.राधाकृष्णन के इन्ही विचारों को रेखांकित करता प्रसिद्ध शिक्षा विद डॉ.महेन्द्र प्रताप सिंह का आलेख। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन मात्र एक शिक्षा विद ही नहीं अपितु एक उच्चकोटि के राजनयिक, महान दूरदृष्टा, मानवीय मूल्यों के श्रेष्ठतम संरक्षक तथा भारतीय संस्कृति के जीवन्त दस्तावेज के रूप में जाने जाने वाले एक ऐसे अवतारी पुरूष थे जिन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता के बल पर ह्रास हो रहे भारतीय मूल्यों की पुनर्स्थापना कर इस बात की पुष्टि कर दी कि भरतीय मूल्य एक आद्य भाव है जिसकी संकल्पना मानव मात्र में निहित है। उनका मानना था कि यही सत्यम,शिवम,सुंदरम का मूलभूत सिद्धान्त है।वे मानते थे कि हमारी भारतीय संस्कृति के मूल में शिक्षा है और यही शिक्षा वह मेरुदण्ड है जिस पर मानव मात्र का अस्तित्व अबलम्बित है अर्थात मनुष्य मनुष्यत्व को प्राप्त है। शिक्षा मूलाधार है तो मानवीय मूल्य ब्रह्मरंध्र में निरापद रूप से अवस्थित हैं । डॉ. राधाकृष्णन शिक्षा को मानव जाति के लिए अभीष्ट मानते थे । उनका मानना था कि मनुष्य जीवन का अभीष्ट मार्ग शिक्षा का मनोरथ है,जो कि मनुष्य को मनुष्य तथा किकिसी राष्ट्र को मूल्यों युक्त सम्पन्न राष्ट्र बनाने के लिए अपरिहार्य है जिसमें भारतीय शिक्षा और संस्कृति की श्रेष्ठता स्वयं प्रमाणित है । डॉ.राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानक मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अतः विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन किया जाना चाहिए।शिक्षा का प्रभाव जहां प्रत्येक व्यक्ति पर निश्चित रूप से पड़ता है , वहीं शैक्षिक संस्थानों की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़तीं हैं।क्रिश्चियन संस्थाओं द्वारा उस समय पश्चिमी जीवन मूल्यों को विद्यार्थियों के भीतर काफी गहराई तक स्थापित किया जाता था, यही कारण है कि क्रिश्चियन संस्थाओं में अध्ययन करते हुए राधाकृष्णन के जीवन में उच्च गुण समाहित हो गए लेकिन उनमें एक अन्य परिवर्तन भी आया जो कि क्रिश्चियन संस्थाओं के कारण ही था , कुछ लोग हिंदुत्ववादी विचारों को हेय दृष्टि से देखते थे और उनकी आलोचना करते थे। डॉ. राधाकृष्णन ने उन आलोचनाओं को चुनौती की तरह लिया और हिंदू शास्त्रों के अध्ययन के आधार पर प्रश्न किया कि किस संस्कृति के विचारों में चेतनता है और किस संस्कृति के विचारों में जड़ता है ? तब स्वाभाविक विश्लेषणों के परिणाम के आधार पर इस बात पर दृढता से विश्वास करना आरम्भ कर दिया कि भारत के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले गरीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते थे । इस कारण डॉ. राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से यह जान लिया कि भारतीय अध्यात्म काफी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिंदुत्व की आलोचनाएं निराधार हैं ।इससे उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो प्राणी को जीवन का सच्चा संदेश देती है। डॉ. राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों को समझ पाने में सफल रहे क्योंकि वे मिशनरियों द्वारा की गई तमाम आलोचनाओं के सत्य स्वयं परखना चाहते थे।उनका मानना था कि आलोचनाएं परिशुद्धि का कार्य करती हैं।सभी माताएं अपने बच्चों में उच्च संस्कार देखना चाहती हैं।इसी कारण वे बच्चों को ईश्वर पर विश्वास रखने , पाप से दूर रहने , एवं मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करने का पाठ पढ़ाती हैं । उन्होंने सिद्ध कर दिखाया कि भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों का आदर करना सिखाया गया है और सभी धर्मों के लिए समता का भाव भी हिन्दू संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। इस प्रकार डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान को विश्व पटल पर परिभाषित कर इसकी श्रेष्ठता को प्रमाणित करते हुए अपनी उच्च बौद्धिक क्षमता का विश्व को लोहा मानने पर मजबूर कर दिया ।डॉ.राधाकृष्णन का स्पष्ट मत था कि किसी राष्ट्र का निर्माण उसकी शिक्षण संस्थाओं में होता है। उनका मानना था कि हमे अपने युवाओं को प्रशिक्षित करना है। हमे उनको उन परंपराओं से अवगत कराना है जिन पर भविष्य का गठन होगा । प्रजाति और धर्म, भाषा और भूगोल की बहुत सी जटिलताओं और विभिन्नताओं के होते हुए भी जिन शक्तियों ने हमारी जनता को एक राष्ट्र बनाये रखा और आगे भी उसको ऐक्य सूत्र में बाँध कर रख सकती है, उनका स्वरुप निर्धारित हो रहा है। ये शक्तियां भौतिक क्षेत्र से सम्बंधित नहीं हैं, हमारी यह एकता भौगोलिक एकता नहीं है, इसका सम्बन्द्ध तो विचार जगत से है।जब -जब केंद्रीय एकता का ह्रास हुआ है और आंतरिक कलह उस पर हावी हुई , तब-तब हमारे देश को उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़े । शिक्षण संस्थाओं में ही हमको मिलजुलकर रहने और सामाजिक हित के लिए कार्य करने की भावना का विकास करना चाहिए। आज की हमारी पीढ़ी को इसकी महती आवश्यकता है और उच्च शिक्षण संस्थानों को इसके लिये प्रेरणा देनी चाहिए।राष्ट्र के रूप में हमारा भावी कल्याण और प्रारब्ध हमारी भौतिक संपदा की अपेक्षा हमारी आत्मिक शक्ति पर अधिक निर्भर करेगा।
डॉ. राधाकृष्णन का स्पष्ट मत था कि ” भ्रमित युवा – भ्रमित राष्ट्र , भ्रमित राष्ट्र – सृष्टि विनाश ।” अर्थात युवाओं को जब तक संस्कार युक्त शिक्षण प्रदान नहीं किया जाएगा तब तक किसी राष्ट्र की संकल्पना नहीं की जा सकती। भारत की स्वतंत्रता के पूर्व ही डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था कि भारत हिंसक आंदोलनों से देश के रूप में आज़ाद तो हो सकता है परन्तु राष्ट्र के रूप में स्थापित होने के लिए उसको शिक्षकों के नेतृत्व की आवश्यकता होगी। और जब भारतीय शिक्षण संस्थानों में स्वतंत्र भारत की संकल्पना का बीजारोपण कर शिक्षकों ने छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया तो भारत देश आज़ादी के साथ-साथ मूल्यों युक्त एक सशक्त राष्ट्र बनकर विश्व के मानचित्र पर स्थापित भी हुआ ।
मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में दर्शन शास्त्र के व्याख्याता के रूप मे डॉ. राधाकृष्णन ने शैक्षिक गुणवत्ता में धर्म, दर्शन, राजनीति, व सांस्कृतिक विरासत के उन तमाम तत्वों का समावेश किया जो कतिपय कारणों से पद विचलन की स्थिति में विषयांतर के कारण मात्र सिद्धान्त के रूप मे जीवित थे तथा उनका व्यवहारिक जीवन के धर्म ज्ञान व मूल्यों से कोई सरोकार नहीं था ।अतएव उनकी इस शिक्षण शैली से प्रभावित होकर अमरीका व यूरोप के तमाम विश्वविद्यालयों ने डॉ. राधाकृष्णन को अपने विश्वविद्यालयों में व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया । मैनचेस्टर, लंदन , ऑक्सफ़ोर्ड , शिकागो, मैक्सिको, तथा यूरोप व अमरीका के साथ-साथ दर्जनों भारतीय विश्वविद्यालयों के छात्र/छात्राएं डॉ.राधाकृष्णन के व्याख्यानों से लाभान्वित हुए तथा शिक्षा व भारतीय संस्कृति के संवाहक के रूप में उनके सिद्धान्तों को स्वीकार कर मानवीय मूल्यों के संवर्द्धन में उनका सतत अनुकरण करने लगे ।
डॉ.राधाकृष्णन सम्पूर्ण विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि ” विश्वविद्यालय ” शब्द इसी संकल्पना को ध्वनित करता है अर्थात शिक्षित होनेके लिए शिक्षा की सीमा का निर्धारण निरर्थक विचार है। वे स्पष्ट तौर पर कहते थे कि शिक्षा के लिए सीमा रहित विश्व एक विद्यालय है जिसमे मानवीय मूल्यों,धर्म, संस्कृति, विज्ञान, व आधुनिक तकनीकी ज्ञान के माध्यम से ही ब्रह्मांड का अध्ययन संभाव्य हो सका है ।इसके लिए आवश्यकता मात्र इस बात की है कि हम मनुष्य प्रजाति के प्राणी अपने आस-पास ऐसा वातावरण सृजित करें जिसमें उच्च आदर्शों व मूल्यों पर आधारित शिक्षण की व्यवस्था से सम्पन्न संस्थान शिक्षण कार्य के प्रथम मानवीय सोपान का निष्पादन कर सकें । उनका स्पष्ट मानना था कि मानवता के इस महती कार्य मे शिक्षकों की भूमिका को सृष्टि के आद्याक्षर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है ।




